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Sultanpur News: आजादी के समर में पूर्वांचल की धरती का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. सन 1939 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस देश भर में ‘स्वराज’ की अलख जगा रहे थे, तब सुल्तानपुर की माटी भी उनके ऐतिहासिक कदमों की साक्षी बनी थी. उस दौरान नेताजी ने जिस ‘चटर्जी बंगला’ में एक रात बिताई थी, वह आज भी अतीत की महान दास्तान को सीने में समेटे सीना ताने खड़ा है. नेताजी की इस ऐतिहासिक यात्रा से लेकर 850 वर्ष पुरानी मस्जिद और दियरा स्टेट तक, सुल्तानपुर में ऐसी कई प्राचीन धरोहरें मौजूद हैं जो आज भी अपने अनूठे इतिहास और मजबूती की मिसाल पेश कर रही हैं.

Sultanpur News: सन 1939 में नेताजी स्वराज की अलख जगाने जब देश भ्रमण पर निकले तो सुलतानपुर भी आए. यहां उनकी एक रात ‘चटर्जी बंगला’ में गुजरी, जो आज भी धरोहर के रूप में विद्यमान है. अब मैरिज हॉल में तब्दील हो चुका चटर्जी बंगला उस स्वर्णिम दास्तान को मानो अब भी बयां कर रहा है.

उस समय के दिग्गज बाबू गणपत सहाय, सुंदरलाल गुप्ता, संगमलाल, बैजनाथ सिंह आदि तमाम लोग इस चाय-पार्टी में शरीक हुए थे. स्थानीय सुरेंद्र सिंह बताते हैं कि सुभाष बाबू ने यहां के लोगों से राष्ट्रीय राजनीति की दशा और दिशा पर मंत्रणा की. वह एक दिन ठहरे भी और फिर यहां से जाने के कुछ दिन बाद कांग्रेस से इस्तीफा देकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ नाम से नई पार्टी का गठन कर एक नई शुरुआत की थी. सुल्तानपुर में मौजूद यह चटर्जी बंगला आज भी स्थित है.

इस बिल्डिंग के संरक्षक और मालिक सुरेंद्रनाथ सिंह लोकल 18 को बताते हैं कि यह पूरा परिसर मकान सहित उनके पिता ने शांति देवी श्रीवास्तव से खरीदा था, जो 1916-1917 के आसपास निर्मित किया गया था. इस इमारत में ब्रिटिश काल के दौरान बनाई गई ईंटें लगाई गई हैं, जिसकी बनावट और आकृति भी देसी ईंटों की अपेक्षा काफी अलग है. मजबूती के मामले में यह ईंटें काफी अलग होती थीं, जिसका जीता-जागता उदाहरण यह है कि लगभग 110 साल पुरानी इस बिल्डिंग की दीवारें आज भी जस की तस हैं. मजबूती के मामले में यह इमारत आज भी अन्य आधुनिक इमारतों को टक्कर देती है.

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वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 को बताते हैं कि सुल्तानपुर के दरियापुर में स्थित लाल रंग में रंगी गई यह इमारत न सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाती है, बल्कि यह सुल्तानपुर के लिए एक ऐतिहासिक धरोहर भी है, जिसे संजोकर रखने का काम सुरेंद्रनाथ सिंह ने किया है. यह इमारत जितनी बाहर से शाही दिखती है, उससे कहीं ज्यादा अंदर से लग्जरी है. इसके संरक्षक और मालिक सुरेंद्रनाथ सिंह कहते हैं कि उनके पूर्वजों द्वारा खरीदी गई यह इमारत भले ही 110 वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी हो, लेकिन यह मजबूती के मामले में आज भी उतनी ही सशक्त है जितनी निर्माण के समय थी.

जिनाती मस्जिद या बादशाही मस्जिद सुल्तानपुर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है. यह मस्जिद सुल्तानपुर के कस्बा इलाके में बनी हुई है. कस्बा गांव के पूर्व प्रधान जुबैर अहमद बताते हैं कि यह मस्जिद लगभग साढ़े आठ सौ (850) वर्ष पुरानी है, जो ब्रिटिश काल के उत्पीड़न को भी झेल चुकी है. वर्तमान में इस मस्जिद का नवीनीकरण कराकर इसके ऐतिहासिक महत्व को संजोकर रखने का प्रयास किया गया है.

वैसे तो सुल्तानपुर में कई ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, लेकिन चौक स्थित ‘घंटाघर’ अपने आप में अलग महत्व रखता है. इतिहासकारों के अनुसार यह आज से लगभग 150 साल पहले ब्रिटिश शासनकाल में बनाया गया था, जो अपनी खूबसूरती के लिए आज भी जाना जाता है और सुल्तानपुर की विशेष पहचान के रूप में उभरा है.

इसके अलावा सुल्तानपुर जिले में मौजूद ‘दियरा स्टेट’ की खूबसूरती अद्भुत है, क्योंकि इसके बगल से ही गोमती नदी गुजरती है जो इस राजमहल की खूबसूरती को दोगुना कर देती है. नक्काशीदार बनी दीवारें और पारंपरिक तरीके से इस्तेमाल की गई लकड़ियां तत्कालीन संरचनात्मक संस्कृति को तरोताजा कर देती हैं. यहां भी आप अपने बच्चों के साथ घूमने जा सकते हैं. यह सुल्तानपुर मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर दियरा गांव में स्थित है.

सुल्तानपुर के लाल डिग्गी वार्ड स्थित इस क्लब की निर्माण शैली बहुत ही पुरानी और पारंपरिक है. इसमें मोटी दीवारें, ऊंची छत और साधारण डिजाइन देखने को मिलता है. उस समय की वास्तुकला में मजबूती और उपयोगिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था. इसमें आधुनिक सजावट का अभाव जरूर है, लेकिन इसकी बनावट इसे एक बिल्कुल अलग पहचान देती है.

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