जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने कहा कि नाबालिग के साथ दुष्कर्म के बाद गर्भपात की अनुमति देने के सवाल को केवल पीड़िता के अधिकारों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए. यह मानवाधिकार और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार से भी जुड़ा मामला है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जाती, तो इसका असर पीड़िता के सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार पर पड़ सकता है.
‘खुद किशोरावस्था से गुजर रही है नाबालिग’
अदालत ने अपने फैसले में पीड़िता की उम्र और परिस्थितियों को खास महत्व दिया. जस्टिस पुष्कर्णा ने कहा कि एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता से बच्चे को जन्म देने और उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा करना उचित नहीं है, खासकर तब, जब वह खुद किशोरावस्था के दौर से गुजर रही हो.
पीड़िता की ओर से दायर याचिका में उसकी मां ने भी आशंका जताई थी कि गर्भावस्था जारी रहने से लड़की को गंभीर मानसिक आघात पहुंच सकता है. मामले की परिस्थितियों और चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद अदालत ने नाबालिग के सर्वोत्तम हित में गर्भपात की अनुमति दे दी.
31 सप्ताह का गर्भ, मेडिकल बोर्ड ने क्या कहा?
मामले में अदालत को बताया गया कि लड़की को पहले ही दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराया जा चुका है. चिकित्सा बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पीड़िता गर्भपात की प्रक्रिया से गुजरने के लिए चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ है.
गौरतलब है कि गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम के तहत सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक और कुछ विशेष श्रेणियों में, जिनमें दुष्कर्म पीड़िताएं भी शामिल हैं, 24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति का प्रावधान है. ऐसे में 31 सप्ताह की गर्भावस्था से जुड़ा यह मामला अदालत के सामने पीड़िता के अधिकारों, स्वास्थ्य और सर्वोत्तम हित का महत्वपूर्ण सवाल लेकर आया.
DNA जांच के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे भ्रूण के ऊतक
अदालत ने गर्भपात की अनुमति देने के साथ आपराधिक मामले से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए. चिकित्सकों को भ्रूण के ऊतकों को संरक्षित रखने को कहा गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर डीएनए जांच की जा सके. गर्भपात की चिकित्सकीय प्रक्रिया पर आने वाला पूरा खर्च राज्य सरकार उठाएगी.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होता है, तो अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक यह सुनिश्चित करें कि उसे हरसंभव चिकित्सकीय सहायता मिले. ऐसी स्थिति में नाबालिग और उसके परिवार की इच्छा के अनुसार, निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चे को गोद देने की व्यवस्था भी की जाए.
पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने का आदेश
अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता और नाबालिग पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जानी चाहिए. यह आदेश उस याचिका पर दिया गया, जिसमें बताया गया था कि यौन उत्पीड़न के बाद लड़की गर्भवती हो गई थी.
यह फैसला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि यौन हिंसा से गुजरने वाली नाबालिग के मामले में न्याय केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं रह सकता. उसकी उम्र, मानसिक स्थिति, स्वास्थ्य, गरिमा और भविष्य को भी ध्यान में रखना जरूरी है. अदालत ने इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ पीड़िता के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी.
- व्हाट्स एप के माध्यम से हमारी खबरें प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
- टेलीग्राम के माध्यम से हमारी खबरें प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
- हमें फ़ेसबुक पर फॉलो करें।
- हमें ट्विटर पर फॉलो करें।
———-
🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।
Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||


