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बॉलीवुड के इतिहास में बहुत कम ऐसी फिल्में आती हैं, जो न सिर्फ बॉक्स ऑफिस के तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त करती हैं, बल्कि समाज की सोच और संस्कृति को भी बदलकर रख देती हैं. 1 सितंबर 2006 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ऐसी ही एक कालजयी रचना साबित हुई. महज 19 करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने रिलीज होते ही देश भर में सफलता का ऐसा परचम लहराया कि पूरा बॉलीवुड देखता रह गया. ‘गांधीगिरी’ का नया नया मंत्र देने वाली यह फिल्म 2006 की तीसरी सबसे बड़ी और ब्लॉकबस्टर फिल्म बनी, जिसने बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत से कई गुना ज्यादा कमाई की.

नई दिल्ली. साल 2006 में जब निर्देशक राजकुमार हिरानी और निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी 2003 की हिट फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की अगली कड़ी पेश करने की योजना बनाई, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह पहली फिल्म से भी बड़ी ब्लॉकबस्टर बन जाएगी. महज 19 करोड़ रुपये के बजट में बनकर तैयार हुई ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ का मुकाबला उस साल रिलीज हुई कई भारी-भरकम और बड़े बजट की फिल्मों से था.

लेकिन 1 सितंबर 2006 को जैसे ही फिल्म थिएटर्स में उतरी, इसके मजबूत कंटेंट और दर्शकों के शानदार वर्ड-ऑफ-माउथ ने ऐसा जादू चलाया कि टिकट खिड़की पर लाइनें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी अनूठी और प्रासंगिक पटकथा थी. महात्मा गांधी के विचारों को आज के आधुनिक और आपाधापी भरे दौर में जिस सहज और मनोरंजक अंदाज में पेश किया गया, उसने हर उम्र के दर्शक के दिल को छू लिया.

फिल्म के मुख्य किरदार मुन्ना (संजय दत्त) और सर्किट (अर्शद वारसी) की केमिस्ट्री ने दर्शकों को हंसाते-हंसाते सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया. ‘गांधीगिरी’ शब्द रातोंरात युवाओं का हिस्सा बन गया, जहां लोग गुस्से और विरोध की जगह प्यार, फूल और मुस्कुराहट से अपनी बात मनवाने की सीख लेने लगे. इस सामाजिक प्रभाव ने फिल्म की कमाई को और ज्यादा गति दी.

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रिलीज के पहले दिन से ही फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी जबरदस्त पकड़ बना ली थी. ट्रेड एनालिस्ट्स और बॉलीवुड पंडित 19 करोड़ के बजट वाली इस फिल्म की सुनामी देखकर दंग रह गए थे. भारत में इस फिल्म ने 70 करोड़ रुपये से अधिक का नेट कलेक्शन किया, जबकि दुनिया भर में इसकी कमाई 120 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई.

उस दौर में अपनी लागत के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा कमाने के बाद यह फिल्म ब्लॉकबस्टर घोषित हुई. साल 2006 की बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट में ‘धूम 2’ और ‘क्रिश’ के बाद यह उस साल की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी. मुन्ना भाई और सर्किट के बिना इस फ्रैंचाइजी की सफलता की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

संजय दत्त ने ‘मुन्ना’ के रूप में अपनी छवि को पूरी तरह एक संवेदनशील और मसीहा जैसे किरदार में बदल दिया, वहीं अरशद वारसी ने ‘सर्किट’ के अपने कॉमिक टाइमिंग और वफादार दोस्त के किरदार से एक बार फिर साबित किया कि वे इस इंडस्ट्री के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं.

इसके अलावा विद्या बालन का ‘गुड मॉर्निंग मुंबई’ वाला रेडियो जॉकी अवतार और बोमन ईरानी का लालची लकी सिंह का किरदार फिल्म में चार चांद लगाता है. हर किरदार की अपनी एक खास जगह थी जिसने स्क्रीनप्ले को कहीं भी ढीला नहीं पड़ने दिया. ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल फिल्म नहीं थी, बल्कि इसे कई समारोहों में भी ऐतिहासिक सम्मान मिला.

फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म, सर्वश्रेष्ठ पटकथा, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (अरशद वारसी) और सर्वश्रेष्ठ गीत सहित 4 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किए. आज दो दशकों के बाद भी यह फिल्म जब भी टीवी या ओटीटी पर प्रसारित होती है, तो दर्शकों को उतनी ही ताजगी और खुशी देती है. 19 करोड़ की यह साधारण सी फिल्म आज भी पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए इस बात की मिसाल है कि मजबूत कहानी और दिल से बनाई गई फिल्म हमेशा इतिहास रचती है.

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