असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी में जिन तीन जगहों को अपनी ताकत दिखाने के लिए चुना, वे सभी सूबे की सबसे संवेदनशील और निर्णायक सीटों का प्रतिनिधित्व करती हैं. इन रैलियों के जरिए उन्होंने अपने नए ‘मुस्लिम + दलित’ समीकरण का ब्लूप्रिंट देश के सामने रखा है. ओवैसी ने अपनी पहली रैली बहराइच के मटेरा में की, जो कभी सपा का अभेद्य किला माना जाता था. यहां भारी मुस्लिम आबादी के बीच पहुंचकर उन्होंने साफ किया कि अब अल्पसंख्यक किसी के बंधुआ मजदूर नहीं हैं. इसके बाद बिजनौर और सहारनपुर में दलित-मुस्लिम गठजोड़ का जमावड़ा किया. चंद्रशेखर आजाद के प्रभाव वाले इस इलाके में ओवैसी ने दलितों और मुस्लिमों को एक साथ आने का आह्वान किया. उनका मानना है कि जब तक ये दोनों शोषित वर्ग एक मंच पर नहीं आएंगे, तब तक उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा.
क्यों बोले ओवैसी- ‘बीजेपी का प्लान-A और सपा का प्लान-M हुआ फेल’?
ओवैसी का यह दावा बेहद सोच-समझकर दिया गया एक राजनीतिक बयान है, जिसके पीछे हालिया चुनावी बदलाव छिपे हैं.
प्लान-A (अयोध्या) क्यों फेल?
ओवैसी ने तंज कसते हुए कहा कि बीजेपी जिस अयोध्या और राम मंदिर के नाम पर एकतरफा ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही थी, उसे जनता ने लोकसभा चुनाव में ही नकार दिया. इसके अलावा, उन्होंने राम मंदिर के चंदे में कथित अनियमितताओं और स्थानीय नाराजगी का मुद्दा उठाकर कहा कि बीजेपी का पुराना नैरेटिव अब काम नहीं कर रहा है.
प्लान-M (मुस्लिम) क्यों फेल?
ओवैसी का सीधा हमला अखिलेश यादव पर था. उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी हमेशा चुनाव आते ही मुस्लिमों को ‘बीजेपी का डर’ दिखाकर उनका वोट एकतरफा समेट लेती है (प्लान-एम), लेकिन बदले में मुस्लिम समाज को सिर्फ बेरोजगारी और पेपर लीक जैसी समस्याएं मिलती हैं. सपा का यह पारंपरिक फॉर्मूला अब एक्सपायर हो चुका है क्योंकि मुस्लिम अब अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए जाग चुका है.
अखिलेश यादव निकलने वाले हैं रथ यात्र पर!
‘MIM फॉर्मूले’ से कैसे बढ़ेगी सपा और बीजेपी दोनों की मुश्किल?
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 143 सीटों पर मुस्लिम मतदाता बेहद निर्णायक हैं. ओवैसी का ‘MIM’ फॉर्मूला इन दोनों बड़ी पार्टियों को त्रिकोणीय मुकाबले में फंसाने की ताकत रखता है. समाजवादी पार्टी यदि मुस्लिम मतदाता सपा के ‘PDA’ से छिटककर AIMIM की तरफ रुख करते हैं, तो सपा का कोर वोट बैंक बिखर जाएगा, जिससे विपक्ष की सत्ता में वापसी की उम्मीदें टूट सकती हैं. वहीं भारतीय जनता पार्टी यदि ओवैसी अपने फॉर्मूले के तहत दलित मतदाताओं विशेषकर गैर-जाटव को अपने पाले में खींचने में कामयाब रहते हैं, तो बीजेपी का वह सोशल इंजीनियरिंग मॉडल कमजोर होगा जिसके दम पर वह भारी बहुमत पाती है.
कुलमिलाकर यूपी में तीन रैलियों के जरिए ओवैसी ने सपा और कांग्रेस को एक साथ आने का संकेत तो दिया है, लेकिन वह भी बराबरी की शर्तों पर. उनका यह साफ कहना कि आज हाथ दोस्ती का है, कल गिरेबान पर होगा यह दर्शाता है कि अगर विपक्षी गठबंधन ने मजलिस को सम्मानजनक सीटें नहीं दीं, तो ओवैसी अकेले दम पर यूपी की मुस्लिम-दलित बहुल सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर पूरे चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बना देंगे, जिसका सीधा असर 2027 के नतीजों पर पड़ना तय है.
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