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Super El Nino Warning: प्रशांत महासागर के बढ़ते तापमान ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. देश के 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने संभावित सुपर अल नीनो को लेकर चेतावनी दी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर सूखे और भीषण गर्मी से लेकर जंगलों और समुद्री जीवन तक दिख सकता है. भारत में इस साल 4 जून से 19 सितंबर के बीच बारिश सामान्य से 15 फीसदी कम रही. दक्षिणी प्रायद्वीप में कमी 29 फीसदी रही. अब मानसून की वापसी के बीच प्रशांत महासागर पर नजर बढ़ गई है. वैज्ञानिकों ने रिसर्च और निगरानी तेज करने की अपील की है ताकि बदलते मौसम और प्राकृतिक तंत्र पर पड़ रहे असर को समय रहते समझा जा सके.
प्रशांत महासागर के बढ़ते तापमान के बीच 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने सुपर अल नीनो की चेतावनी दी है.
प्रशांत महासागर का पानी इन दिनों सिर्फ समुद्र का पानी नहीं रह गया है. वैज्ञानिक इसकी हर हलचल पर नजर रख रहे हैं. वजह है अल नीनो. अब इसके एक बेहद ताकतवर रूप यानी ‘सुपर अल नीनो’ को लेकर चिंता बढ़ रही है. देश के 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों और एक्सपर्ट ने इसे लेकर चेतावनी दी है. उन्होंने रिसर्च से जुड़े लोगों और विशेषज्ञों से बातचीत के बाद इस संभावित खतरे के लिए तैयार रहने की अपील की है. मामला सिर्फ समुद्र के तापमान तक सीमित नहीं है. इसका असर बारिश से लेकर गर्मी तक दिख सकता है. देश में सूखे का खतरा बढ़ सकता है. यहां तक कि जंगलों पर भी दबाव बढ़ सकता है. खेती और नेचुरल सिस्टम भी इसकी चपेट में आ सकते हैं. यानी आने वाले समय में मौसम का मिजाज एक बार फिर बड़ा सवाल बन सकता है.
खास बात यह है कि यह चेतावनी ऐसे वक्त आई है जब भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी शुरू हो चुकी है. मौसम विभाग के मुताबिक मानसून पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों से पीछे हट चुका है. TOI की रिपोर्ट के अनुसार अगले तीन से चार दिनों में राजस्थान के दूसरे हिस्सों के साथ पंजाब और सौराष्ट्र-कच्छ के कुछ इलाकों से भी मानसून की विदाई के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों की नजर अब समुद्र और मौसम के अगले संकेतों पर है. इस साल बारिश का आंकड़ा भी पूरी तरह राहत देने वाला नहीं रहा. 4 जून से 19 सितंबर के बीच देश में सामान्य से 15 फीसदी कम बारिश दर्ज हुई. दक्षिणी प्रायद्वीप में कमी 29 फीसदी रही. जून में बारिश 35 फीसदी कम रही. जुलाई में जरूर औसत से ज्यादा पानी बरसा. अगस्त में 213.3 मिलीमीटर बारिश हुई. यह 2001 के बाद अगस्त के लिए सातवीं सबसे कम बारिश थी.
सुपर अल नीनो को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
- अल नीनो का सीधा संबंध उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के सतही पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से है. जब समुद्र का तापमान लंबे समय तक बढ़ा रहता है तो दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर असर पड़ सकता है. इसी वजह से वैज्ञानिक अभी से इसके संकेतों को समझने में जुटे हैं.
- वैज्ञानिकों की अपील में कहा गया है कि ट्रॉपिकल पैसिफिक में अल नीनो से जुड़े चेतावनी संकेत दिखाई दे रहे हैं. समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी दर्ज हुई है. अगस्त में तापमान का अंतर 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है. वैज्ञानिकों की अपील में लगाए गए अनुमानों के मुताबिक यह अंतर आगे 4 डिग्री सेल्सियस से ऊपर भी जा सकता है. हालांकि यह भविष्य की संभावना है और इसे निश्चित घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता.
मौसम विभाग के आंकड़े भी कर रहे इशारा
इस पूरे घटनाक्रम को भारत के मानसून से जोड़कर भी देखा जा रहा है. 4 जून से 19 सितंबर के बीच देश में बारिश सामान्य से 15 फीसदी कम रही. दक्षिणी प्रायद्वीप में यह कमी 29 फीसदी तक पहुंची. जून में बारिश 35 फीसदी कम हुई थी. इसके बाद जुलाई में स्थिति बदली और उस महीने औसत से ज्यादा बारिश हुई. अगस्त में 213.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक साल 2001 के बाद अगस्त महीने में यह सातवीं सबसे कम बारिश रही. ऐसे में मानसून की वापसी के बीच वैज्ञानिकों की नई चेतावनी ने मौसम को लेकर चर्चा और बढ़ा दी है.
सूखा और गर्मी बढ़ा सकता है दबाव
वैज्ञानिकों ने संभावित मजबूत अल नीनो से जुड़े कई खतरों का जिक्र किया है. इनमें सूखा और भीषण गर्मी प्रमुख हैं. अगर ऐसे हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो किसानों पर दबाव बढ़ सकता है. मछुआरों और चरवाहों के सामने भी मुश्किलें आ सकती हैं. गर्मी बढ़ने से जंगलों में आग का खतरा भी बढ़ सकता है. प्राकृतिक तंत्र पहले से दबाव में हैं. ऐसे में तापमान और बारिश में बड़ा बदलाव उनकी स्थिति को और प्रभावित कर सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ मौसम की नजर से नहीं देखना चाहिए. इसका असर प्रकृति और उससे जुड़े सामाजिक तंत्र पर भी पड़ सकता है.
जंगलों से लेकर समुद्री जीवन तक असर
सुपर अल नीनो की आशंका सिर्फ जमीन पर होने वाले बदलावों तक सीमित नहीं है. वैज्ञानिकों ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर भी चिंता जताई है. कोरल ब्लीचिंग इसका एक बड़ा उदाहरण है. समुद्र का तापमान बढ़ने पर प्रवाल भित्तियों पर दबाव बढ़ सकता है. गंभीर स्थिति में उनके बड़े हिस्से को नुकसान पहुंच सकता है. जंगलों पर भी असर पड़ सकता है. लंबे सूखे और ज्यादा गर्मी से जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ सकती हैं. वर्षावनों के बड़े पेड़ों पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई गई है. इसके अलावा जानवरों के व्यवहार में बदलाव और फलों के उत्पादन में देरी जैसे असर भी सामने आ सकते हैं.
हर बदलाव तुरंत नजर नहीं आएगा
वैज्ञानिकों ने एक अहम बात पर ध्यान दिलाया है. प्रकृति में होने वाला हर बदलाव तुरंत दिखाई नहीं देता. बारिश कम होना या तापमान बढ़ना आसानी से महसूस किया जा सकता है. लेकिन जानवरों के व्यवहार में बदलाव या फलों के आने में देरी जैसे असर धीरे-धीरे सामने आते हैं. इसी वजह से 180 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने रिसर्च और निगरानी बढ़ाने की अपील की है. उनका कहना है कि अभी से प्राकृतिक तंत्र में हो रहे बदलावों को दर्ज करना जरूरी है. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि भविष्य में ऐसे मौसम का असर कितना गहरा हो सकता है.
मानसून और हिंद महासागर पर भी नजर
भारत के लिए मानसून बेहद अहम है. खेती से लेकर जल संसाधन तक इसकी भूमिका बड़ी है. मानसून के व्यवहार में बदलाव का असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है. इसलिए प्रशांत महासागर में होने वाली हलचल के साथ हिंद महासागर की स्थिति पर भी नजर रखी जाती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक आने वाला समय निगरानी और तैयारी का है. संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की पहचान करनी होगी. उन पर पड़ रहे मौजूदा दबाव को कम करना होगा. साथ ही मौसम और प्रकृति में होने वाले बदलावों को लगातार दर्ज करना होगा.
फरवरी 2027 तक रह सकती है अल नीनो की स्थिति
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने सितंबर की शुरुआत में कहा था कि मौजूदा अल नीनो की स्थिति आने वाले महीनों में बहुत मजबूत घटना का रूप ले सकती है और फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है. यह आकलन भी इस बात की ओर इशारा करता है कि आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी के जलवायु वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल ने PTI से कहा कि आने वाले समय का इस्तेमाल संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर नजर रखने और उनकी सुरक्षा के लिए किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि अभी जो बदलाव हो रहे हैं उन्हें दर्ज करना जरूरी है. साथ ही बचे हुए प्राकृतिक तंत्र को बचाना होगा और उन दबावों को कम करना होगा जो उन्हें पहले से कमजोर कर रहे हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक इस दौर से मिलने वाली जानकारी भारत को भविष्य में ज्यादा गर्मी और अस्थिर मौसम के लिए तैयारी करने में मदद कर सकती है.
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सुमित कुमार हिंदी पत्रकारिता का एक उभरता और सक्रिय नाम हैं. वर्तमान में वे News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और सेंट्रल डेस्क टीम का हिस्सा हैं. पिछले चार साल से वे Network18और पढ़ें
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