मायावती ने कहा कि BSP हमेशा छात्रों और युवाओं के साथ खड़ी रही है. उन्होंने रोजगार, सरकारी भर्तियों, पेपर लीक और युवाओं की समस्याओं को गंभीर बताते हुए कहा कि पढ़ाई और ट्रेनिंग पूरी करने के बाद युवा रोजगार चाहते हैं, लेकिन सरकारें उनकी जरूरत पूरी नहीं कर पा रही हैं. यही वजह है कि युवाओं में रोष बढ़ रहा है.
मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश में भी छात्र-युवा आंदोलन की जमीन तैयार हो रही है. 10 अगस्त को लखनऊ में ‘जस्टिस मोर्चा’ की आधिकारिक घोषणा हुई, जो शिक्षा, रोजगार, समान अवसर और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे मुद्दों को लेकर प्रदेशव्यापी अभियान शुरू करने जा रहा है.
जस्टिस मोर्चा ने 12 अगस्त से प्रदेशव्यापी जनसंपर्क अभियान शुरू करने का ऐलान किया है. वहीं 20 अगस्त से गोरखपुर के चौरी चौरा से साइकिल यात्रा निकाली जाएगी, जो 2 अक्टूबर को लखनऊ में समाप्त होगी. संगठन का दावा है कि अगले 50 दिनों में प्रदेश के सभी 75 जिलों में 800 से ज्यादा कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में छात्र-युवा बैठकें, नुक्कड़ सभाएं और जनसंवाद किए जाएंगे.
मोर्चे ने भर्ती कैलेंडर जारी करने, रिक्त सरकारी पदों को भरने, लंबित भर्तियां पूरी करने, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करने वाले छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने, संविदा व्यवस्था खत्म करने और निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण समेत 10 मांगें रखी हैं.
दरअसल, यूपी की चुनावी राजनीति में Gen-Z को लेकर चर्चा इसलिए भी तेज है. क्योंकि राज्य में युवाओं की संख्या काफी बड़ी है. उपलब्ध चुनावी आकलनों के मुताबिक करीब 15 फीसदी वोटर Gen-Z वर्ग से जुड़े हैं. ऐसे में अगर इस वर्ग के वोट में कुछ प्रतिशत का भी झुकाव किसी एक राजनीतिक दिशा में होता है तो उसका असर कई विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है.
इसीलिए भाजपा, सपा, कांग्रेस, बसपा समेत तमाम दलों की नजर अब युवा वोटर पर है. खास तौर पर शिक्षा, रोजगार, भर्ती, पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता जैसे मुद्दे सीधे युवाओं से जुड़े हैं. इसपर वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल त्रिपाठी के मुताबिक दिल्ली में छात्र आंदोलन के बाद रांची में जिस तरह युवाओं की सक्रियता दिखाई दी, उससे साफ है कि युवाओं और छात्रों को अपनी ताकत का अंदाजा हो गया है.
उनका कहना है कि समाज के दूसरे वर्गों को भी समझ में आया है कि अगर युवा एकजुट होकर कोई बड़ी मांग उठाते हैं तो सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है. राजनीतिक दल भी अब इस ताकत को नजरअंदाज नहीं कर सकते और यह समझ चुके हैं कि किसी मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाने के लिए युवाओं को साथ लिया जा सकता है.
उनके मुताबिक इसका एक दूसरा पहलू भी है. छात्र और युवा संगठनों को भी अब यह एहसास हो रहा है कि अगर वे किसी वास्तविक और जनहित के मुद्दे को लेकर आगे बढ़ते हैं तो उन्हें राजनीतिक समर्थन मिल सकता है. चुनाव नजदीक होने के कारण यूपी में आने वाले दिनों में ऐसे कई नए छात्र-युवा संगठन सामने आ सकते हैं, जो राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने के साथ चुनाव में प्रतिनिधित्व, टिकट और राजनीतिक जगह की मांग भी कर सकते हैं.
हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या अलग-अलग विचारधारा और संगठनों से जुड़े छात्र-युवा किसी साझा मुद्दे पर लंबे समय तक एकजुट रह पाते हैं. साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि आंदोलन राजनीतिक दलों के प्रभाव से कितना स्वतंत्र रह पाता है.
फिलहाल इतना साफ है कि दिल्ली और रांची के बाद यूपी में भी Gen-Z की गूंज सुनाई देने लगी है. जस्टिस मोर्चा के प्रदेशव्यापी अभियान और मायावती जैसे राजनीतिक नेताओं के बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि चुनाव से पहले युवा अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि दबाव बनाने वाली एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत के तौर पर देखे जा रहे हैं. अब सवाल यही है कि यह ताकत आंदोलन तक सीमित रहती है या 2027 के यूपी चुनाव में नतीजे बदलने वाली ताकत बनती है.
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