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kargil War: पाकिस्तानी सैनिकों ने ऑपरेशन बद्र को अंजाम देते हुए कारगिल में घुसपैठ शुरू कर दी थी. वहीं, दुश्मन की इस दस्तक पर कारगिल से लेकर दिल्ली के सेना मुख्यालय तक कई ऐसे घटनाक्रम हुए, जो किसी को भी चौंकाने वाले हैं. इस घटनाक्रम को लेकर उस समय के सेना प्रमुख वेद प्रकाश मलिक ने कई अहम खुलासे किए हैं. जानिए, कारगिल के पूरे सच की कहानी, पूर्व सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक की जुबानी.
कारगिल युद्ध के दौरान सेना प्रमुख रहे जनरल वीपी मलिक ने कई अहम खुलासे किए हैं. (एआई इमेज)
Kissa Kargil Ka-3: कारगिल में दुश्मन की मौजूदगी इसी बात से समझ सकते हैं कि भारतीय सेना के नक्शे पर दिख रही 36 पोजीशंस पर लाल पिन लग चुका था. सेना के नक्शे में लाल पिन का सीधा मतलब होता है कि दुश्मन ने उस पोस्ट पर अपना कब्जा जमा लिया है. बावजूद इसके, जमीन पर इस हकीकत को जब तक हकीकत माना गया, तब तक इन लाल पिन की संख्या 48 हो चुकी थी. उस समय बहुत कुछ ऐसा था, जिसे सेना के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने ही नहीं दिया गया था. पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ से कारगिल युद्ध शुरू होने के बीच क्या-क्या हुआ, कैसे परिस्थितियां बदली, कैसे कारगिल के पूरे सच को छिपाया गया… सहित कई मसलों पर उस समय के आर्मी चीफ जनरल वेद प्रकाश मलिक ने खुलकर कहा है. आइए जानें कारगिल युद्ध से जुड़ी यह कहानी सीधे जनरल वेद प्रकाश मलिक की जुबानी…
10 मई 1999 को मैं पोलैंड और चेक गणराज्य की आधिकारिक यात्रा पर रवाना हुआ था. उस समय तक मुझे और सेना मुख्यालय को यही जानकारी थी कि कारगिल और सियाचिन सेक्टर में हालात सामान्य नियंत्रण में हैं. किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि आने वाले कुछ दिनों में भारत एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है. यात्रा पर निकलने से पहले सेना के वरिष्ठ अधिकारी कारगिल और लेह का दौरा कर चुके थे. उनकी रिपोर्ट में कहीं भी बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी घुसपैठ का जिक्र नहीं था. सीमा पर छोटी-मोटी गोलीबारी और मोर्टार फायरिंग को सामान्य गतिविधि माना जा रहा था. इसी बीच बटालिक इलाके के रहने वाले ताशी नामग्याल ने भारतीय सेना को बताया कि ऊंची पहाड़ियों पर कुछ अनजान लोग दिखाई दिए हैं. इसके बाद सेना की पेट्रोलिंग पार्टी की उनसे झड़प भी हुई. लेकिन यह जानकारी अभी सेना मुख्यालय तक नहीं पहुंची थी.
दूसरी तरफ सेना की रोजाना की रिपोर्ट में सिर्फ इतना दर्ज था कि तुर्तुक इलाके में पाकिस्तानी पेट्रोलिंग टीम से मुठभेड़ हुई है और एक भारतीय सैनिक लापता है. 9 और 10 मई की रात कारगिल में 121 इन्फैंट्री ब्रिगेड के मुख्यालय पर भारी तोपखाने से गोलाबारी हुई. कुछ गोले ब्रिगेड के गोला-बारूद डिपो पर भी गिरे. जब मैंने इस बारे में पूछा तो मुझे बताया गया कि यह सिर्फ एक ‘चांस हिट’ यानी संयोग से लगा गोला था. किसी को भी तब तक यह नहीं लगा कि इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है. 12 मई की शाम मैं पोलैंड की राजधानी वारसॉ में था. वहीं मुझे पहली बार जानकारी मिली कि बटालिक सेक्टर में कुछ आतंकी घुस आए हैं और भारतीय सेना उन्हें निकालने की कार्रवाई कर रही है. अगले दिन मैंने डीजीएमओ से बात की. उन्होंने बताया कि शुरुआती आकलन के मुताबिक करीब 100 से 150 जिहादी घुसपैठिए बटालिक इलाके में हैं. इसे सीमित घुसपैठ माना जा रहा था.
घुसपैठियों से निपटने के लिए दो अतिरिक्त यूनिट्स वहां भेजी जा चुकी थीं. इस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस भी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कारगिल का दौरा कर रहे थे. उस समय तक सभी को भरोसा था कि हालात जल्द ही नियंत्रण में आ जाएंगे. यहां तक कि भारत के राजदूत को भी इस मामले में कोई खास जानकारी नहीं थी. भारतीय मीडिया में भी बड़ी घुसपैठ जैसी कोई खबर नहीं चल रही थी. 14 मई को मुझे बताया गया कि रक्षा मंत्री ने कारगिल का दौरा करने के बाद मीडिया से कहा है कि अगले 48 घंटे में घुसपैठियों को खदेड़ दिया जाएगा. इससे भी यही लगा कि मामला ज्यादा गंभीर नहीं है. लेकिन अगले ही दिन तस्वीर बदलने लगी.
- 15 मई को मैं चेक गणराज्य की राजधानी प्राग पहुंचा. वहां पाकिस्तानी मीडिया की खबरें सामने आईं कि मुजाहिदीन ने एलओसी के पास भारतीय इलाके पर कब्जा कर लिया है. भारत की तरफ से इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई थी. मुझे यह बात अजीब लगी, क्योंकि जिहादी आतंकी आमतौर पर किसी इलाके पर कब्जा करके नहीं बैठते हैं.
- शाम को डीजीएमओ ने मुझे नई जानकारी दी. अब घुसपैठियों की संख्या 250 से 300 बताई जा रही थी. बटालिक में कई जगह उनका सामना भारतीय सेना से हो रहा था. काकसर सेक्टर में एक भारतीय पेट्रोलिंग टीम लापता थी और उसे खोजने गई टीम भी मुठभेड़ में फंस गई थी.
- अब सेना ने द्रास में अतिरिक्त ब्रिगेड भेजने की तैयारी शुरू कर दी थी. मैंने सलाह दी कि हेलीकॉप्टरों से ज्यादा हवाई निगरानी की जाए. जरूरत पड़ने पर और सैनिक भेजे जाएं और पूरे घटनाक्रम की जानकारी चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी को लगातार दी जाए.
- 17 मई तक भी हालात पूरी तरह साफ नहीं थे. सेना की कई पेट्रोलिंग पार्टियां भेजी गईं, लेकिन उन्हें खास सफलता नहीं मिली. घुसपैठिए लगातार नई जगहों पर दिखाई दे रहे थे. उनकी संख्या पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा लग रही थी. इसके बावजूद नॉर्दर्न कमांड और 15 कोर के अधिकारियों को भरोसा था कि वे जल्द ही उन्हें खत्म कर दिया जाएगा.
- यहीं से मेरे मन में पहला बड़ा शक पैदा हुआ. मैंने सोचा कि अगर ये सिर्फ आतंकी होते तो वे किसी पहाड़ी पर कब्जा करके इतने लंबे समय तक डटे नहीं रहते. वे आमतौर पर हमला करके वापस लौट जाते हैं. लेकिन यहां वे मोर्चा संभालकर बैठे थे और पीछे से उन्हें लगातार मोर्टार और तोपों का समर्थन भी मिल रहा था.
- इससे साफ लगने लगा कि पाकिस्तान सेना सीधे इस ऑपरेशन में शामिल है. मैंने वायु सेना की मदद लेने की सलाह दी, लेकिन अगले दिन मुझे बताया गया कि हमला करने वाले हेलीकॉप्टर इतनी ऊंचाई पर प्रभावी नहीं होंगे और एयर पॉवर के इस्तेमाल से लड़ाई बड़ी हो सकी है. इसलिए यह प्रस्ताव मंजूर नहीं किया गया.
- इसी दौरान मैंने पूछा कि क्या मुझे अपनी विदेश यात्रा बीच में छोड़कर तुरंत लौट आना चाहिए. लेकिन डीजीएमओ और वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ दोनों ने कहा कि अभी इसकी जरूरत नहीं है. उनका मानना था कि स्थिति अभी भी 15 कोर और नॉर्दर्न कमांड के नियंत्रण में है.
- 19 मई को जब मैं भारत लौट रहा था, उसी दिन श्रीनगर में 15 कोर के कमांडर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने भी इसे स्थानीय एंटी टेरर ऑपरेशन बताया. उन्होंने कहा कि घुसपैठियों को पाकिस्तान सेना का समर्थन जरूर मिल रहा है, लेकिन यह स्थिति अभी कंट्रोल में है. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ दिनों में सभी घुसपैठियों को खत्म कर दिया जाएगा.
- 20 मई को मैं नई दिल्ली पहुंचा. एयरपोर्ट पर ही मुझे ताजा जानकारी दी गई. अगले दिन सेना मुख्यालय में लंबी बैठक हुई. अब तस्वीर पहले से कहीं ज्यादा साफ होने लगी थी. घुसपैठ कई सेक्टरों में फैली हुई थी. मशीनगनों, मोर्टार और भारी तोपखाने का इस्तेमाल साफ बता रहा था कि यह सिर्फ आतंकियों का काम नहीं हो सकता है. पाकिस्तान सेना भी इसमें शामिल थी.
- इसके बाद अतिरिक्त ब्रिगेडों को लद्दाख भेजने का फैसला हुआ और रिजर्व सेना भी तैयार रखी गई. लेकिन सबसे बड़ी उलझन अभी भी यही थी कि दुश्मन आखिर है कौन? लगातार खुफिया एजेंसियां रिपोर्ट दे रही थीं कि सामने ज्यादातर जिहादी आतंकी हैं और कुछ पाकिस्तानी सैनिक भी हो सकते हैं. उनकी दलील थी कि रेडियो इंटरसेप्ट और काले सलवार-कमीज पहने लोगों को देखने से यही लग रहा है.
लेकिन मेरा अनुभव कुछ और कह रहा था…
जिहादी आतंकी कभी भी पत्थरों के मजबूत बंकर बनाकर महीनों तक लड़ाई नहीं लड़ते हैं. वे किसी इलाके को सिक्योर भी नहीं करते हैं. दूसरी तरफ पाकिस्तान की तरफ से लगातार हो रही भारी तोपों की गोलाबारी साफ बता रही थी कि उनकी सेना पूरी ताकत से घुसपैठियों का साथ दे रही थी. मैंने बार-बार कहा कि दुश्मन की असली पहचान जल्द से जल्द तय करनी होगी. बाद में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक में भी यही बहस हुई. पहले कहा गया कि लगभग 70 प्रतिशत घुसपैठिए जिहादी आतंकी हैं और 30 प्रतिशत पाकिस्तानी सैनिक हैं. लेकिन कुछ दिनों बाद नए सबूत आने पर यह आकलन उल्टा हो गया. अब कहा गया कि 70 प्रतिशत पाकिस्तानी रेगुलर सैनिक हैं और 30 प्रतिशत जिहादी हैं.
और इस तरह साफ हुई पाकिस्तानी सेना की साजिश
मैंने तब भी कहा कि मेरे पास मौजूद सबूत बताते हैं कि यह पूरा ऑपरेशन पाकिस्तान सेना ने ही चलाया है. जिहादियों की मौजूदगी का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला था. बाद में जब पाकिस्तान के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की बातचीत इंटरसेप्ट हुई, तब पूरी तस्वीर साफ हो गई कि कारगिल की घुसपैठ पाकिस्तान सेना की सुनियोजित सैन्य कार्रवाई थी. यह पूरा घटनाक्रम हमारी खुफिया व्यवस्था की कमजोरी को भी सामने लेकर आया था. पाकिस्तान एक तरफ लाहौर शांति प्रक्रिया में शामिल था और दूसरी तरफ कारगिल में युद्ध की तैयारी कर चुका था. हमारी ज्यादातर एजेंसियां आखिरी समय तक इसे सिर्फ ‘जिहादी घुसपैठ’ मानती रहीं.
मुझे याद आती है युद्ध के दौरान की यह घटना…
9 जून को मैं श्रीनगर में 15 कोर मुख्यालय पहुंचा. देर रात मेरे डिप्टी मिलिट्री असिस्टेंट कर्नल विजय चोपड़ा घबराए हुए मेरे कमरे में आए. उन्होंने कहा, ‘सर, इस बार दुश्मन की लाल पिनें मैप पर 36 से बढ़कर 48 हो गई हैं. लगता है हमें पूरी सच्चाई नहीं बताई जा रही.’ मैं मुस्कुराया और उनसे कहा, ‘नहीं, इसका मतलब उल्टा है. पहले हमें दुश्मन की कम जगहों का पता था. अब ज्यादा जगहों की सही जानकारी मिल गई है. युद्ध में सबसे बड़ी मुश्किल दुश्मन को ढूंढना होती है. जब उसकी सही लोकेशन पता चल जाती है, तब उसे हराना आसान हो जाता है. इसका मतलब है कि अब युद्ध की धुंध धीरे-धीरे छंट रही है.’ शायद उस रात उन्हें भी पहली बार समझ आया कि युद्ध सिर्फ गोलियों से नहीं, बल्कि सही जानकारी से भी जीता जाता है.
(इस खबर के सभी तथ्य कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक की किताब ‘कारगिल: फ्रॉम सप्राइज टू विक्ट्री’ से लिए गए हैं.)
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international…और पढ़ें
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