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नई दिल्ली (Rajesh Gopakumar JEE Rank 1 Story). हर साल लाखों युवा देश के सबसे कठिन एग्जाम में शामिल आईआईटी जेईई में टॉप करने का सपना देखते हैं. जेईई में ऑल इंडिया रैंक 1 लाने का मतलब आमतौर पर कंप्यूटर साइंस जैसी टॉप ब्रांच चुनकर शानदार करियर बनाना माना जाता है. लेकिन 1987 के जेईई टॉपर राजेश गोपाकुमार के फैसले ने सबको हैरान कर दिया था. उन्होंने किसी लोकप्रिय इंजीनियरिंग ब्रांच को चुनने के बजाय विज्ञान यानी फिजिक्स पढ़ने का रास्ता चुना.

आज लगभग चार दशकों बाद जेईई टॉपर राजेश गोपाकुमार का यह फैसला देश और दुनिया के विज्ञान जगत के लिए मील का पत्थर साबित हो चुका है. राजेश गोपाकुमार ने फिजिक्स के जो सिद्धांत विकसित किए थे, दुनियाभर के शोधकर्ता आज वही पढ़ रहे हैं. राजेश गोपाकुमार की सक्सेस स्टोरी से साबित होता है कि असली सफलता केवल भीड़ के पीछे भागने में नहीं, बल्कि अपनी जिज्ञासा और रुचि का पीछा करने में मिलती है. जानिए कैसे एक जिज्ञासु बच्चा देश का जाना-माना वैज्ञानिक बन गया.

बचपन का जुनून और JEE के टॉपर

कोलकाता में जन्मे राजेश गोपाकुमार को बचपन से ही यह जानने की उत्सुकता रहती थी कि दुनिया और ब्रह्मांड कैसे काम करते हैं. वे केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं पढ़ते थे, बल्कि स्कूल के सिलेबस से बाहर जाकर विज्ञान और गणित की कठिन किताबों में रमे रहते थे. इसी गहरी समझ के दम पर उन्होंने 1987 की IIT JEE परीक्षा में पूरे देश में पहला स्थान हासिल किया था.

IIT कानपुर से प्रिंस्टन तक का सफर

जेईई में रैंक 1 आने पर वे किसी भी आईआईटी में सबसे पसंदीदा इंजीनियरिंग ब्रांच चुन सकते थे. लेकिन उन्होंने अपने दिल की सुनी और IIT कानपुर के इंटीग्रेटेड एमएससी फिजिक्स प्रोग्राम में दाखिला लिया. 1992 में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका की मशहूर प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी चले गए. वहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी डेविड ग्रॉस के गाइडेंस में अपनी पीएचडी पूरी की. साथ ही अंतरिक्ष, समय और गुरुत्वाकर्षण के रहस्यों पर रिसर्च भी की.

दुनिया को दी ‘गोपाकुमार-वाफा डुअलिटी’

पीएचडी के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में काम करते हुए उन्होंने प्रसिद्ध स्ट्रिंग थ्योरिस्ट कमरुन वाफा के साथ मिलकर शोध किया. दोनों ने ‘गोपाकुमार-वाफा डुअलिटी’ और ‘गोपाकुमार-वाफा इनवेरिएंट्स’ जैसे क्रांतिकारी सिद्धांतों की खोज की. ये सिद्धांत आज क्वांटम थ्योरी और ग्रैविटी के बीच के संबंधों को समझने में बेहद अहम माने जाते हैं. दुनियाभर के बड़े-बड़े संस्थानों में शोधकर्ता इनके सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं.

विदेशी लुभावने ऑफर छोड़े, भारत को चुना

विदेश में अपार सफलता और पहचान मिलने के बाद भी उनके मन में अपने देश वापस लौटने की चाह थी. उन्होंने विदेश के आसान और आरामदायक विकल्पों को छोड़कर भारत आने का फैसला किया. राजेश गोपाकुमार ने प्रयागराज के हरिश-चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक दशक से अधिक समय तक युवा वैज्ञानिकों को तराशा. साल 2015 में वे बेंगलुरु स्थित ICTS (इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल साइंसेज) के निदेशक बने और इसे दुनिया के टॉप रिसर्च संस्थानों में शामिल कराया.

कई सम्मानों से नवाजे गए हैं राजेश गोपाकुमार

विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च वैज्ञानिक पुरस्कार ‘शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार’ (2009) सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया. राजेश गोपाकुमार की कहानी उन स्टूडेंट्स के लिए बहुत बड़ी सीख है, जो केवल सैलरी पैकेज या ट्रेंड के आधार पर अपना करियर चुनते हैं. उनके जीवन से सीख मिलती है कि अगर आप अपने पसंदीदा विषय में गहराई से उतरते हैं तो सफलता और ग्लोबल पहचान आपके कदम जरूर चूमती है.

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