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8 August 1947. देश की आजादी में अब सिर्फ सात दिन ही बचे थे. करीब आती आजादी की आहट अब सभी के तन बदन में सिरहन पैदा करने लगी थी, लेकिन एक ट्रेन में बैठे महात्मा गांधी के मन में आजादी का कोई उत्साह नहीं था. महात्‍मा गांधी लाहौर से पटना जा रहे थे. बीते दिनों, लाहौर में उन्होंने जो देखा था, उसने उन्हें भीतर तक हिला दिया था. हिंदू और सिख परिवारों के घर जलाए जा रहे थे. जान बचाने के लिए लोग जीवन की तमाम जमा पूंजी छोड़ भागने को मजबूर थे. शरणार्थी शिविरों में हजारों लोग बदहाली की जिंदगी जी रहे थे. महात्‍मा गांधी की आंखों में आजाद भारत की तस्वीर नहीं, बल्कि बंटते हुए हिंदुस्तान की दर्द साफ नजर आ रहा था.

इसी सफर के दौरान उन्हें अचानक याद आया कि आज 8 अगस्त है. ठीक पांच साल पहले, 8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस की ऐतिहासिक बैठक हुई थी. उसी बैठक में अंग्रेजों को भारत छोड़ने का अंतिम संदेश दिया गया था. महात्‍मा गांधी ने यहीं से ‘करो या मरो’ का नारा देकर देशवासियों से निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार होने को कहा था. उस समय आजादी दूर थी, लेकिन लोगों के भीतर उम्मीद थी. पांच साल बाद आजादी दरवाजे पर खड़ी थी, लेकिन अब महात्‍मा गांधी के मन में खुशी की जगह दर्द था.महात्‍मा गांधी को यह भी महसूस हो रहा था कि जिस आजादी के लिए लाखों लोगों ने संघर्ष किया, वह देश के बंटवारे और खून-खराबे के साथ आ रही है.

8 अगस्त 1947 के 5 बड़े घटनाक्रम

  1. गांधी के सामने था लाहौर का दर्द: लाहौर में हिंदू और सिख परिवारों की हालत देखकर गांधी बेहद परेशान थे. वह लगातार हिंसा रोकने की कोशिश कर रहे थे. शरणार्थी शिविरों में पहुंचकर उन्होंने लोगों की हालत देखी और उनकी पीड़ा सुनी. आजादी के ठीक पहले पंजाब में इंसानियत का जो हाल उन्होंने देखा, उसने महात्‍मा गांधी को भीतर से तोड़ दिया था.
  2. याद आया पांच साल पहले का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन: 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक आंदोलन का रास्ता चुना था. इसके बाद गांधी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. गांधी को याद आया कि उस समय आजादी बहुत दूर थी, लेकिन आंदोलनकारियों के भीतर उम्मीद और जोश था. अब आजादी सामने थी, लेकिन देश दंगों से जूझ रहा था.
  3. पाकिस्तान में रहने का मन बना चुके थे गांधी: महात्‍मा गांधी का मानना था कि सिर्फ राजनीतिक आजादी पर्याप्त नहीं है. अगर हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच भरोसा खत्म हो गया तो आजादी अधूरी रह जाएगी. इसी सोच के तहत उन्होंने संकेत दिया कि वह पाकिस्तान जाकर वहां शांति स्थापित करने की कोशिश करेंगे.
  4. जोधपुर पर थी जिन्ना की बुरी नजर: भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बीच जिन्ना रियासतों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे थे. उनकी नजर जोधपुर पर भी थी. जोधपुर के महाराजा को पाकिस्तान के साथ जाने या स्वतंत्र रहने के लिए कई तरह के राजनीतिक और आर्थिक फायदे देने का प्रस्ताव सामने रखा गया था.
  5. कोलकाता में फिर भड़क उठी हिंसा: उधर कोलकाता में दंगों ने फिर खतरनाक रूप ले लिया था. बस्तियों और दुकानों में आग लगाई जा रही थी. लोगों को निशाना बनाया जा रहा था. हिंदू परिवारों को बचाने पहुंचे पुलिस अधिकारियों पर भी देसी बम से हमला किया गया. हिंसा की यह आग सिर्फ कोलकाता तक सीमित नहीं रही और दूसरे इलाकों में भी तनाव बढ़ता जा रहा था.

जोधपुर को लेकर जिन्ना की बड़ी चाल

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे का ऐलान होते ही रियासतों का सवाल सबसे बड़ा मुद्दा बन गया था. जिन्ना चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा रियासतें पाकिस्तान के साथ आएं और कम से कम का भारत में विलय हो. जोधपुर रियासत भी इस रणनीति का अहम हिस्‍सा थी. जोधपुर की भौगोलिक स्थिति और उसके राजनीतिक महत्व को देखते हुए पाकिस्तान उसे अपने साथ जोड़ना चाहता था. जिन्ना की तरफ से महाराजा को कई बड़े प्रस्ताव दिए गए. हथियारों की आपूर्ति, अकाल के समय अनाज, कराची बंदरगाह तक पहुंच और जोधपुर को हैदराबाद से जोड़ने वाले रेल मार्ग जैसे वादे किए गए. इतना ही नहीं, महाराजा को यह विकल्प भी दिया गया कि वह 15 अगस्त से पहले अपनी रियासत को स्वतंत्र घोषित कर सकते हैं. लेकिन जिन्ना की इस योजना के सामने एक ऐसा शख्‍स खड़ा था, जो पूरी स्थिति को बहुत बारीकी से समझ रहा था.

कैसे बचा जोधपुर

  1. जिन्ना ने भोपाल के नवाब को बनाया जरिया: जोधपुर के महाराजा पर सीधे दबाव बनाने के बजाय जिन्ना ने भोपाल के नवाब के जरिए संपर्क साधने की कोशिश की. मकसद जोधपुर के महाराजा को यह समझाया था कि पाकिस्तान के साथ जाने में उनकी भलाई है. जिन्ना को उम्मीद थी कि वह कुछ लुभावने प्रस्तावों के जरिए जोधपुर को भारत से दूर कर सकते हैं.
  2. दीवान वेंकटाचारी बने सबसे बड़ी दीवार: उस समय जोधपुर रियासत के दीवान थे कदंबी शेषाचारी वेंकटाचारी. वह इंडियन सिविल सर्विस परीक्षा पास कर चुके थे और रियासत के प्रशासन में उनका प्रभाव काफी मजबूत था. महाराजा आम तौर पर बड़े फैसलों में उनकी सलाह लेते थे. वेंकटाचारी समझ चुके थे कि जिन्ना के प्रस्ताव जितने आकर्षक दिख रहे हैं, उनके पीछे उतनी ही बड़ी राजनीतिक चाल छिपी है.
  3. जोधपुर को लेकर माउंटबेटन की चाहत: वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन भी जोधपुर को पाकिस्तान के साथ जाते नहीं देखना चाहते थे. उन्हें पता था कि महाराजा को समझाने में सबसे अहम भूमिका वेंकटाचारी निभा सकते हैं. इसलिए 8 अगस्त की दोपहर वेंकटाचारी को वायसरॉय हाउस में लंच के लिए बुलाया गया. यही पर जोधपुर के नए भविष्‍य को तय किया जाना था.
  4. वायसरॉय हाउस में हुई निर्णायक बातचीत: करीब 12 बजे वेंकटाचारी जोधपुर रियासत की कार से वायसरॉय हाउस पहुंचे. लंच के दौरान माउंटबेटन ने साफ कहा कि जोधपुर को जल्द भारत में विलय का फैसला करना चाहिए. वेंकटाचारी ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि रियासत भारत में शामिल होने के लिए तैयार है. यही वह पल था, जब जोधपुर को पाकिस्तान के खेमे में ले जाने की जिन्ना की कोशिश को बड़ा झटका लगा.
  5. वेंकटाचारी ने पलट दिया जिन्‍ना का खेल: वेंकटाचारी की भूमिका सिर्फ महाराजा को जिन्ना के प्रस्ताव से बचाने तक सीमित नहीं थी. उन्होंने पूरे राजनीतिक समीकरण को समझते हुए महाराजा को भारत के साथ जाने के लिए तैयार किया. जोधपुर का भारत में विलय जिन्ना की रियासतों वाली रणनीति के लिए बड़ा झटका था.
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कोलकाता में गहरी हो चुकी थी दंगों की आग

8 अगस्त की शाम तक कोलकाता में हालात और खराब हो चुके थे. कई बस्तियों को निशाना बनाया जा रहा था. घरों और दुकानों में आग लगाई जा रही थी. हिंसा रोकने और लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे पुलिसकर्मियों पर भी हमला हुआ. देसी बम से हुए हमले में डिप्टी पुलिस कमिश्नर एसएच घोष, एफएम जर्मन समेत कई वरिष्ठ अधिकारी घायल हुए. आजादी से ठीक सात दिन पहले देश का एक हिस्सा आजादी की तैयारी कर रहा था, तो दूसरा हिस्सा हिंसा में जल रहा था.

कोलकाता के साथ हैदराबाद, वारंगल और निजामशाही के गांवों से भी तनाव और हिंसा की खबरें सामने आने लगीं. हिंदू परिवारों के घरों और दुकानों को निशाना बनाया जा रहा था. इस तरह 8 अगस्त 1947 का दिन खत्म हुआ. लेकिन इस दिन की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि जिस देश ने पांच साल पहले ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा लगाकर आजादी की लड़ाई को निर्णायक मोड़ दिया था, उसी देश में आजादी से ठीक पहले लोग एक-दूसरे से डर रहे थे. महात्‍मा गांधी के लिए यह आजादी का उत्सव नहीं, बल्कि एक ऐसी मंजिल थी, जिसकी कीमत उन्हें खून और बंटवारे के रूप में दिखाई दे रही थी.

अगर जोधपुर जिन्ना के जाल में फंसकर पाकिस्तान में चला जाता तो भारत को क्या नुकसान होता?
अगर जोधपुर पाकिस्तान के साथ चला जाता, तो भारत को इसका बड़ा रणनीतिक नुकसान हो सकता था. जोधपुर की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण थी. पाकिस्तान को राजस्थान के भीतर एक मजबूत आधार मिल जाता और पश्चिमी भारत की सुरक्षा चुनौती और बढ़ जाती. इसका असर सिर्फ जोधपुर तक सीमित नहीं रहता. जोधपुर के पाकिस्तान में जाने से जैसलमेर, बाड़मेर और पश्चिमी राजस्थान की सुरक्षा व्यवस्था बेहद मुश्किल हो सकती थी. भारत-पाकिस्तान सीमा का स्वरूप भी अलग होता और भारतीय सेना को पश्चिमी मोर्चे पर अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ता. इसके अलावा जिन्ना के प्रस्ताव में जोधपुर को कराची बंदरगाह और हैदराबाद से रेल संपर्क जैसी सुविधाएं देने की बात थी. अगर यह व्यवस्था बनती, तो पाकिस्तान को पश्चिमी भारत के आसपास अतिरिक्त रणनीतिक फायदा मिलता. इसलिए जोधपुर का भारत में विलय सिर्फ एक रियासत का फैसला नहीं था. यह भारत की सुरक्षा, भौगोलिक अखंडता और एकीकरण के लिए बेहद अहम फैसला था.

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