यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यबृहस्पती।
एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवति तत्कृतम्॥
(श्रीमद्भागवत पुराण- 12.2.24)
अर्थ: जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति (गुरु ग्रह)—ये तीनों एक साथ ‘तिष्य’ (पुष्य नक्षत्र) में तथा एक ही राशि (कर्क राशि) में प्रवेश करेंगे, तब ‘कृतयुग’ (सत्ययुग) का प्रारंभ होगा।
पुष्य नक्षत्र का स्वामी बृहस्पति (गुरु) माना जाता है और यह नक्षत्र कर्क राशि के अंतर्गत आता है। इसलिए जब ये तीनों ग्रह कर्क राशि और पुष्य नक्षत्र के एक ही बिंदु पर मिलते हैं, तो उसे पौराणिक काल-गणना में सत्ययुग का प्रारंभिक संधिकाल (आरंभ बिंदु) माना गया है।
नोट: वर्तमान में 20 जुलाई से 03 अगस्त 2026 तक पुष्य नक्षत्र में सूर्य थे, 18 जून से 19 अगस्त तक गुरु पुष्य नक्षत्र में हैं। 11 से 12 अगस्त के दिन चंद्रमा भी पुष्य नक्षत्र में थे। यह तीनों कर्क राशि में थे लेकिन सूर्य देव चंद्रमा के पुष्य नक्षत्र में आने के पूर्व ही अश्लेषा नक्षत्र में गोचर कर गए इसलिए यह समय चूक गया। अब अगला संयोग बनेगा 2038 में जो कि पूर्ण संयोग रहेगा।
वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी गुरुवार दिने,
सेहि दिन कलिजुग होइब संपूर्णे।
सेहि दिन लंका रे पडिब चमत्कार,
सोहळ साठिए हेबे एकाकार।
सेहि दिन वासुदेव हेबे चमत्कार,
उनचास मरुते बहिब समीर।
वात घाते पाइब मेरु अटळ टलिब,
जन चारि भागरु तिणि भाग नाश जिब।- भविष्य मालिका (महागुप्त पद्मकल्प)
अर्थात: वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि और गुरुवार का संयोग जिस दिन बनेगा, उस समय कलि-युग के चक्र की पूर्णता (अंत की शुरुआत) मानी जाएगी। उस समय प्राकृतिक व वैश्विक स्तर पर कई अद्भुत और अकल्पनीय चमत्कार दिखाई देंगे। समस्त 16 कलाएं और 64 तत्व (या विभिन्न शक्तियां) एक साथ समाहित हो जाएंगी। गवान वासुदेव (विष्णु/कल्कि रूप) की अलौकिक लीला प्रकट होगी और पृथ्वी पर ‘उनचास (49) मरुत’ यानी 49 प्रकार की अत्यंत प्रचंड और भीषण आंधी-तूफान व हवाएं चलने लगेंगी। इस प्रचंड वायु और प्राकृतिक आपदाओं के आघात से जो अचल माना जाता है (जैसे मेरू पर्वत या बड़े-बड़े साम्राज्य/अहंकार), वह भी अपनी जगह से डिग जाएगा। महाप्रलय और विनाशकारी परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की कुल जन-आबादी का चार में से तीन हिस्सा (75%) समाप्त हो जाएगा और केवल धर्म व सत्य के मार्ग पर चलने वाला एक चौथाई (25%) हिस्सा ही बचेगा, जो नए युग (सत्य-युग) का आधार बनेगा।
नोट: उपरोक्त बताया गया समय 13 मई 2027 और 23 अप्रैल 2037 को पड़ रहा है। मालिका के शोधकर्ता विद्वान मानते हैं कि 2037 से सतयुग का प्रारंभ होगा। अभी तो भयंकर युद्ध और 7 दिनों का अंधेरा होना बाकी है। संभवत: 13 मई 2027 के बाद से देश और दुनिया में तेजी से होगा बदलाव।
भगवान कल्कि का अवतार: भागवत पुराण के 12वें स्कंध (अध्याय 2) में उल्लेख है कि जब कलि-युग अपने चरम पर होगा और अधर्म बढ़ जाएगा, तब संभल (शंभल) गांव में विष्णुयशा नामक ब्राह्मण के घर भगवान विष्णु के 10वें अवतार ‘भगवान कल्कि’ का जन्म होगा।
ग्रहों की विशेष दशा: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सत्य-युग का प्रारंभ तब होता है जब सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति (गुरु) एक साथ ‘पुष्य नक्षत्र’ में प्रवेश करते हैं और कर्क राशि में एक ही स्थिति पर आते हैं।
भविष्य मालिका का दृष्टिकोण: ओडिशा के पंचसखा (संत अच्युतानंद दास आदि) द्वारा लिखित ‘भविष्य मालिका’ के अनुसार, कलि-युग के अंत का समय किसी विशेष तिथि से नहीं, बल्कि प्राकृतिक बदलावों, युद्धों और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से तय होता है। इसके अनुसार कलि-युग के अंतिम चरण में भारी तबाही के बाद धर्म की पुनर्स्थापना होगी और सत्य-युग की शुरुआत होगी।
यदि यह सही है तो कर लें निकट भविष्य की तैयारियां:
तैयारी और संदेश: दोनों ही ग्रंथों में भौतिक तैयारी के बजाय मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी पर जोर दिया गया है:-
नाम जप और भक्ति: कलि-युग से तरने और नए युग में प्रवेश के लिए ईश्वर के नाम स्मरण को मुख्य मार्ग बताया गया है।
सत्य और धर्म का पालन: अपने आचरण में सत्य, दया, पवित्रता और अहिंसा को अपनाना।
सात्विक जीवनशैली: सात्विक आहार और आध्यात्मिक विचारों को जीवन में ढालना ही इसकी असली “तैयारी” मानी गई है।
बचत और सुरक्षित स्थान: ज्यादा से ज्याद धन की बचत करें और किसी सुरक्षित स्थान पर जाने की व्यवस्था भी कर लें।
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