पूर्व अधिकारियों ने चुनाव आयोग के समर्थन में क्या कहा?
खुली चिट्ठी में अधिकारियों ने कहा कि चुनाव में धांधली के आरोपों को केवल राजनीतिक दावों के आधार पर सही नहीं माना जा सकता. उनके मुताबिक, चुनाव आयोग की व्यवस्था में मतदान केंद्र से लेकर मतगणना तक अलग-अलग स्तरों पर निगरानी और सुरक्षा के प्रावधान हैं. अधिकारियों ने अपने प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने मतदाता सूची तैयार करने से लेकर मतदान दलों के प्रशिक्षण और स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा तक की प्रक्रियाओं को देखा है.
चिट्ठी में पुराने दौर में बूथ कैप्चरिंग, मतपेटियों में गड़बड़ी और मतदाताओं को मतदान से रोकने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है. अधिकारियों का कहना है कि चुनावी व्यवस्था में समय के साथ सुरक्षा उपाय विकसित हुए हैं. इसलिए मौजूदा चुनावों को बिना प्रमाण धांधली वाला बताना उचित नहीं है.
बिहार चुनाव 2025 को लेकर अधिकारियों ने कौन से आंकड़े दिए?
चिट्ठी में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को चुनावी व्यवस्था के उदाहरण के रूप में पेश किया गया है. पूर्व अधिकारियों के अनुसार, बिहार में 1951 के बाद सबसे अधिक मतदान दर्ज किया गया और चुनाव के दौरान किसी भी सीट पर दोबारा मतदान कराने की जरूरत नहीं पड़ी. उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया.
अधिकारियों ने बिहार में चुनावी प्रक्रिया की तुलना पुराने दौर की बूथ कैप्चरिंग से करते हुए इसे व्यवस्था में आए बदलाव के रूप में देखा है. हालांकि, चिट्ठी में दिए गए ये आंकड़े हस्ताक्षरकर्ताओं के दावे हैं. इन्हें चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के साथ अलग से देखना जरूरी है.
क्या चुनाव हारने के बाद धांधली का आरोप लगाना सही है?
पूर्व अधिकारियों ने चिट्ठी में कहा कि किसी चुनावी व्यवस्था को जीत के समय सही और हार के बाद गलत नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि उसी चुनाव आयोग के कार्यकाल में केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी ने लोकसभा में अपना बहुमत खो दिया था. चिट्ठी में हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में हुए चुनावों का भी जिक्र है.
अधिकारियों का तर्क है कि चुनाव आयोग की व्यवस्था पर सवाल उठाते समय अलग-अलग चुनावों के नतीजों को भी ध्यान में रखना चाहिए. उनके मुताबिक, चुनावी धांधली के आरोपों की जांच प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए. केवल राजनीतिक बयान या आशंका किसी आरोप को साबित नहीं करती.
SIR में मृत मतदाताओं और डुप्लीकेट नामों को लेकर क्या दावा किया गया?
चिट्ठी में बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विस्तार से बात की गई है. पूर्व अधिकारियों के अनुसार, बिहार में 2003 के बाद व्यापक गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था. इस प्रक्रिया में करीब 22 लाख मृत मतदाताओं और 7 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान किए जाने का दावा किया गया है. अधिकारियों ने कहा कि कई ऐसे मतदाताओं के नाम भी मिले जो स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके थे.
हस्ताक्षरकर्ताओं के मुताबिक, मतदाता सूची में गलत या अपात्र प्रविष्टियां बनी रहने से फर्जी मतदान की आशंका पैदा हो सकती है. इसलिए सूची को अपडेट करना जरूरी है. उन्होंने यह भी बताया कि पुनरीक्षण के दौरान करीब 21.5 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया.
अधिकारियों ने एसआईआर को मतदाताओं को बाहर करने की प्रक्रिया मानने के बजाय सूची को दुरुस्त करने की कवायद बताया है. हालांकि, किसी नाम की पहचान, मसौदा सूची से उसका बाहर होना और अंतिम सूची से उसका हटना अलग-अलग चरण हैं.
एसआईआर में नाम कटने पर मतदाताओं को क्या अधिकार दिए गए हैं?
चिट्ठी में पूर्व अधिकारियों ने कहा कि एसआईआर के तहत मसौदा मतदाता सूची में नाम नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता का नाम अंतिम रूप से हटा दिया गया है. उनके मुताबिक, किसी नाम को हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई का प्रावधान है. इसके बाद अपील के दो स्तर भी उपलब्ध हैं.
अधिकारियों ने राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों की भूमिका का भी उल्लेख किया है. उनके अनुसार, दल अपने प्रतिनिधियों को बूथ लेवल अधिकारियों के साथ तैनात कर सकते हैं. इससे मतदाता सूची में गलत प्रविष्टियों और पात्र मतदाताओं के नाम छूटने से जुड़ी शिकायतें सामने लाने में मदद मिल सकती है.
चिट्ठी में अधिकारियों ने कहा कि मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हटाने के साथ नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया भी चली. उनके मुताबिक, इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है.
एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
खुली चिट्ठी में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को भी अहम बताया गया है. हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार, अदालत ने एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार किया था और प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा उपाय तय किए थे. इनमें मसौदा सूची से बाहर रहे 65 लाख लोगों के नाम और उनके संबंध में कारण प्रकाशित करने का निर्देश भी शामिल था. चिट्ठी में ऑनलाइन दावा दाखिल करने और पहचान के प्रमाण के रूप में आधार स्वीकार करने का उल्लेख किया गया है.
चिट्ठी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा था. अधिकारियों ने अदालत के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए भी सुरक्षा उपाय उपलब्ध हैं.
चुनाव में धांधली के आरोप साबित करने के लिए क्या रास्ते बताए गए?
पूर्व अधिकारियों ने कहा कि चुनावी अनियमितताओं की शिकायत करने के लिए कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं. चिट्ठी के मुताबिक, मतदाता सूची में आपत्ति दर्ज कराने के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है. चुनाव परिणामों को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करने का भी प्रावधान है.
हस्ताक्षरकर्ताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाने वाले आरोपों और शपथ के साथ कानूनी प्रक्रिया में पेश किए जाने वाले दावों के बीच अंतर किया है. उनका कहना है कि गंभीर आरोपों को ऐसी प्रक्रिया में रखा जाना चाहिए जहां उनकी जांच हो सके और संबंधित पक्ष अपना जवाब दे सकें.
चिट्ठी में अधिकारियों ने नागरिकों से अपने और परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची में जांचने की अपील भी की है. उन्होंने कहा कि किसी पात्र मतदाता का नाम छूटने पर दावा दाखिल करने में उसकी मदद की जानी चाहिए. उनका मुख्य तर्क है कि चुनाव आयोग की आलोचना की जा सकती है, लेकिन वोट चोरी जैसे आरोपों को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं.
चिट्ठी पर किन 124 पूर्व अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए हैं?
जारी दस्तावेज के अनुसार, चिट्ठी पर पूर्व आईएएस, आईएफएस और अन्य सेवाओं के कुल 124 अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं. सूची में पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी और कर्नाटक के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव एम. मदन गोपाल के नाम शामिल हैं. हस्ताक्षरकर्ताओं में विभिन्न राज्यों के पूर्व मुख्य सचिव, पूर्व राजनयिक, आयकर विभाग के पूर्व अधिकारी और वन सेवा से जुड़े पूर्व वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं. चिट्ठी में उन्होंने चुनाव आयोग की व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा है कि चुनावी प्रक्रिया में खामियों की जांच होनी चाहिए, लेकिन पूरे चुनाव को धांधली वाला बताने से पहले आरोपों के समर्थन में प्रमाण पेश किए जाने चाहिए.
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