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Mulberry Cultivation And Sericulture: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला में मार्च का महीना शहतूत की खेती और रेशम पालन के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किसान सही तकनीक और सलाह के साथ शहतूत की खेती करें, तो वे एक ही समय में फल उत्पादन और रेशम पालन से दोगुना मुनाफा कमा सकते हैं कृषि एक्सपर्ट बताते हैं कि मार्च में मौसम रेशम के कीड़ों के पालन के लिए उपयुक्त होता है. ऐसे में किसानों को अतिरिक्त मेहनत करने की जरूरत नहीं होती, बस विशेषज्ञों द्वारा बताए गए तरीकों को अपनाना होता है. इससे शहतूत के पत्तों का उपयोग रेशम पालन में होता है, वहीं पेड़ों से फल उत्पादन भी मिलता है. इस दोहरे लाभ से किसान न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं, बल्कि खेती के क्षेत्र में एक अलग पहचान भी बना सकते हैं. शहतूत की खेती आज किसानों के लिए आमदनी का एक बेहतरीन विकल्प बनती जा रही है. देखिए ये रिपोर्ट…

दो उद्देश्य से की जाती है सहतूत की खेती 
कृषि एक्सपर्ट संजय यादव ने लोकल 18 को बताया कि किसान सहतूत की खेती मुख्य रूप से दो उद्देश्यों से करते हैं. पहला रेशम पालन के लिए और दूसरा फल उत्पादन के लिए. रेशम उद्योग में सहतूत की पत्तियों की अहम भूमिका होती है, वहीं इसके फल बाजार में अच्छी कीमत दिलाते हैं.

पौधा तैयार करने का सही समय और तरीका
सहतूत की खेती शुरू करने से पहले पौधा तैयार करना सबसे जरूरी होता है. इसके लिए ठंड खत्म होने के बाद का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. जनवरी के अंत से फरवरी की शुरुआत तक कटिंग के जरिए पौधा तैयार किया जाता है. कटिंग के लिए पेंसिल के आकार की लगभग 1 फीट लंबी टहनी ली जाती है. फरवरी के पहले पखवाड़े में इन कटिंग की रोपाई कर देनी चाहिए.

नर्सरी बेड और मिट्टी की तैयारी जानिए कैसे करें
रोपाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई और गुड़ाई जरूरी होती है. अगर मिट्टी हल्की हो तो उसमें गोबर की खाद मिलानी चाहिए. भारी मिट्टी होने पर थोड़ी मात्रा में बालू मिलाकर नर्सरी बेड तैयार करना चाहिए. इससे कटिंग में जड़ बनने की प्रक्रिया बेहतर होती है.

3-4 महीने में तैयार हो जाता है पौधा
नर्सरी बेड में लगाने के बाद कटिंग में लगभग 3 से 4 महीने के भीतर जड़ विकसित हो जाती है. इसके बाद पौधा ट्रांसप्लांटिंग के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है.

ट्रांसप्लांटिंग में रखें सही दूरी 
कृषि एक्सपर्ट ने बताया कि पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए ट्रांसप्लांटिंग के समय उचित दूरी रखना बेहद जरूरी है. रो-टू-रो और पौधा-टू-पौधा दूरी 3 से 4 मीटर रखनी चाहिए. इससे पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व मिलते हैं.

रेशम पालन में सहतूत की पत्तियों की अहम भूमिका
रेशम पालन के लिए सहतूत की कोमल पत्तियां सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं. रेशम के कीट इन पत्तियों को आहार के रूप में खाते हैं, जिससे उनका विकास बेहतर होता है और रेशे की गुणवत्ता और मात्रा दोनों बढ़ती हैं.

पशुओं के चारे के रूप में भी उपयोगी
संजय यादव ने लोकल 18 को बताया कि सहतूत की पत्तियों का उपयोग केवल रेशम पालन तक सीमित नहीं है. इसकी पत्तियां बकरी, गाय और भैंस के लिए भी पौष्टिक चारे के रूप में उपयोग की जाती हैं. पौधा तैयार होने के 2 से 3 साल बाद हल्की टहनियों की कटाई करनी चाहिए, जिससे अगले साल नई और कोमल पत्तियां निकलती हैं. इससे पशुओं को बेहतर चारा मिलता है और रेशम कीटों को भी गुणवत्ता युक्त भोजन मिलता है.

मार्च में रेशम पालन के लिए अनुकूल समय 
फिलहाल मार्च का महीना शुरू हो चुका है. ऐसे में जिन पौधों में पत्तियां पूरी तरह विकसित हो चुकी हैं, उनमें रेशम पालन की शुरुआत की जा सकती है. वहीं नर्सरी के लिए कटिंग अब तक तैयार हो जानी चाहिए.

सहतूत का फल सेहत और कमाई दोनों का साधन 
सहतूत का फल स्वादिष्ट होने के साथ-साथ बेहद पौष्टिक भी होता है. बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है. इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन-C, आयरन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. यह फल एनीमिया जैसी बीमारी में लाभदायक माना जाता है और पेट से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में सहायक है. वहीं सहतूत की पत्तियों का सेवन शुगर के मरीजों के लिए भी फायदेमंद बताया जाता है.

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