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चुनाव आयोग ने ऑनलाइन वोटर फॉर्म 6 से SIR से जुड़ा विवादित कॉलम हटा दिया है. यह वही घोषणा थी जिसे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने अगस्त में अनधिकृत और गैरकानूनी बताया था. दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी कहा था कि नियमों में बदलाव के बिना फॉर्म में नई शर्त नहीं जोड़ी जा सकती. अब आयोग ने 21 अक्टूबर को इसे फॉर्म 6 से अलग करने का फैसला लिया. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में भी इसकी जानकारी दी गई है. हालांकि SIR घोषणा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. अब आवेदकों को फॉर्म 6 और घोषणा पत्र अलग-अलग भरना होगा.
चुनाव आयोग ने ऑनलाइन वोटर फॉर्म 6 से SIR घोषणा अलग कर दी है. (फाइल फोटो)
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर एक बड़ा फैसला बदल दिया है. नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण से अब SIR से जुड़ा घोषणा पत्र हटा दिया गया है. यह वही कॉलम था जिसे लेकर चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने पहले ही कानूनी सवाल उठाए थे. इलेक्शन कमिश्नर सुखबीर सिंह संधू ने इसे अनधिकृत और गैरकानूनी तक बताया था. वहीं विवेक जोशी ने कहा था कि नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म में ऐसी नई शर्त नहीं जोड़ी जा सकती. अब आयोग ने इस घोषणा पत्र को फॉर्म 6 से अलग कर दिया है. यानी नए मतदाताओं को अब दोनों दस्तावेज अलग-अलग भरने होंगे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यह बदलाव 21 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग के इलेक्टोरल रोल डिवीजन के फैसले के बाद हुआ है. आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में भी इसकी जानकारी दी थी. इसके मुताबिक पहले SIR घोषणा को फॉर्म 6 के साथ इसलिए जोड़ा गया था ताकि आवेदक को एक ही ओटीपी और एक ही ई-सिग्नेचर से प्रक्रिया पूरी करने में आसानी हो. लेकिन बाद में इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठे. अब ऑनलाइन आवेदन भी कागजी आवेदन की तरह दो हिस्सों में होगा. फॉर्म 6 अलग रहेगा और SIR घोषणा पत्र अलग. इस फैसले के साथ आयोग ने पिछले कुछ हफ्तों में अपने कई पुराने निर्णयों में बदलाव किया है.
क्या था फॉर्म 6 में जोड़ा गया विवादित कॉलम?
फॉर्म 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए किया जाता है. ऑनलाइन फॉर्म में पहले एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी. इसमें आवेदक को तीन विकल्पों में से एक चुनना होता था.
- क्या उसका नाम पिछली SIR के दौरान बनी मतदाता सूची में था?
- क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस सूची में दर्ज था?
- क्या आवेदक और उसके माता-पिता का नाम उस पुरानी सूची में नहीं था?
इस घोषणा का जवाब दिए बिना आवेदक आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता था. विवाद इसी बात पर था कि क्या चुनाव आयोग नियमों में बदलाव किए बिना निर्धारित फॉर्म में नई शर्त जोड़ सकता है.
दो इलेक्शन कमिश्नर ने उठाए थे कानूनी सवाल
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई थी. उनका कहना था कि फॉर्म 6 का प्रारूप मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत निर्धारित है. इसमें बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. इसके लिए आयोग खुद से नया प्रावधान नहीं जोड़ सकता.
इसके बाद सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त को अपनी टिप्पणी में इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताया था. उन्होंने इस घोषणा को तत्काल हटाने की बात कही थी. लेकिन अगस्त में भी ऑनलाइन फॉर्म में यह कॉलम मौजूद था. इस मुद्दे पर 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद विवाद और गहरा गया था.
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या सफाई दी?
चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि फॉर्म 6 में कानूनी संशोधन नहीं किया गया था. आयोग के मुताबिक SIR घोषणा को ऑनलाइन फॉर्म के साथ जोड़ने का उद्देश्य सिर्फ प्रक्रिया आसान बनाना था. इससे आवेदक को दो अलग-अलग ओटीपी और ई-सिग्नेचर की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर घोषणा दिखाने का तरीका ऐसा था जिससे यह लग सकता था कि फॉर्म 6 में संशोधन कर दिया गया है. आयोग ने कहा कि फॉर्म 6 में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही है. इसी चिंता के बाद 21 अक्टूबर को इसे अलग करने का फैसला लिया गया.
पांच हफ्तों में आयोग ने बदले कई और फैसले
- फॉर्म 6 का बदलाव अकेला मामला नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मुद्दों पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इसके बाद करीब पांच हफ्तों में आयोग ने कई व्यवस्थाओं में बदलाव किए हैं.
- आयोग ने अब अपनी बैठकों के एजेंडे पहले साझा करने और बैठक के बाद कार्यवाही का विवरण जारी करने का फैसला किया है. अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी की गई है. नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल भी पहले अधिकारियों की समिति और फिर पूरे आयोग की मंजूरी से तैयार किए जाएंगे.
- इसके अलावा ECINet सिस्टम के कानूनी प्रावधानों के अनुरूप काम करने की जांच के लिए समिति बनाई गई है. महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से सुझाए गए कुछ बदलाव भी लागू किए गए हैं. अब मतदाताओं को दस्तावेज देने के लिए पहले से तय 13 श्रेणियों तक सीमित नहीं रखा जाएगा. तार्किक विसंगतियों वाले मामलों में जिला निर्वाचन अधिकारी के बजाय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी भी फैसला ले सकेंगे.
97 मतदाताओं का मामला भी फिर चर्चा में
- गोवा में 97 ऐसे मतदाताओं का मामला भी सामने आया था जिनके नाम प्रारंभिक सूची से हटाए गए थे. दस्तावेज देने के बाद स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें बहाल करने की मंजूरी दी थी लेकिन ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर में नाम वापस जोड़ने का विकल्प नहीं था. आयोग के हलफनामे के मुताबिक अब 97 में से 88 लोगों ने फॉर्म 6 भरा है और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए हैं. छह लोग देश से बाहर हैं जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट हैं.
- फॉर्म 6 से SIR घोषणा को अलग करने का फैसला ऐसे समय आया है जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है. अब सबसे अहम सवाल यह है कि अलग घोषणा पत्र की व्यवस्था जमीन पर किस तरह लागू होती है और नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन पर इसका क्या असर पड़ता है.
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