1970 के दशक में जब अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ वाला किरदार थिएटर में छाया हुआ था और विनोद खन्ना का डैशिंग स्वैग थिएटर में गूंज रहा था. इन दोनों सुपरस्टार्स के बीच जबरदस्त मुकाबले के बीच, एक और स्टार चुपचाप सफलता की नई राह बना रहा था. वह सुपरस्टार कोई और नहीं बल्कि बॉलीवुड के ‘जंपिंग जैक’ जितेंद्र थे. जब मीडिया और दर्शक अमिताभ और विनोद खन्ना के बीच की टक्कर में बिजी थे, जितेंद्र ने चुपचाप बॉक्स ऑफिस पर एक अनोखा और मजबूत साम्राज्य खड़ा किया, फिर कई सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं.
नई दिल्ली. 1970 का दशक इंडियन सिनेमा का गोल्डन एरा था, जब अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना बॉक्स ऑफिस पर नंबर वन स्पॉट के लिए कांटे की टक्कर में थे. फिल्म मैगजीन से लेकर गॉसिप मिल्स तक, इन दोनों एक्टर्स के स्टारडम की हर जगह चर्चा होती थी. लेकिन इस शोर-शराबे के बीच, जितेंद्र ने एक अलग रास्ता चुना. वह न तो ‘एंग्री यंग मैन’ के क्रेज में पड़े और न ही किसी कॉन्ट्रोवर्सी में फंसे. जितेंद्र ने लगातार फैमिली-ओरिएंटेड, म्यूजिकल और हल्की-फुल्की ड्रामा फिल्मों पर फोकस किया. उनकी स्ट्रेटेजिक साइलेंस ने उन्हें एक लॉयल ऑडियंस दिलाई जिसने उन्हें हर फ्राइडे बॉक्स ऑफिस सक्सेस की गारंटी दी.
60 के दशक के आखिर में फिल्म ‘फर्ज’ से उभरने के बाद, जितेंद्र को ‘जंपिंग जैक’ का टैग मिला. 70 के दशक में उन्होंने इस इमेज को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया. जहां अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की फिल्में अक्सर एक्शन और वायलेंस से भरी होती थीं, जो खासकर यंग ऑडियंस को अट्रैक्ट करती थीं, वहीं जितेंद्र की फिल्में पूरे परिवार को टारगेट करती थीं. फीमेल ऑडियंस और फैमिलीज जितेंद्र की फिल्मों का बेसब्री से इंतजार करती थीं. उनके टाइमलेस गाने, आसान एक्टिंग और डांस स्टाइल ने थिएटर्स में हमेशा हलचल बनाए रखी.
1970 के दशक में जितेंद्र ने हर जॉनर में अपनी एक्टिंग का हुनर साबित किया. 1971 में नासिर हुसैन की म्यूजिकल ‘कारवां’ ने थिएटर की कमाई के नए रिकॉर्ड बनाए. इसके बाद, गुलजार की ‘परिचय’ (1972) और ‘खुशबू’ (1975) जैसी क्लासिक्स में उन्होंने अपनी एक्शन इमेज से अलग हटकर अपनी जबरदस्त परफॉर्मेंस से क्रिटिक्स को हैरान कर दिया.
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1976 की मल्टी-स्टारर सुपर-फैंटेसी थ्रिलर ‘नागिन’ ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई, जिसमें उनकी परफॉर्मेंस को दर्शकों से बहुत अच्छे रिव्यू मिले. इसके बाद, 1977 में मनमोहन देसाई की मेगा-हिट फिल्म ‘धरम वीर’ में धर्मेंद्र के साथ उनकी जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा धमाल मचाया कि यह उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बन गई.
70 के दशक के फिल्ममेकर्स और ट्रेड एनालिस्ट्स के लिए जितेंद्र एक सेफ बेट माने जाते थे. जहां अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की फिल्मों के लिए बड़े बजट और लंबे शेड्यूल की जरूरत होती थी, वहीं जितेंद्र अपने पंक्चुएलिटी और डिसिप्लिन के लिए जाने जाते थे.
वह एक समय में कई शिफ्ट में काम करते थे, जिससे यह पक्का होता था कि उनकी फिल्में समय पर पूरी हों और रिलीज हों. जितेंद्र की फिल्मों का बजट अक्सर कंट्रोल में रहता था, जिससे यह पक्का होता था कि प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स को कभी भी बड़ा नुकसान न हो. यही वजह थी कि बड़े और छोटे, दोनों तरह के प्रोड्यूसर्स उन्हें अपनी फिल्मों में कास्ट करने के लिए बेताब रहते थे.
70 के दशक में चुपचाप बनाई गई इस मजबूत नींव पर, जितेंद्र ने 80 के दशक में कुछ ऐसा हासिल किया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. 70 के दशक की अपनी सफलता से मिले भरोसे को आगे बढ़ाते हुए, वह 80 के दशक में साउथ इंडियन सिनेमा (साउथ रीमेक) के सबसे बड़े स्टार बन गए.
‘हिम्मतवाला’, ‘तोहफा’ ‘मावली’ और ‘मांग भरो सजना’ जैसी फिल्मों से उन्होंने 80 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया. अमिताभ और विनोद की रेस से बाहर रहकर, जितेंद्र ने 70 के दशक में चुपचाप अपने लिए एक जगह बनाई, जिससे वे बॉलीवुड के सबसे लंबे समय तक चलने वाले और कमर्शियली सफल सुपरस्टार में से एक बन गए.
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