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नैनीताल: देवभूमि उत्तराखंड अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती है. यहां मनाए जाने वाले लोकपर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, कृषि परंपरा और सामाजिक एकजुटता का संदेश भी देते हैं. कुमाऊं संभाग का प्रमुख लोकपर्व हरेला भी ऐसा ही पर्व है, जिसे हरियाली, खुशहाली और नई फसल के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष हरेला 16 जुलाई को मनाया जाएगा.

सावन माह की शुरुआत के साथ मनाया जाने वाला हरेला कुमाऊं के घर-घर में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है. यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती से भी जुड़ा माना जाता है, वहीं पहाड़ की कृषि संस्कृति में इसका विशेष महत्व है. हरेला केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि धरती, जंगल, जल और जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है.

7 तरह से अनाजों से उगता है हरेला

नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार सावन शुरू होने से करीब 10 दिन पहले घरों में हरेला बोया जाता है. हरेला बोने की प्रक्रिया भी बेहद खास होती है. इसके लिए रिंगाल की टोकरी का उपयोग किया जाता है. टोकरी में तिमिल और मालू के पत्ते बिछाए जाते हैं, फिर उसके ऊपर मिट्टी डाली जाती है. इस मिट्टी में पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं. इनमें जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट जैसे अनाज शामिल हो सकते हैं.

अलग-अलग अनाजों से उगने वाली हरी पत्तियां पहाड़ की समृद्ध कृषि परंपरा और विविधता का प्रतीक मानी जाती हैं. हरेला बोने के बाद इस टोकरी को घर के भीतर ईष्ट देवता के थान या पूजा स्थल के सामने रखा जाता है. प्रोफेसर तिवार बताते हैं कि अगले 10 दिनों तक सुबह और शाम पूजा के समय हरेला में पानी डाला जाता है. परिवार के सदस्य इसे श्रद्धा और उत्साह के साथ देखते हैं. सावन की पहली तिथि पर जब हरेला तैयार हो जाता है, तो टोकरी में उगी हरी पत्तियों को काटा जाता है. सबसे पहले इन्हें ईष्ट देवता को अर्पित किया जाता है. इसके बाद घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के सदस्यों को हरेला पूजते हैं.

इष्ट देवता का आशीर्वाद माना जाता है हरेला

हरेला पूजने की परंपरा भी बेहद भावनात्मक और खास होती है. उत्तराखंड के नैनीताल निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी बताते हैं कि कुमाऊं में बुजुर्ग हरेले की पत्तियों को पैरों से लेकर सिर और कानों तक स्पर्श कराते हैं. इसके बाद हरेले को कानों के पीछे रखा जाता है, जिसे ईष्ट देवता के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है. इस दौरान कुमाऊंनी बोली में आशीर्वाद दिया जाता है “जी रया, जागि रया, यो दिन बार भेटने रया, डुबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो, स्यालक जस त्राण हैजो, हिमालय में ह्यू छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया, जी रया, जागि रया.” इस आशीर्वाद का भाव बेहद सुंदर है. इसमें परिवार के सदस्यों के लंबे जीवन, अच्छे स्वास्थ्य, बुद्धि, समृद्धि और आपसी मिलन की कामना की जाती है. साथ ही यह प्रार्थना की जाती है कि जब तक हिमालय में बर्फ और गंगा में पानी है, तब तक जीवन में हरेला पर्व की खुशियां बनी रहें.

फसल से है संबंध 

प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि हरेला का संबंध खेती और पर्यावरण से भी जुड़ा है. मान्यता है कि हरेला जितना अच्छा और बड़ा उगेगा, उस वर्ष फसल भी उतनी ही अच्छी होगी. पहाड़ों में इसे मिट्टी की उर्वरता और कृषि की संभावनाओं से जोड़कर भी देखा जाता है. जिस मिट्टी में हरेला अच्छी तरह उगता है, उसे फसल के लिए अनुकूल माना जाता है. आज के दौर में जब पर्यावरण संरक्षण बड़ी चुनौती बन चुका है, हरेला पर्व का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है. यह लोकपर्व लोगों को पेड़ लगाने, हरियाली बचाने और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा देता है. कुमाऊं की संस्कृति में रचा-बसा हरेला, आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और पर्यावरण दोनों से जोड़ने वाला अनमोल पर्व है.

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