विवाह मुहूर्त का निर्धारण करते समय त्रिबल शुद्धि का विचार किया जाना बहुत आवश्यक है। विवाह मुहूर्त का चयन करते समय सूर्य, चंद्र एवं गुरु का बल अर्थात् गोचरवश इन ग्रहों का शुभत्व ही 'त्रिबल शुद्धि' कहलाता है। जिस समय 'त्रिबल शुद्धि' नहीं मिलती उस दिन व मास में विवाह मुहूर्त नहीं बनता।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/astrology-articles/sun-rahu-conjunction-in-aquarius-eclipse-yoga-remedies-126021300020_1.html" target="_blank">सूर्य-राहु युति कुंभ राशि में: 1 महीने तक रहेगा ग्रहण योग, इन 3 उपायों से बचेंगी परेशानियां</a></strong>
'त्रिबल शुद्धि' का विचार वर एवं कन्या दोनों की राशि एवं जन्मकालीन चंद्र से किया जाता है। शास्त्रानुसार 'त्रिबल शुद्धि' के तीन अंग होते हैं, जिन्हें क्रमश: शोभन (शुभ), पूज्य (पूजा उपरांत शुभ) एवं अपूज्य (अशुभ) कहा जाता है। इनमें शोभन में विवाह शुभ और पूज्य में उस ग्रह की शांति उपरांत विवाह किया जाना श्रेयस्कर होता है। पूज्य ग्रह की शांति को लोकाचार में लाल पूजा (पूज्य सूर्य) और पीली पूजा (पूज्य गुरु) कहा जाता है।
अपूज्य ग्रह गोचर होने पर जहां तक सम्भव हो सके विवाह को स्थगित कर अनुकूल ग्रह गोचर की प्रतीक्षा करना ही श्रेयस्कर रहता है, किंतु यदि बहुत आवश्यक हो तो वैदिक रीति से ग्रहशांति के उपरांत विवाह किया जा सकता है। आजकल देखने में आया है कि अधिकांश विद्वान केवल अपूज्य ग्रह गोचर में ही ग्रहशांति का विधान बताते हैं; पूज्य ग्रह गोचर में नहीं, जो कि सर्वर्था अनुचित है।
क्या है गोचर-
गोचर का शाब्दिक अर्थ है- चलने वाला। ग्रहों के निरंतर एक राशि से दूसरी राशि में संचरण को ही ज्योतिष शास्त्र में 'गोचर' कहा जाता है। शास्त्रानुसार सूर्य लगभग एक माह, गुरु एक वर्ष और चंद्र सवा दो दिन तक एक राशि में संचरण करते हैं। विवाह हेतु इन तीन ग्रहों का जन्मराशि से शुभाशुभ स्थानों में गोचरवश स्थित होना ही 'त्रिबल' कहलाता है। जब ये तीनों ग्रह गोचरवश शुभ स्थानों में स्थित होते हैं तो उसे 'त्रिबल शुद्धि' कहा जाता है।
त्रिबल शुद्धि-
विवाह मुहूर्त हेतु त्रिबल शुद्धि के लिए वर की राशि से सूर्य और चंद्र का एवं कन्या की राशि से गुरु व चंद्र का विचार किया जाना चाहिए अर्थात् वर के लिए सूर्य व चंद्र का एवं कन्या के लिए गुरु और चंद्र का गोचरवश शुभ स्थानों में स्थित होना त्रिबल शुद्धि के लिए आवश्यक है।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/astrology-zodiac-signs/grahan-yoga-in-aquarius-13-february-2026-impact-on-zodiac-signs-126020700040_1.html" target="_blank">कुंभ राशि में सूर्य-राहु की युति: 13 फरवरी से 'ग्रहण योग', इन 4 राशियों के लिए सावधानी का समय</a></strong>
आइए अब जानते हैं कि विवाह हेतु वर एवं कन्या के लिए शुभ ग्रह गोचर क्या होता है-
(1) वर के लिए- सूर्य
(क) शोभन-वर की जन्मराशि से सूर्य का 3,6,10,11 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'शुभ' होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-शुभ</strong>
(ख) पूज्य-वर की जन्मराशि से सूर्य का 1,5,2,7,9 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'पूज्य' होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-पूजा उपरांत विवाह शुभ</strong>
(ग) अपूज्य-वर की जन्मराशि से सूर्य का 4,8,12 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'अपूज्य' होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-विवाह वर्जित अति आवश्यक होने पर ही पूजा उपरांत विवाह</strong>
(2) वर के लिए- चंद्र
(क) अपूज्य-वर की जन्मराशि से चंद्र का 4,8,12 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'अपूज्य' होता है, शेष सभी स्थानों में शुभ होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-विवाह वर्जित </strong>
(शास्त्रानुसार वर एवं वधू के लिए चंद्र का शुभ गोचर अति आवश्यक है। चंद्र के अशुभ स्थानों पर गोचरवश स्थित होने पर विवाह वर्जित करना ही श्रेयस्कर है। अशुभ चंद्र का ग्रहशान्ति पूजा आदि से कोई भी परिहार नहीं होता।)
(1) कन्या के लिए- गुरु
(क) शोभन-कन्या की जन्मराशि से गुरू का 2,5,7,9,11 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'शुभ' होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-शुभ</strong>
(ख) पूज्य-कन्या की जन्मराशि से गुरु का 1,3,6,10 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'पूज्य' होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-पूजा उपरांत विवाह शुभ</strong>
(ग) अपूज्य-कन्या की जन्मराशि से गुरु का 4,8,12 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'अपूज्य' होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-विवाह वर्जित अति आवश्यक होने पर ही पूजा उपरांत विवाह।</strong>
(2) कन्या के लिए- चंद्र
(क) अपूज्य-कन्या की जन्मराशि से चंद्र का 4,8,12 स्थानों (भाव) में गोचरवश स्थित होना 'अपूज्य' होता है, शेष सभी स्थानों में शुभ होता है।
<strong>विवाह मुहूर्त-विवाह वर्जित</strong>
(शास्त्रानुसार वर एवं वधू के लिए चंद्र का शुभ गोचर अति आवश्यक है। चंद्र के अशुभ स्थानों पर गोचरवश स्थित होने पर विवाह वर्जित करना ही श्रेयस्कर है। अशुभ चंद्र का ग्रहशांति पूजा आदि से कोई भी परिहार नहीं होता।)
आशा है उपर्युक्त विवेचन से पाठकों को यह स्पष्ट हो गया होगा कि विवाह मुहूर्त निर्धारण में त्रिबल शुद्धि कितनी महत्वपूर्ण है। हमारे मतानुसार विवाह मुहूर्त निर्धारण एक अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है जो उत्तम विद्वत्ता की अपेक्षा करती है। अत: विवाह मुहूर्त का निर्धारण करते समय एक विद्वान दैवज्ञ का मार्गदर्शन लेना सदैव श्रेयस्कर रहता है।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
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