kapil dev record: अपने 16 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर में 131 मैच खेलने वाले कपिल देव ने 184 पारियों में बल्लेबाजी की , लेकिन विरोधी टीम का कोई भी फील्डर उन्हें कभी रनआउट नहीं कर सका जो उनके दौड़ने की गजब की क्षमता को दर्शाता है. यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है
कपिल देव ने भारत के लिए खेले 131 टेस्ट पर कभी नहीं हुए रनआउट
अपने 16 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर में 131 मैच खेलने वाले कपिल देव ने 184 पारियों में बल्लेबाजी की , लेकिन विरोधी टीम का कोई भी फील्डर उन्हें कभी रनआउट नहीं कर सका जो उनके दौड़ने की गजब की क्षमता को दर्शाता है. यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है. यह रिकॉर्ड दर्शाता है कि कपिल देव के पास न सिर्फ एक मजबूत शरीर था, बल्कि क्रिकेट की एक ऐसी असाधारण समझ (क्रिकेटिंग सेंस) थी जो उन्हें हर गेंद पर सही फैसला लेने में मदद करती थी.
1. खेल और मैदान की गहरी समझ
कपिल देव की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी मैदान को भांपने की क्षमता (जजमेंट)। जब वह क्रीज पर होते थे, तो उन्हें अच्छी तरह पता होता था कि कौन सा फील्डर कहां खड़ा है और उसका थ्रोइंग आर्म (फेंकने वाला हाथ) कितना मजबूत है. वह गेंद के बल्ले से टकराते ही उसकी गति और फील्डर की दूरी का सटीक आकलन कर लेते थे. अगर फील्डर फुर्तीला है, तो वह जोखिम उठाने से बचते थे, और अगर फील्डर धीमा है, तो वह तुरंत रन चुरा लेते थे.
2. खुद की बेमिसाल फिटनेस
1970 और 1980 के दशक में आज की तरह आधुनिक जिम, न्यूट्रिशनिस्ट या विशेष योगा ट्रेनर नहीं हुआ करते थे. इसके बावजूद कपिल देव अपने समय के सबसे फिट खिलाड़ियों में गिने जाते थे. एक तेज गेंदबाज और ऑलराउंडर होने के नाते उनका शरीर बेहद लचीला और फुर्तीला था. विकेटों के बीच दौड़ते समय उनकी रफ्तार और क्रीज में डाइव लगाने या खुद को सुरक्षित करने की तकनीक लाजवाब थी. यही वजह है कि फील्डर के सटीक थ्रो के बावजूद वह हमेशा लाइन के पार सुरक्षित पहुंच जाते थे.
3. साथी बल्लेबाज की पहचान और तालमेल
क्रिकेट में रनआउट होने का एक बड़ा कारण गलत कॉलिंग (पुकारना) और दोनों बल्लेबाजों के बीच तालमेल की कमी होती है. कपिल देव को इस बात की बखूबी समझ थी कि उनके सामने खेल रहा बल्लेबाज कितना फिट है और उसकी दौड़ने की रफ्तार क्या है वह कभी भी अपने साथी खिलाड़ी पर गैर-जरूरी रन के लिए दबाव नहीं बनाते थे. जब तक दोनों तरफ से ‘हां’ या ‘ना’ का स्पष्ट संदेश नहीं मिलता, वह क्रीज नहीं छोड़ते थे. उन्होंने सुनील गावस्कर, दिलीप वेंगसरकर और रवि शास्त्री जैसे दिग्गजों के साथ लंबी साझेदारियां कीं, जहां आपसी भरोसा ही उनकी ताकत बना.
4. मानसिक दृढ़ता और एकाग्रता
क्रिकेट के मैदान पर जब मैच रोमांचक मोड़ पर होता है, तो खिलाड़ी अक्सर दबाव में आकर हड़बड़ाहट में रन भागने लगते हैं. कपिल देव की मानसिक स्थिति बेहद मजबूत थी. वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपना आपा नहीं खोते थे. उनकी इसी एकाग्रता ने उन्हें 16 सालों तक हड़बड़ाहट भरे फैसलों से दूर रखा. कपिल देव का यह रिकॉर्ड आज के युवा क्रिकेटरों के लिए एक बेहतरीन सीख है. टी-20 और आधुनिक क्रिकेट के इस दौर में जहां आए दिन खिलाड़ी रनआउट होते हैं, वहीं कपिल देव का इतिहास हमें सिखाता है कि विकेटों के बीच की दौड़ सिर्फ पैरों की ताकत से नहीं, बल्कि दिमाग के सही इस्तेमाल से जीती जाती है.
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