तमिलनाडु की राजनीति में करीब पांच दशक पुराना वीरानम पेयजल परियोजना मामला फिर चर्चा में है. मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने विधानसभा में DMK पर हमला बोलते हुए सरकारिया आयोग की रिपोर्ट का हवाला दिया. उन्होंने 1970 से 1974 के बीच परियोजना के पाइपों के ठेके से जुड़े कथित कमीशन का जिक्र किया. रिपोर्ट के मुताबिक, 16 करोड़ रुपए से ज्यादा के ठेके में 2.5 प्रतिशत कमीशन मांगने का आरोप लगा था. कई किस्तों में करीब 29 लाख रुपए के भुगतान का भी जिक्र आया. विजय ने तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की भूमिका को लेकर दर्ज आरोप भी सामने रखे.
मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने विधानसभा में DMK पर हमला बोलते हुए करीब पांच दशक पुराने एक मामले का जिक्र किया. (फाइल फोटो)
मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में इसी पुराने मामले को उठाया. उन्होंने साफ कहा कि वह कोई नया आरोप नहीं लगा रहे हैं. वह सिर्फ सरकारिया आयोग की रिपोर्ट में दर्ज आरोपों और तथ्यों का हवाला दे रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, वीरानम परियोजना के लिए सत्यनारायण ब्रदर्स नाम की कंपनी को पाइप बनाने और सप्लाई करने का ठेका दिया गया था. ठेके की अनुमानित कीमत 16 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई गई थी. इसी ठेके की प्रक्रिया और कथित कमीशन को लेकर विवाद खड़ा हुआ था.
चेन्नई के लिए क्यों जरूरी थी वीरानम परियोजना?
वीरानम पेयजल परियोजना का मकसद चेन्नई जैसे बड़े शहर की पानी की जरूरत को पूरा करना था. 1970 के दशक की शुरुआत में यह परियोजना तमिलनाडु की महत्वपूर्ण योजनाओं में शामिल थी. इसके तहत पानी पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर पाइपों की जरूरत थी. इन्हीं पाइपों के निर्माण और सप्लाई के लिए ठेका प्रक्रिया शुरू हुई. बताया गया कि इस काम का ठेका सत्यनारायण ब्रदर्स नाम की कंपनी को दिया गया. उस समय ठेके की कीमत 16 करोड़ रुपए से अधिक बताई गई थी. रकम बड़ी थी और परियोजना भी महत्वपूर्ण थी. ऐसे में ठेके की प्रक्रिया बाद में जांच के दायरे में आ गई.
2.5 प्रतिशत कमीशन का आरोप क्या था?
वीरानम ठेके को लेकर सबसे बड़ा विवाद कथित कमीशन को लेकर था. सरकारिया आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में कहा कि ठेका दिए जाने के बदले 2.5 प्रतिशत कमीशन मांगने का आरोप लगाया गया था. रिपोर्ट में 1970 से 1974 के बीच कई किस्तों में करीब 29 लाख रुपए के भुगतान का भी जिक्र किया गया. यानी विवाद सिर्फ ठेका देने तक सीमित नहीं था. जांच में ठेके की रकम और कथित भुगतान के बीच संबंध को लेकर भी सवाल उठाए गए थे. यहां यह समझना जरूरी है कि ये बातें सरकारिया आयोग की जांच में दर्ज आरोपों का हिस्सा थीं. इन्हें मौजूदा समय में किसी नए आरोप के रूप में पेश नहीं किया गया है.
करुणानिधि को लेकर आयोग में क्या कहा गया?
मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में सरकारिया आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की भूमिका से जुड़े आरोप भी गिनाए. उनके मुताबिक, आयोग की रिपोर्ट में आरोप था कि करुणानिधि ने अपने आधिकारिक पद का इस्तेमाल ठेका दिलाने में मदद के लिए किया. रिपोर्ट के हवाले से यह भी कहा गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने चीफ इंजीनियर हुसैन पर टेंडर की रकम को लेकर दबाव डाला था. विजय ने इन बातों को अपनी ओर से लगाए गए नए आरोप की तरह पेश करने के बजाय आयोग में दर्ज आरोपों के तौर पर रखा.
सरकारिया आयोग बना ही क्यों था?
सरकारिया आयोग का गठन 1976 में तत्कालीन DMK सरकार के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए किया गया था. आयोग ने अलग-अलग मामलों की जांच की. इसी दौरान वीरानम पेयजल परियोजना से जुड़े ठेके की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आई.आयोग की रिपोर्ट में परियोजना के ठेके को लेकर लगाए गए कमीशन और भुगतान संबंधी आरोपों का उल्लेख किया गया. यही रिपोर्ट अब मुख्यमंत्री विजय के विधानसभा भाषण में फिर चर्चा में आ गई. यानी जिस मामले की जड़ 1970 के दशक में है, उसका राजनीतिक इस्तेमाल आज भी तमिलनाडु की सियासत में होता दिखाई दे रहा है.
विजय ने क्यों खोली करीब 50 साल पुरानी फाइल?
विधानसभा में बोलते हुए विजय ने कहा कि कुछ मामलों पर वह टिप्पणी नहीं करना चाहते क्योंकि वे अदालत या जांच के स्तर पर लंबित हो सकते हैं. लेकिन उन्होंने कहा कि जनता के सामने कुछ तथ्य रखना उनकी जिम्मेदारी है. इसी क्रम में उन्होंने सरकारिया आयोग की रिपोर्ट का जिक्र किया. वीरानम परियोजना का मामला उनके भाषण का अहम हिस्सा बना. विजय का जोर इस बात पर था कि वह खुद से कोई नया आरोप नहीं लगा रहे, बल्कि पहले से दर्ज आयोग की रिपोर्ट को सामने रख रहे हैं.
पुराने मामले से आज की सियासत तक
वीरानम परियोजना का विवाद अब सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है. तमिलनाडु की राजनीति में पुराने भ्रष्टाचार के आरोप समय-समय पर फिर सामने आते रहे हैं. मुख्यमंत्री विजय ने भी विधानसभा में इस मामले का जिक्र करके DMK के पुराने शासन पर सवाल उठाया. इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यही है कि 1970 से 1974 के बीच हुई परियोजना और उसके ठेके की प्रक्रिया पर बाद में सरकारिया आयोग ने जांच की थी. आयोग की रिपोर्ट में कमीशन, भुगतान और तत्कालीन मुख्यमंत्री की भूमिका को लेकर आरोप दर्ज किए गए. अब करीब पांच दशक बाद इन आरोपों का राजनीतिक मंच पर फिर जिक्र हुआ है. यही वजह है कि वीरानम परियोजना एक बार फिर तमिलनाडु की सियासत में चर्चा का विषय बन गई है.
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सुमित कुमार News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे पिछले 4 साल से यहां सेंट्रल डेस्क टीम से जुड़े हुए हैं. उनके पास जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री है. News18 हिंदी में काम करने से पहले, उन्ह…
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