Image Slider

Last Updated:

1903 Sultanpur Gazetteer: वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते है कि अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की रणनीति भारत में काफी सफल रही. उन्होंने इस फॉर्मूले को सुल्तानपुर में भी अपनाया और हर चीज में हिंदुस्तानियों को जातिगत रूप से बांटने का काम किया. कई जगह हिंदू-मुसलमानों के दंगे कराने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था. हद तो तब हो गई जब उन्होंने नशे को भी जातिगत रूप दे दिया. एच. आर. नेविल्स द्वारा साल 1903 में तैयार किया गया “सुल्तानपुर गजेटियर” भी इस बात का गवाह है कि सुल्तानपुर में अंग्रेजों ने नशीले पदार्थों में भी जातियों को शामिल किया और इससे समाज में फूट डालने की कोशिश की.

भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने देश को गुलाम बनाए रखने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई थी. उन्होंने जातिवाद को निशाना बनाते हुए नशे की आदतों में भी जातियों को घुसा दिया था. इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में भी मिलता है. गजेटियर में एच. आर. नेविल्स लिखते हैं कि 1890 के दशक में ऊंची जातियों के लोग बड़े पैमाने पर भांग का सेवन करते थे. खासकर गांजे के रूप में जो कादीपुर में बहुत लोकप्रिय था.

चरस का भी इस्तेमाल होता था. लेकिन बहुत कम मात्रा में और आमतौर पर निचली जातियों द्वारा. वहीं, गांजे का इस्तेमाल लगभग विशेष रूप से राजपूतों, अहीरों और ऊंची जातियों द्वारा किया जाता था. मुस्लिम समुदाय के लोग अफीम का सेवन करते थे. आज हम जानेंगे कि सुल्तानपुर में जातिगत नशा प्रणाली अंग्रेजों की किस साजिश का हिस्सा थी.

वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते है कि अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की रणनीति भारत में काफी सफल रही. उन्होंने इस फॉर्मूले को सुल्तानपुर में भी अपनाया और हर चीज में हिंदुस्तानियों को जातिगत रूप से बांटने का काम किया. कई जगह हिंदू-मुसलमानों के दंगे कराने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था. हद तो तब हो गई जब उन्होंने नशे को भी जातिगत रूप दे दिया. एच. आर. नेविल्स द्वारा साल 1903 में तैयार किया गया “सुल्तानपुर गजेटियर” भी इस बात का गवाह है कि सुल्तानपुर में अंग्रेजों ने नशीले पदार्थों में भी जातियों को शामिल किया और इससे समाज में फूट डालने की कोशिश की.

इन जातियों में बंटा था नशा
एच. आर. नेविल्स ने लिखा है कि ‘देसी’ मुख्य रूप से पासियों और छोटी जातियों की पसंद थी. इसकी खपत अमेठी-गौरीगंज इलाके में ज्यादा थी. खासकर उन क्षेत्रों में जहां पासी समुदाय की आबादी अधिक थी. ‘गांजा’ के बारे में उन्होंने लिखा है कि यह हिंदुओं की उच्च और मजबूत जातियों में ज्यादा प्रसिद्ध था. विशेषकर ठाकुर और यादव इसका इस्तेमाल करने में आगे थे. संभवतः ब्राह्मण भी सेवन करते रहे होंगे, हालांकि एच. आर. नेविल्स ने ब्राह्मण शब्द न लेकर ‘उच्च जातियां’ लिखा है. वहीं, अगर इसके स्थान की बात करें तो कादीपुर गांजे का इस्तेमाल करने में खास स्थान रखता था. चरस का भी इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन यह कमजोर वर्गों के बीच पसंद थी.

मुस्लिम पसंद करते थे अफीम
अगर मुस्लिम समुदाय की बात करें तो वे लोग अफीम पसंद करते थे. लेकिन इस्तेमाल करने वालों की तादाद बहुत ज्यादा नहीं थी. हालांकि, आगे के समय में यह साबित हुआ कि इन “द्रव्य पदार्थों” के सेवन के सवाल पर जाति, मजहब और वर्ग की खाईयां लोगों ने पाट दीं. 1903 में अवैध शराब बनाने का धंधा चलन में था. यह बहुत अधिक नहीं था, लेकिन अमेठी-गौरीगंज के पासी इस काम में विशेष रूप से सक्रिय थे, हालांकि इससे राजस्व को कोई विशेष नुकसान नहीं होता था.

About the Author

authorimg

Manish Rai

काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||