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भारतीय सिनेमा में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, कई बार कहानी का निर्णायक मोड़ भी बनी है. जश्न की आड़ में छिपा खलनायक, भीड़ के शोर में पनपती साजिश और खुशियों के बीच अचानक उतरा खौफ…जिसने हॉरर और थ्रिलर फिल्मों को यादगार बना दिया…

नई दिल्ली. होली रंगों, खुशियों और मस्ती का त्योहार है. बॉलीवुड ने इस त्योहार को हमेशा रोमांस और उमंग के साथ पेश किया है, चाहे वह ‘सिलसिला’ हो या ‘बाघवान’. लेकिन कुछ फिल्में ऐसी भी हैं, जिनमें होली की मिठास में जहर घोल दिया गया. जहां रंगों की जगह खून बरसा और गानों की जगह चीख-पुकार सुनाई दी. ऐसे ही कई क्लासिक फिल्मों में होली का उत्सव रोमांस या खुशी से शुरू होकर थ्रिलर या हॉरर एलिमेंट में बदल जाता है. कुल मिलाकर पर्दे पर ‘रंगों के बीच शुरू हुआ डरावना खेल’. चलिए बताते हैं वो फिल्मों के बारे में जहां होली सीन विलेन के डरावने खेल का ट्रिगर बना.

शोले (1975) : रमेश सिप्पी की मास्टरपीस ‘शोले’ में होली का सीन सबसे यादगार है. ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ गाने में वीरू (धर्मेंद्र) और बसंती (हेमा मालिनी) का रोमांस, जय (अमिताभ बच्चन) और राधा (जया बच्चन) की साइलेंट केमिस्ट्री और पूरा गांव रंगों में डूबा हुआ था. लेकिन गाने के ठीक बाद गब्बर सिंह (अमजद खान) का हमला शुरू होता है.

गब्बर का ‘होली कब है?’ डायलॉग और गांव पर अटैक होली की खुशी को खून-खराबे में बदल देता है. यह सीन जय-वीरू की बहादुरी दिखाता है और थ्रिलर एक्शन को पीक पर ले जाता है. होली यहां गांव वालों को एकजुट करने का बहाना बनती है, लेकिन विलेन के लिए परफेक्ट कवर. यह सीन दिखाता है कि त्योहार की बेफिक्री किस तरह विलेन के लिए सबसे बड़ा मौका बन सकती है.

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डर (1993) : यश चोपड़ा की थ्रिलर ‘डर’ में होली का सीन सबसे डरावना है. ‘अंग से अंग लगाना’ गाने में किरण (जूही चावला) और राहुल (शाहरुख खान) के बीच रंगों का खेल चल रहा है, लेकिन राहुल का ऑब्सेसिव स्टॉकर करेक्टर यहां सामने आता है. चेहरे पर रंग लगाकर छिपकर वह किरण पर हमला करता है और ‘क-क-क-किरण’ कहकर उसे डराता है.

यह सीन होली की मस्ती को स्टॉकिंग और पर्सनल थ्रेट में बदल देता है. शाहरुख का नेगेटिव रोल यहां इतना प्रभावशाली है कि दर्शक भी डर जाते हैं. होली का उत्सव यहां डर का प्रतीक बन जाता है.

दामिनी (1993) : राजकुमार संतोषी की ‘दामिनी’ में होली का सीन सोशल थ्रिलर का टर्निंग पॉइंट है. होली के दौरान दामिनी (मीनाषी शिषाद्री) की नौकरानी की उसके देवर और दोस्तों द्वारा रेप होती है. रंगों की मस्ती में यह क्रूर घटना होती है, जो फिल्म की मुख्य कहानी शुरू करती है. दामिनी इस घटना की गवाह बनती है और न्याय की लड़ाई लड़ती है. होली यहां खुशी के बजाय अन्याय और हिंसा का माध्यम बन जाती है, जो फिल्म को इंटेंस थ्रिलर बनाती है.

रांझणा (2013): आनंद एल राय की ‘रांझणा’ में होली का सीन रोमांटिक से इमोशनल थ्रिलर में बदलता है. कुंदन (धनुष) और जोया (सोनम कपूर) के बीच रंग लगाने का प्यारा सीन है, जहां कुंदन पूरी तरह जोया के प्यार में डूब जाता है. लेकिन यह मोमेंट कुंदन की ऑब्सेसिव लव स्टोरी का शुरुआती पॉइंट बनता है, जो बाद में राजनीतिक थ्रिलर और ट्रेजडी में बदल जाती है. होली यहां प्यार की शुरुआत लेकिन डरावने परिणाम की नींव रखती है.

वॉर (2019): सिद्धार्थ आनंद की एक्शन-थ्रिलर ‘वॉर’ में ‘जय जय शिवशंकर’ होली सॉन्ग में हृतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ की केमिस्ट्री है, लेकिन होली का उत्सव यहां स्पाई थ्रिलर का कवर बनता है. रंगों की आड़ में एक्शन और ट्विस्ट आते हैं, जो फिल्म के हाई-ऑक्टेन सीक्वेंस को शुरू करते हैं। होली यहां फेस्टिवल फन से विलेन के गेम में बदल जाती है.

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