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घर वही है, कमरे वही हैं और परिवार भी अपना ही है लेकिन बातचीत के लिए वक्त नहीं बचा। सुबह से शाम तक बच्चे अपने काम में व्यस्त हैं, पोते-पोतियां मोबाइल और पढ़ाई में मशगूल हैं और बुजुर्ग खिड़की के पास बैठकर आने-जाने वालों को देखते रहते हैं। 

उम्र के इस पड़ाव पर जब उन्हें सबसे ज्यादा अपनेपन और बातचीत की जरूरत होती है, तब कई बुजुर्गों के हिस्से में खामोशी आ रही है। बुजुर्ग दिवस सिर्फ बुजुर्गों को सम्मान देने का एक दिन नहीं, बल्कि यह सोचने का मौका भी है कि क्या हमारे घरों में बुजुर्गों के लिए वास्तव में जगह बची है। 

राजिंदर प्लेस की रहने वाली 58 वर्षीय सुशीला बताती हैं, कि बच्चे विदेश में हैं। रोज फोन पर बात हो जाती है, कभी वीडियो कॉल भी हो जाती है। लेकिन फोन बंद होने के बाद घर फिर खाली लगता है। 

बच्चों ने देखरेख के लिए घरेलू सहायिका रखी है लेकिन वो अपनापन नहीं है। आरएमएल अस्पताल में अपनी 60 वर्षीय पत्नी का इलाज कराने आए 65 वर्षीय मनीकांत कौशल बताते हैं, कि आजकल हर काम मोबाइल से होता है। बैंक का काम हो, डॉक्टर की बुकिंग हो या पैसे भेजने हों बच्चों से पूछना पड़ता है। 

फोन ने बच्चों को दूर रहते हुए करीब तो कर दिया लेकिन हर काम के लिए उसी पर निर्भर भी 

बना दिया।

वृद्धाश्रम मजबूरी का ठिकाना नहीं, ये तो नई जिंदगी की शुरुआत है

एक तरफ ऐसे बुजुर्ग हैं जिन्हें परिवार ने छोड़ दिया या जिनके पास कोई सहारा नहीं। दूसरी तरफ ऐसे वरिष्ठ नागरिक भी हैं जो अपनी इच्छा से वृद्धाश्रम या सीनियर लिविंग कम्युनिटी में रहने का फैसला करते हैं। उन्हें वहां हमउम्र साथी, सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और बातचीत करने की सुविधा है। वृद्धाश्रम में मिले एक 80 वर्षीय बुजुर्ग ने बताया, कि उनकी पत्नी के मौत के बाद वह वृद्धाश्रम आ गए। उनकी कोई संतान नहीं है। वह फोन को सामाजिक दूरी का सबसे बड़ा कारण मानते हैं। वे कहते हैं, कि यदि मेरे पास आज स्मार्टफोन होता तो शायद मैं अकेले में कहीं फोन की स्क्रीन की लाइट के साथ दिन काट रहा होता। परिवार न होते हुए भी अगर वृद्धाश्रम में खुश हूं, तो इसकी वजह है फोन के बजाय लोगों से मित्रता करना। यहां मेरे जैसे कई बुजुर्ग हैं। उनकी खुशियों और बीते दिनों की कहानियों में पूरा दिन निकल जाता है।

दिल्ली में हाल ही में एक बुजुर्ग की मौत के मामले ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया। कालकाजी में 75 वर्षीय संगीतकार की लाश पांच दिन तक घर में सड़ती रही लेकिन थोड़ी ही दूर रहने वाले उनके बेटों ने बुजुर्ग की सुध नहीं ली। पुलिस के बुलाने के बाद भी बेटे दो दिन तक नहीं आए। यह महानगरों में अकेले रह रहे बुजुर्गों की उस जिंदगी की तस्वीर है।

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