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दिल्ली हाईकोर्ट में मंगलवार को आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं और एक पत्रकार के खिलाफ दायर आपराधिक अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई. यह मामला न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों और हितों के टकराव के आरोपों से जुड़ा है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने बड़ा दावा करते हुए कहा कि विवादित पोस्ट सोशल मीडिया से हटा दिए गए हैं, लेकिन उनके पास इसका डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित है.

क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत 9 अप्रैल को पत्रकार सौरव दास के एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई थी. उस दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा दिल्ली आबकारी नीति मामले में सीबीआई की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थीं, जिसमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य नेताओं को मिली राहत को चुनौती दी गई थी. सौरव दास ने अपने पोस्ट में आरोप लगाया था कि जस्टिस शर्मा के बेटे और बेटी केंद्र सरकार की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पैनल वकील हैं, इसलिए इस मामले में हितो का टकराव बनता है. इस पोस्ट पर ‘आप’ नेताओं ने भी अपनी प्रतिक्रियाएं दी थीं.

हाईकोर्ट में क्या हुआ?
याचिकाकर्ता अधिवक्ता अशोक चैतन्य ने न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की बेंच के समक्ष पक्ष रखा. उन्होंने पीठ को सूचित किया कि पत्रकार सौरव दास के साथ-साथ आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज और गोपाल राय द्वारा किए गए आपत्तिजनक पोस्ट अब हटा दिए गए हैं. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि याचिका का आधार बने इन पोस्टों को हटाए जाने के बावजूद उनके पास इसका डिजिटल साक्ष्य और रिकॉर्ड सुरक्षित है.

सवाल जवाब
यह आपराधिक अवमानना याचिका किसके खिलाफ दायर की गई है?

यह याचिका पत्रकार सौरव दास और आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेताओं- अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज और गोपाल राय के खिलाफ दायर की गई है.

याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट में क्या दावा किया है?

याचिकाकर्ता अधिवक्ता अशोक चैतन्य ने दावा किया कि प्रतिवादियों ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर किए गए आपत्तिजनक पोस्ट हटा दिए हैं, लेकिन उनके पास इन सभी पोस्टों का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित है.

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ क्या आरोप लगाए गए थे?

पत्रकार सौरव दास ने सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया था कि जस्टिस शर्मा के बेटे और बेटी केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं, इसलिए आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान हितों का टकराव (Conflict of Interest) होता है.

यह मामला किस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था?

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंद्र दुडेजा की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था.

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