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देश में इमरजेंसी लगाए जाने के करीब पांच दशक बाद कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है. उन्होंने माना कि इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया था, लेकिन यह सब संवैधानिक तरीके से हुआ था. साथ ही उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का बचाव करते हुए कहा कि उस वक्त देश में तेजी से बिगड़ते हालात से निपटने के लिए वह संघर्ष कर रही थीं.

‘द हिंदू’ को दिए एक इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने ये बातें अपनी किताब ‘Belonging: A Journey of Love’ के लॉन्च से पहले कहीं. उन्होंने कहा कि आज पीछे मुड़कर देखने पर उस दौर की घटनाओं को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. सोनिया के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने भी बाद में इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों पर सार्वजनिक रूप से अफसोस जताया था और माफी मांगी थी.

‘संजय गांधी ही नहीं, वरिष्ठ नेताओं का भी था दबाव’

इंटरव्यू में जब सोनिया गांधी से पूछा गया कि इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों के लिए संजय गांधी का नाम सबसे ज्यादा क्यों लिया जाता है और क्या इंदिरा गांधी अपने बड़े बेटे राजीव गांधी समेत दूसरे लोगों की सलाह मानतीं तो हालात अलग हो सकते थे, इस पर उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के लिए सिर्फ संजय गांधी को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता.

सोनिया गांधी ने कहा, ‘संजय गांधी ही अकेले नहीं थे, हालांकि आम लोगों की नजर में उन्हें अक्सर इमरजेंसी का पर्याय माना जाता है. इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था. मुझे लगता है कि उनके आसपास बहुत कम लोग ऐसे थे, जिनकी राय राजीव गांधी की तरह अलग थी.’ उन्होंने आगे कहा कि आखिरकार उनकी सास इंदिरा गांधी ने अपनी समझ से हालात को पहचाना और उन्हें सुधारने के लिए कदम उठाए.

‘लोकतांत्रिक अधिकार छीने गए, लेकिन संवैधानिक तरीके से’

सोनिया गांधी ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान वास्तव में क्या हो रहा था, इसकी गंभीरता उन्हें बाद में समझ आई. उन्होंने स्वीकार किया कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक लगाई गई थी और बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस का अधिकार भी निलंबित कर दिया गया था. हालांकि, उनके मुताबिक यह सब संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ था.

इंदिरा गांधी के नजरिए से उस दौर को देखने की बात करते हुए सोनिया ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री तेजी से बिगड़ते हालात से निपटने की कोशिश कर रही थीं. उस समय हिंसक प्रदर्शन हो रहे थे, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन को आग के हवाले किया जा रहा था. व्यापक स्तर पर संगठित अशांति थी और यहां तक कि नौकरशाही तथा सशस्त्र बलों से सरकारी आदेशों की अवहेलना करने की अपील भी की जा रही थी. सोनिया ने कहा कि समय बीतने के बाद घटनाओं को बेहतर परिप्रेक्ष्य में समझने का मौका मिलता है.

‘इंदिरा गांधी ने खुद जताया था अफसोस’

सोनिया गांधी ने इस बात का भी जिक्र किया कि इंदिरा गांधी ने बाद में हालात को समझा और मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला लिया. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों पर सार्वजनिक रूप से अफसोस जताया और माफी भी मांगी थी.

25 जून 1975 को लगी थी इमरजेंसी, मार्च 1977 में हुई खत्म

गौरतलब है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात से देश में इमरजेंसी लागू की थी. उनकी सलाह पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली.

18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान किया और सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का फैसला लिया. 16 मार्च 1977 को हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी दोनों को हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद 21 मार्च 1977 को देश से इमरजेंसी हटा ली गई.

बीजेपी इमरजेंसी को बताती है ‘लोकतंत्र की हत्या’

इमरजेंसी को लेकर बीजेपी लगातार कांग्रेस पर हमलावर रही है. बीजेपी इसे भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय और ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार देती है. केंद्र की मोदी सरकार 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाती है. सरकार का कहना है कि इस दिन का मकसद इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन को याद रखना और लोगों को उस दौर की घटनाओं से अवगत कराना है.

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