रविदासिया लोगों की मांग की टाइमिंग को लेकर भी बातें हो रही है. हालांकि इस समाज की यह मांग लंबे समय से रही है, लेकिन उन्होंने इस बार इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पंजाब दौर से पहले उठाई है. दरअसल, बीजेपी पहली बार पंजाब में मजबूती से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. वहीं उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत हैट्रिक की तैयारी है. ऐसे में माना जा रहा है कि इन्होंने पीएम मोदी तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की है. उन्हें उम्मीद है कि चुनावी मौसम में शायद पीएम मोदी उनकी मांग पर मंच से कोई आश्वासन दे जाएं. रविदासिया समुदाय के सबसे बड़ा धार्मिक संस्थान डेरा सचखंड बल्लान के प्रमुख संत निरंजन दास ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी मांग से अवगत कराया है.
रविदासिया समाज के लोग कौन हैं जो अलग धर्म मान्यता की कर रहे मांग?
उत्तर भारत के पाठ्यक्रमों में संत रविदास की कहानी शायद आपने भी पढ़ी होगी. 15वीं और 16वीं शताब्दी में जब देश में भक्ति आंदोलन का दौर चल रहा था उस समय महान कवि रविदास ने तमाम धर्मों के पाखंड और कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की. उन्होंने बेगमपुरा का कॉन्सेप्ट दिया, जिसके अंतर्गत उन्होंने एक ऐसे समाज की परिकल्पना पेश की जिमसें बिना दुख, डर या भेदभाव का आध्यात्मिक समाज हो. उस वक्त से जिन लोगों ने इस बात को फॉलो करना शुरू किया उन्होंने रविदास को संत कहने लगे.
संत रविदास चमड़े का काम करते थे. इस वजह से उनके अनुयायी बनने वालों में अधिकतर समाज के निचले तबके के लोग थे. आजादी के बाद संविधान के तहत इन्हें दलित कैटेगरी में माना गया. रविदासिया समाज के लोगों की आबादी मुख्य रूप से पंजाब और उत्तर प्रदेश में ही है. पंजाब के दोआब क्षेत्र के कपूरथला, होशियारपुर, नवांशहर और जालंधर जैसे इलाकों में इनका फैलाव दिखता है. वहीं उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में इनका बिखराव दिखता है.
इस समाज से जुड़े लोग बताते हैं कि इस समाज के लोगों ने खुद की अलग पहचान के लिए एकजुट होना शुरू किया. इसके लिए साल 2000 के आसपास बाबा संत पीपल दास के प्रयास से डेरा सचखंड बल्लान बनाया. तभी इन्होंने अपने समाज का नाम रविदासिया घोषित किया. इनकी परंपराएं और पूजा पद्धति काफी हद तक सिख धर्म की तरह ही है.
मई 2009 में हमलावरों ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में रविदासिया समूह पर एक बड़ा हमला हुआ, जिसमें डेरा सचखंड बल्लान के वरिष्ठ धार्मिक नेता संत रामानंद की हत्या कर दी गई. कई लोग घायल हुए. इसके बाद पूरे पंजाब में विरोध शुरू हुआ और इन्होंने अपनी अलग पहचान के लिए अलग धर्म के रूप में मान्यता की मांग करने लगे. साल 2010 से डेरा ने रविदासिया मंदिरों और गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब की जगह अपना ग्रंथ, अमृतबानी रखना शुरू कर दिया, जिसमें गुरु रविदास के 200 भजन हैं.
पंजाब की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने के प्रयास में रविदासिया
रविदासिया समुदाय ने जनगणना में अपने धर्म के लिए अलग पहचान देने की मांग तेज कर दी है. समुदाय का कहना है कि उनकी अपनी पूजा-पद्धति, धार्मिक स्थल, धर्मग्रंथ, प्रतीक और परंपराएं हैं, लेकिन जनगणना में उन्हें अलग धार्मिक श्रेणी का विकल्प नहीं मिलता. मांग के समर्थन में समुदाय ने धर्म की स्वतंत्रता से जुड़े मौलिक अधिकारों का हवाला दिया है.
समुदाय के नेताओं का कहना है कि अलग श्रेणी मिलने से रविदासिया धर्म की वास्तविक आबादी और भौगोलिक विस्तार का सही आकलन हो सकेगा. राजनीति में भी उनकी अलग पहचान हो पाएगी. डॉ. कमल सांपला के अनुसार, 2011 की जनगणना में पंजाब में रविदासिया और आद धर्मी समुदाय की संयुक्त आबादी करीब 30.95 लाख थी, जो राज्य की कुल आबादी का 11% से अधिक थी.
रविदासिया समुदाय का राजनीतिक प्रभाव भी अहम माना जाता है. 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव की तारीख भी उनकी वाराणसी तीर्थयात्रा को देखते हुए बदली गई थी. इसी साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु रविदास जयंती पर पंजाब के एक डेरे का दौरा किया और आदमपुर एयरपोर्ट का नाम गुरु रविदास के नाम पर रखा.
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