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नई दिल्ली, 3 अगस्त 2026: बांग्लादेश की राजनीति इस समय एक अहम दौर से गुजर रही है. 5 अगस्त 2024 को हुए सत्ता परिवर्तन के बाद वहां राजनीतिक, सुरक्षा और कूटनीतिक स्तर पर कई बड़े बदलाव देखने को मिले. इन घटनाक्रमों पर बांग्लादेश में 2003 से 2006 तक भारत की उच्चायुक्त रहीं वीना सीकरी ने न्यूज़ 18 से बेहद गहराई से चर्चा करी. उन्होंने कहा कि शेख हसीना के साथ जो कुछ हुआ, वह किसी भी व्यक्ति या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ नहीं होना चाहिए. उनके मुताबिक, यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी पहलू है.

दो साल की अराजकता और जमात-ए-इस्लामी का वास्तविक शासन
पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने कहा कि हसीना के भारत आने के बाद से बांग्लादेश में पिछले लगभग दो वर्षों तक पूर्ण अराजकता का माहौल रहा. इनमें से करीब अठारह महीने तक जमात-ए-इस्लामी पूरी तरह सत्ता के केंद्र में थी. जमात-ए-इस्लामी एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है, जो लंबे समय से पाकिस्तान और पश्चिमी शक्तियों के लिए बांग्लादेश में संपर्क बिंदु रहा है.

1971 के मुक्ति युद्ध में जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तानी प्रशासन के पक्ष में खड़ी थी. उसने मुक्ति युद्ध का विरोध किया, पाकिस्तानी शासन को जारी रखने की कोशिश की और पूर्वी पाकिस्तान की जनता के दमन में सक्रिय भूमिका निभाई. हत्याएँ, बलात्कार, अल्पसंख्यकों पर हमले, ये सब उस समय जमात के हाथों हुए थे. अठारह महीने के अंतरिम शासन में भी यही संगठन वास्तविक नियंत्रण में रहा. मुहम्मद यूनुस मुख्य अंतरिम सलाहकार बने, लेकिन वे केवल मुखौटा या प्रवक्ता की भूमिका में थे. असली शक्ति जमात के पास थी.

पाकिस्तान की वापसी और आतंकवादियों की रिहाई
उन्होंने कहा कि जमात-ए-इस्लामी ने पूरी कोशिश की कि 1971 से पहले की स्थिति वापस लाई जाए. पाकिस्तान पर लगे सभी प्रतिबंध: वीजा, व्यापार, छात्रवृत्ति और माल की जाँच हटा दिए गए. पाकिस्तान अब बांग्लादेशी सेना के साथ अपने रिश्ते गहरा करने की कोशिश कर रहा है.

जेल में बंद सभी आतंकवादी, हिज्ब-उत-तहरीर समेत रिहा कर दिए गए. जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन भी सक्रिय हो गए. पिछले कुछ हफ्तों में काले झंडे वाले प्रदर्शन हुए. कहा जाता है कि पंद्रह लाख काले झंडे मँगवाए गए थे. इन सबके जरिए बांग्लादेश में खिलाफत या इस्लामी शासन का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है. यही इनका लंबे समय से उद्देश्य रहा है.

आवामी लीग का जमीनी पुनरुत्थान
उन्होंने कहा फरवरी में हुए चुनावों के बाद तस्वीर बदली. अब चुनाव को करीब छह महीने हो चुके हैं. अठारह महीने और उसके बाद के समय में आवामी लीग का पुनरुत्थान जड़ों से शुरू हो गया है. कहा जा रहा है कि आवामी लीग का तीस-चालीस प्रतिशत वोट बैंक आज भी पूरी तरह सुरक्षित है. वह कहीं गायब नहीं हुआ.

कई लोग शेख हसीना के पंद्रह साल लंबे शासन से नाराज जरूर थे. एंटी-इंकम्बेंसी का दबाव था. लेकिन वे आवामी लीग या 1971 के मुक्ति युद्ध के मूल्यों के खिलाफ नहीं हैं. जमात-ए-इस्लामी और नेशनल स्टूडेंट्स पार्टी (एनसीपी) असल में एक-दूसरे की आईना हैं. एनसीपी कोई असली छात्र पार्टी नहीं है. जो छात्र शुरू में कुछ फायदे की उम्मीद में जुड़े थे, वे अब अलग हो चुके हैं.

शेख हसीना का फैसला: वापस अपने देश में
पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी के मुताबिक जमीनी स्तर पर मिले भारी समर्थन को देखकर शेख हसीना ने वापस बांग्लादेश जाने का फैसला किया है. पूर्व उच्चायुक्त का मानना है कि यह फैसला पूरी तरह सही है. प्रत्यर्पण एक लंबी कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन हसीना ने खुद कहा है कि वे अदालत में जाकर सरेंडर करेंगी. अगर मरना है तो अपने देश में.

उन्होंने कहा कुछ हफ्ते पहले आवामी लीग की स्थापना दिवस पर सरकार ने सीमा रक्षक बल, सेना और पुलिस को पूरी तरह तैनात कर दिया था. किसी भी प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई. उनके खिलाफ सुनाई गई मौत की सजा एक फर्जी मुकदमा और अनुचित अदालत का फैसला है. इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल को हसीना पर मुकदमा चलाने का अधिकार ही नहीं था. उन्हें अपना बचाव करने का उचित मौका भी नहीं दिया गया.

असली लोकतंत्र की माँग
पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी ने बेहद ज़ोर देकर कहा कि बांग्लादेश की आम जनता असली लोकतंत्र चाहती है. पहले लोग हसीना पर आरोप लगाते थे कि पंद्रह साल में उन्होंने चुनाव प्रभावित किए और दमन किया. वही चीजें अंतरिम शासन ने अठारह महीनों में दोहरा दीं. लोकतंत्र में किसी राजनीतिक दल को प्रतिबंधित करने का कोई मतलब नहीं है. अगर दल अलोकप्रिय है तो चुनाव में हार जाएगा. यही लोकतंत्र का सही तरीका है.

उन्होंने यह भी साफ़ किया कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मामला लंबी कानूनी प्रक्रिया है. उनके मुताबिक, यह तुरंत पूरा होने वाला विषय नहीं है और इसमें कई कानूनी और कूटनीतिक पहलू जुड़े हुए हैं. उन्होंने कहा कि इसलिए वापसी और प्रत्यर्पण को एक ही नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा यात्रा दस्तावेज मिलेंगे या नहीं, कैसे वापस जाएँगी. ये सब लंबी योजना के तहत होने वाली चीज़ें हैं, लेकिन यह समय सुलह और मेल-मिलाप का भी हो सकता है. बांग्लादेश की स्थिरता पूरे क्षेत्र के लिए जरूरी है. इस नाज़ुक समय में भारत और बांग्लादेश के बीच पुराने रिश्ते और साझा इतिहास को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों को संयम और समझदारी से आगे बढ़ना चाहिए.

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