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होमताजा खबरbusinessप्री-ईएमआई या फुल ईएमआई, होम लोन लेते समय कौन सा विकल्प पड़ेगा कम महंगा

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घर खरीदते समय सही होम लोन विकल्प चुनना बेहद अहम होता है. प्री-ईएमआई और फुल ईएमआई के बीच का अंतर आपकी जेब पर असर डालता है. एक में शुरुआती किस्त कम होती है, तो दूसरे में कुल ब्याज कम पड़ता है. फैसला लेने से पहले पूरा गणित समझना जरूरी है.

प्री-ईएमआई या फुल ईएमआई, होम लोन लेते समय कौन सा विकल्प पड़ेगा कम महंगाZoom

प्री-ईएमआई और फुल ईएमआई का फर्क जानिए. (Image:AI)

नई दिल्ली. घर खरीदना आज के समय में बड़ा फैसला है, क्योंकि प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. ज्यादातर लोग घर लेने के लिए होम लोन का सहारा लेते हैं. लेकिन लोन लेते समय ‘प्री-ईएमआई’ और ‘फुल ईएमआई’ के बीच का फर्क समझना जरूरी है. गलत विकल्प आपके बजट और कुल ब्याज पर भारी असर डाल सकता है.

क्या है प्री-ईएमआई और कैसे काम करती है?
प्री-ईएमआई आमतौर पर अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी पर लागू होती है. इसमें बैंक पूरी लोन राशि एक साथ नहीं देता, बल्कि निर्माण की प्रगति के अनुसार किस्तों में भुगतान करता है. उधारकर्ता को केवल उस रकम पर ब्याज देना होता है, जो अब तक जारी हुई है. यानी इस दौरान आप सिर्फ ब्याज चुकाते हैं, मूलधन नहीं. जब घर का कब्जा मिल जाता है, तब नियमित फुल ईएमआई शुरू होती है जिसमें मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होते हैं. शुरुआती समय में किस्त कम होने से नकदी का दबाव घटता है.

प्री-ईएमआई के फायदे और जोखिम
प्री-ईएमआई का सबसे बड़ा फायदा यह है कि शुरुआती भुगतान कम होता है. अगर आप किराये के घर में रह रहे हैं, तो किराया और कम ब्याज वाली प्री-ईएमआई दोनों संभालना आसान होता है. यह उन लोगों के लिए भी ठीक है जो निर्माण पूरा होने के बाद घर बेचने की योजना बना रहे हैं. हालांकि, इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि निर्माण अवधि के दौरान केवल ब्याज चुकाने से कुल ब्याज राशि बढ़ जाती है. अगर प्रोजेक्ट में देरी हो जाए, तो ब्याज भुगतान की अवधि लंबी हो जाती है और खर्च बढ़ सकता है.

फुल ईएमआई क्या होती है और कैसे अलग है?
फुल ईएमआई में जैसे ही पूरी लोन राशि जारी होती है, उधारकर्ता हर महीने ब्याज और मूलधन दोनों का भुगतान शुरू कर देता है. इससे लोन की अवधि कम हो सकती है और कुल ब्याज भी घटता है. हर किस्त के साथ मूलधन कम होता जाता है, जिससे भविष्य का ब्याज बोझ भी घटता है. हालांकि फुल ईएमआई की मासिक राशि प्री-ईएमआई से ज्यादा होती है, इसलिए शुरुआत में कैश फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है. लेकिन लंबी अवधि में यह विकल्प कुल लागत को कम रखने में मदद करता है.

कुल भुगतान में कितना पड़ता है फर्क?
मान लीजिए आपने 50 लाख रुपये का लोन 8.5 फीसदी ब्याज दर पर 20 साल के लिए लिया. अगर निर्माण में 2 साल लगते हैं और आप प्री-ईएमआई चुनते हैं, तो इन दो सालों में केवल ब्याज चुकाना होगा. इसके बाद 20 साल की फुल ईएमआई चलेगी, यानी कुल अवधि 22 साल हो सकती है. इससे कुल ब्याज अधिक हो सकता है. वहीं फुल ईएमआई शुरू से देने पर मासिक राशि ज्यादा होगी, लेकिन कुल अवधि और ब्याज कम रहने की संभावना रहती है.

टैक्स लाभ और सही विकल्प का चुनाव
दोनों विकल्प टैक्स लाभ के लिए पात्र होते हैं, लेकिन निर्माण अवधि के दौरान दिए गए ब्याज पर तुरंत टैक्स छूट नहीं मिलती. कब्जा मिलने के बाद उस ब्याज को पांच बराबर हिस्सों में क्लेम किया जा सकता है. इसलिए फैसला लेते समय अपनी आय, किराया, नकदी प्रवाह और भविष्य की योजना को ध्यान में रखना जरूरी है. अगर शुरुआती वर्षों में खर्च संभालना मुश्किल है तो प्री-ईएमआई मददगार हो सकती है. लेकिन अगर आप कुल ब्याज कम रखना चाहते हैं और ऊंची किस्त दे सकते हैं, तो फुल ईएमआई बेहतर विकल्प साबित हो सकती है.

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Rakesh Singh

Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें

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