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प्रतीकात्मक तस्वीर
– फोटो : freepik

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उम्र 71 साल…। मन में हजारों आशंकाएं…। बेचैनी इतनी कि खुद को रस्सियों से बंधवाने पर ही सुकून मिलता था। कभी लगातार टहलते रहते, तो कभी बेचैनी कम करने के लिए एक साथ कई लीटर पानी पी जाते। परिवार की सलामती, आर्थिक सुरक्षा, अपनी सेहत और भविष्य की चिंता ने उन्हें इस कदर घेर लिया कि सामान्य जीवन मुश्किल हो गया। यह किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि पूर्वी दिल्ली स्थित मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) में सामने आया एक मामला है। यहां डॉक्टरों ने चार सप्ताह के उपचार से बुजुर्ग की हालत में ऐसा सुधार किया कि उन्हें खुद को बांधने की जरूरत ही नहीं रही।


इहबास के जेरियाट्रिक मेंटल हेल्थ विभाग के प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. ओम प्रकाश और डॉ. श्रेयशी कोनर के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बुजुर्ग करीब एक साल से लगातार चिंता और मानसिक बेचैनी से जूझ रहे थे। कभी उन्हें अपनी सेहत बिगड़ने का डर सताता, तो कभी परिवार की भलाई और आर्थिक भविष्य की चिंता परेशान करती। बढ़ती उम्र में दूसरों पर निर्भर होने और मृत्यु का भय भी उनकी बेचैनी बढ़ा रहा था।

बेचैनी में 30 से 45 मिनट तक टहलते रहते

बुजुर्ग को दिन में एक-दो बार बेचैनी का तेज दौरा पड़ता था। यह 30 से 45 मिनट तक चलता था। इस दौरान वह एक जगह बैठ नहीं पाते और लगातार टहलते रहते थे। मन की उथल-पुथल से राहत पाने का कोई रास्ता नहीं सूझता, तो परिवार के सदस्यों से उन्हें बिस्तर पर रस्सियों से बांधने की गुहार लगाते थे। 

चिंता का स्कोर 40 से घटकर 17 पर आया

डॉक्टरों ने मानसिक स्थिति, याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता की जांच के बाद पैनिक अटैक और जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर (जीएडी) की पहचान की। इस विकार में व्यक्ति छोटी-बड़ी बातों को लेकर लगातार चिंतित रहता है और चाहकर भी चिंता पर काबू नहीं कर पाता। बुजुर्ग को चार सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रखकर दवाओं, विश्राम संबंधी व्यायाम और नियमित दिनचर्या के जरिए उपचार दिया गया। परिवार के सदस्यों की काउंसलिंग भी की गई। इलाज के बाद चिंता का स्कोर 40 से घटकर 17 रह गया। 

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