सपा की शुरुआत समाजवाद के नाम पर हुई
सबसे पहले जान लेते हैं कि आखिर सपा का उदय कब हुआ. और अगर यहां से पूरा मामला समझेंगे तो आगे की पूरी बात समझने में आसानी रहेगी. समाजवादी पार्टी की स्थापना 4 अक्टूबर 1992 को मुलायम सिंह यादव ने की थी. पार्टी की आधिकारिक वेबसाइट में लिखा है कि सपा यानी समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विचारधारा वाली पार्टी. यानी इसकी राजनीतिक पहचान सिर्फ एक जाति तक सीमित नहीं रही. लेकिन यूपी की सत्ता का इतिहास देखें तो सपा की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी यादव परिवार के बाहर नहीं गई. तो यह भी देख लेते हैं.
34 साल में सत्ता के दो ही सपा में चेहरे
सपा के गठन के बाद यूपी में जब-जब सपा पार्टी की सरकार बनी, मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव या अखिलेश यादव रहे. मुलायम 4 दिसंबर 1993 से 3 जून 1995 और फिर 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007 तक मुख्यमंत्री रहे. 2012 में सपा को बहुमत मिला तो अखिलेश यादव 15 मार्च 2012 को मुख्यमंत्री बने और 19 मार्च 2017 तक पद पर रहे. एक बात और हम सबको जान लेनी चाहिए कि मुलायम सिहं यादव सपा पार्टी के गठन से पहले भी एक बार सीएम बन चुके हैं. वे पहली बार 1989 में मुख्यमंत्री बने थे, जब समाजवादी पार्टी अस्तित्व में नहीं थी. यानी सपा बनने के बाद उसकी सरकारों की कमान यादव परिवार के दो नेताओं के पास रही.
अब सवाल PDA की राजनीति का है
अखिलेश यादव ने अपनी राजनीति को व्यापक सामाजिक गठजोड़ देने के लिए इस बार सारे तरकीब अपना रहे हैं. 10 साल से सत्ता से बेदखल अखिलेश हर हाल में यूपी की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं. तभी तो उन्होंने PDA में बदलाव किया है. इसके पहले पीडीए मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रहा है. इसी के भरोसे 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों में सपा ने 37 सीटें जीतकर अपना अब तक का सबसे बड़ा लोकसभा प्रदर्शन किया था. इस प्रदर्शन के बाद PDA को अखिलेश की सोशल इंजीनियरिंग के सफल प्रयोग के तौर पर देखा गया. लेकिन 2027 की लड़ाई 2024 से अलग है. लोकसभा चुनाव में केंद्र की सत्ता, राष्ट्रीय मुद्दे और गठबंधन की भूमिका अलग होती है. विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार, बूथ संगठन और मुख्यमंत्री का चेहरा ज्यादा निर्णायक हो सकता है.
इस बार PDA में ‘पंडित’ की एंट्री क्यों?
2026 में अखिलेश ने PDA की व्याख्या में जब नया विस्तार किया. तो उन्होंने ‘P’ को ‘पंडित’ से भी जोड़ दिया. उनका सीधा राजनीतिक संदेश ब्राह्मण समाज तक पहुंच बनाने का माना गया. मीडिया रिपोर्टों में इसे 2027 से पहले सपा के सामाजिक आधार को और फैलाने की कोशिश के तौर पर देखा गया है.
यादव से आगे निकलने की असली चुनौती
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यही जो पार्टी अब तक यादव-मुस्लिम समर्थन के साथ जोड़ी जाती रही है. वह क्या चुनाव जीतने के लिए इससे आगे जा पाएगी. ठाकुर, पंडित, गैर-यादव ओबीसी, दलित और दूसरी सामाजिक बिरादरियों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश अखिलेश कर ही रहे हैं. यही नहीं 2027 से पहले पार्टी की छात्र राजनीति में नीले रंग को अपनाने की योजना भी है. इसके पीछे दलित और अंबेडकरवादी राजनीति तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश मानी जा रही है. यानी अब पार्टी अपना रंग भी बदल सकती है. कुल मिलाकर PDA अब सिर्फ एक पुराना चुनावी नारा नहीं रह गया है. उसको अब सभी वर्ग चाहिए.
PDA मतलब ‘परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी’ वाला मामला यहीं दिखाई देता है
इसी एक मोड़ पर सपा की राजनीति के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है. पार्टी की स्थापना मुलायम सिंह यादव ने की. आज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उनके बेटे अखिलेश यादव हैं. अब यह जरूर उठता है कि अगर PDA सामाजिक प्रतिनिधित्व को व्यापक बनाने का मॉडल है, तो क्या भविष्य में पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व और सत्ता के शीर्ष स्तर पर भी उसका असर दिखाई देगा? यही वह सवाल है जिसे बीजेपी समेत सपा के राजनीतिक विरोधी परिवारवाद के मुद्दे के साथ उठाते रहे हैं. और आने वाले दिनों में उठेंगे भी. वैसे तो सपा पार्टी ने अलग-अलग समय में गैर-यादव ओबीसी, दलित, मुस्लिम और सवर्ण नेताओं को संगठन और चुनावी राजनीति में जगह तो दी है. इसलिए असली बहस प्रतिनिधित्व की मौजूदगी नहीं, बल्कि निर्णायक सत्ता में हिस्सेदारी की है.
2027 में PDA की असली परीक्षा
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव के सामने दोहरी चुनौती है. पहली, 2024 में बना सामाजिक गठजोड़ विधानसभा स्तर तक बनाए रखना. दूसरी, उसमें नए वर्गों को जोड़ना, ताकि सपा की पहचान सिर्फ यादव-मुस्लिम पार्टी के पुराने आरोप से आगे निकल सके. ‘पंडित’ को PDA से जोड़ना इसी विस्तार की कोशिश का संकेत है. वहीं बीजेपी भी PDA पर लगातार हमला कर रही है और सपा की सोशल इंजीनियरिंग को चुनौती देने की तैयारी में है. इसलिए 2027 का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि PDA में कौन-कौन शामिल है? असली सवाल यह होगा कि इस गठजोड़ को वोट में बदलने के बाद सपा संगठन, टिकट और सत्ता में कितनी हिस्सेदारी देती है. अगर PDA सिर्फ अलग-अलग जातियों का चुनावी जोड़ बनकर रह गया, तो विपक्ष इसे महज वोट बैंक की राजनीति कहेगा. लेकिन अगर अखिलेश इसे संगठन और नेतृत्व में वास्तविक सामाजिक विस्तार से जोड़ पाते हैं, तो यही PDA 2027 में सपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन सकता है.
आखिरकार फैसला यूपी की जनता करेगी
सपा के सामने 2027 में सबसे बड़ा सवाल यही है. क्या वह अपने पुराने सामाजिक आधार को छोड़े बिना नए सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ सकती है? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या ‘PDA’ सिर्फ चुनाव जीतने का गणित रहेगा या पार्टी के भीतर सत्ता और प्रतिनिधित्व का नया मॉडल भी बनेगा? क्योंकि 1992 से 2026 तक का इतिहास एक तथ्य बताता है कि सपा की सरकारों में मुख्यमंत्री की कुर्सी यादव परिवार के पास रही है. 2027 बताएगा कि अखिलेश यादव का नया PDA इस राजनीतिक विरासत को कितना बदलता है और कितना सिर्फ चुनावी समीकरण को.
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