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Lipstick Under My Burkha: जब भी बॉलीवुड में पुरानी सोच को चुनौती देने वाली एडवेंचरस फिल्मों की बात होती है, तो अलंकृता श्रीवास्तव के डायरेक्शन और प्रकाश झा के प्रोडक्शन में बनी फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ का नाम खास तौर पर लिया जाता है. 21 जुलाई 2017 को रिलीज हुई इस डार्क कॉमेडी फिल्म ने आज 9 साल पूरे कर लिए हैं. बहुत कम बजट में बनी इस फिल्म ने न सिर्फ सेंसर बोर्ड की पाबंदियों को तोड़ा, बल्कि अपनी चुटीली और कसी हुई कहानी से दर्शकों को आखिर तक बांधे रखा. तो आइए, जानते हैं कि 9 साल बाद भी यह फिल्म क्यों खास है.

नई दिल्ली. कुछ ऐसी फिल्में हैं जो न सिर्फ एंटरटेन करती हैं, बल्कि समाज के डबल स्टैंडर्ड की दीवारों को भी तोड़ती हैं और एक नई बहस छेड़ती हैं. 21 जुलाई 2017 को रिलीज हुई ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’, जिसे प्रकाश झा ने प्रोड्यूस और अलंकृता श्रीवास्तव ने डायरेक्ट किया है, ऐसी ही एक बोल्ड और बेबाक फिल्म है, जिसने आज अपनी रिलीज के 9 साल पूरे कर लिए हैं.

सेंसर बोर्ड की कई पाबंदियों और बैन के खतरे से जूझने के बाद, इस फिल्म ने आखिरकार बड़े पर्दे पर आकर सबको हैरान कर दिया. बहुत कम बजट में बनी इस डार्क कॉमेडी ने अपनी कसी हुई स्क्रिप्ट और अलग-अलग उम्र की चार औरतों की दबी हुई इच्छाओं की कहानी से दर्शकों का मन मोह लिया. तो आइए, जानते हैं कि 9 साल बाद भी इस फिल्म को क्यों एक जरूरी मास्टरपीस माना जाता है.

बता दें, फिल्म का रिलीज होने का सफर बिल्कुल आसान नहीं था. सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने इसके सब्जेक्ट मैटर और बोल्ड सीन की वजह से इसे सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था. हालांकि, मेकर्स की लंबी कानूनी और सोच की लड़ाई के बाद, फिल्म आखिरकार 21 जुलाई 2017 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई. रिलीज होने पर दशर्क इसकी बोल्डनेस और रियलिज्म से मोहित हो गए.

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भोपाल में सेट, यह फिल्म अलग-अलग उम्र और बैकग्राउंड की चार औरतों की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है. एक बुर्के में अपनी पहचान ढूंढ रही कॉलेज गर्ल है, दूसरी आजादी का सपना देख रही ब्यूटीशियन है, तीसरी तीन बच्चों की मां है जो अपने सपनों को जीना चाहती है और चौथी 55 साल की औरत है. यह कहानी हर औरत के उन पहलुओं को छूती है, जिन्हें समाज अक्सर दबाने की कोशिश करता है.

जो चीज इस फिल्म को इतना खास और एंटरटेनिंग बनाती है, वह है इसके कलाकारों की परफॉर्मेंस. रत्ना पाठक शाह (ऊषा बुआ जी), कोंकणा सेन शर्मा (शेरिन), अहाना कुमरा (लीला) और प्लाबिता बोरठाकुर (रिहाना) ने अपने किरदारों को इतनी जिंदादिली से निभाया है कि दर्शक सीधे उनके दुख और खुशी से जुड़ जाते हैं. सुशांत सिंह और विक्रांत मैसी जैसे बेहतरीन एक्टर भी अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराते हैं.

मशहूर फिल्ममेकर प्रकाश झा ने एक प्रोड्यूसर के तौर पर इस फिल्म पर भरोसा जताया. लगभग 6 करोड़ के बहुत कम बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद से कहीं बेहतर परफॉर्म किया. वर्ड-ऑफ-माउथ और क्रिटिक्स की तारीफ के दम पर इस फिल्म ने भारत में 18 करोड़ से ज्यादा की कमाई की, जो ऐसी एक्सपेरिमेंटल फिल्मों के लिए एक बड़ी कामयाबी है.

‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ की सबसे बड़ी ताकत इसका डार्क ह्यूमर है, जो सबसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को भी हल्के-फुल्के और मनोरंजक तरीके से दिखाता है. एक बार जब आप इसे देखने बैठेंगे, तो इसकी दिलचस्प कहानी और दमदार परफॉर्मेंस आपको स्क्रीन से बांधे रखेगी.

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