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बागेश्वर: उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में दीपावली का त्योहार केवल दीप जलाने और मिठाइयां बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस पर्व के साथ कई ऐसी पारंपरिक मान्यताएं और लोककलाएं भी जुड़ी हैं. जो पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को बताती है. इन्हीं में से एक ऐपण कला भी है. दीपावली से पहले घरों की देहली, आंगन और मंदिरों में ऐपण बनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसे शुभता, पवित्रता और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. आज भी कुमाऊं के कई घरों में महिलाएं इस परंपरा को पूरी आस्था से निभाती हैं.

पुराने समय में ऐपण बनाने के लिए पारंपरिक रूप से गेरू और चावल के घोल का यूज किया जाता है. सबसे पहले घर की देहली या आंगन को साफ किया जाता है. इसके बाद जमीन पर गेरू की लाल रंग की लेयर तैयार की जाती है. सूखने के बाद चावल को भिगोकर पीसकर बनाए गए सफेद घोल से उस पर विभिन्न आकृतियां उकेरी जाती हैं. इस तरह लाल और सफेद रंगों का सुंदर मेल ऐपण को आकर्षक रूप देता है. इसे बनाने के लिए पहले महिलाएं अपनी उंगलियों का यूज करती थीं, हालांकि अब कई जगह ब्रश और अन्य साधनों का भी यूज किया जाता है.

कैसे बनाएं ऐपण

ऐपण आर्टिस्ट रिचा जोशी बताती है कि वर्तमान में पारंपरिक ऐपण कला को बनाना पहले से आसान हो गया है. अब लोग एक्रिलिक और ऑयल पेंट का यूज कर इसे बनाते हैं. इसे बनाने के लिए सबसे पहले फर्श, लकड़ी या बोर्ड को साफ कर लाल रंग का बेस तैयार किया जाता है. इसके सूखने के बाद सफेद पेंट से माता के कदम, स्वस्तिक, लक्ष्मी चौकी और पारंपरिक आकृतियां बनाई जाती हैं. इसके लिए बारीक ब्रश, सफेद एक्रिलिक कोन या थ्रीडी आउटलाइनर का यूज किया जाता है. समानांतर रेखाएं और बिंदु ऐपण की खास पहचान हैं.

मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए बनाए जाते हैं पैरों के निशान

दीपावली पर ऐपण बनाने के पीछे धार्मिक मान्यता भी जुड़ी हुई है. इस दिन महिलाएं घर की देहली पर मां लक्ष्मी के छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाती हैं. इन निशानों को घर के बाहर से अंदर की ओर बनाया जाता है. मान्यता है कि इससे मां लक्ष्मी घर में प्रवेश करती हैं, और परिवार में सुख, शांति व समृद्धि का वास होता है. इसके अलावा ऐपण में कमल, स्वास्तिक, दीपक और अन्य शुभ प्रतीकों को भी स्थान दिया जाता है. कमल को मां लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है, जबकि स्वास्तिक को मंगल और शुभता का प्रतीक माना जाता है.

मंदिरों में भी बनाई जाती हैं शुभ आकृतियां

कुमाऊं में दीपावली के अवसर पर केवल घरों की देहली ही नहीं, बल्कि पूजा स्थल और मंदिरों को भी ऐपण से सजाया जाता है. पूजा की चौकी, तुलसी के पास और घर के मंदिर में विशेष आकृतियां बनाई जाती हैं. अलग-अलग धार्मिक अवसरों पर ऐपण के डिजाइन भी बदलते हैं. पूजा और अनुष्ठानों में इन आकृतियों को शुभ शुरुआत और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है. ऐपण बनाने से घर का वातावरण पवित्र होता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है.

पीढ़ियों से महिलाओं के हाथों जीवित है लोककला

ऐपण केवल सजावट की कला नहीं, बल्कि कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. पहले घर की बुजुर्ग महिलाएं परिवार की बेटियों और बहुओं को ऐपण बनाना सिखाती थीं. इस तरह यह कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही है. समय के साथ ऐपण के स्वरूप में बदलाव आया है. अब इसे कपड़ों, लकड़ी, पूजा की थालियों, कैनवास और सजावटी वस्तुओं पर भी बनाया जाने लगा है.

रोजगार का भी बना माध्‍यम

कई महिलाएं इसे स्वरोजगार का माध्यम भी बना रही हैं. हालांकि आधुनिक रंगों और डिजाइन के बढ़ते चलन के बावजूद दीपावली पर गेरू और चावल के घोल से पारंपरिक ऐपण बनाने का महत्व आज भी बरकरार है. कुमाऊं में दीपावली का पर्व ऐपण के बिना अधूरा माना जाता है. यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और लोक विरासत से जोड़ने का काम भी कर रही है.

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