भारत की पारंपरिक व्यापार व्यवस्था में ‘सेर’ एक महत्वपूर्ण वजन इकाई हुआ करता था, जिसका उपयोग गांव से लेकर शहर तक बड़े पैमाने पर किया जाता था. लोहे और पीतल के बाटों तथा तराजू के माध्यम से होने वाला यह माप प्रणाली केवल व्यापार का हिस्सा नहीं था, बल्कि ईमानदारी और भरोसे का प्रतीक भी माना जाता था. समय के साथ भले ही यह प्रणाली समाप्त हो गई हो, लेकिन आज भी यह भारतीय इतिहास और ग्रामीण जीवन की एक अहम पहचान बनी हुई है.
एक्सपर्ट व बाट विक्रेता राहुल विश्वकर्मा ने लोकल 18 से बताया कि आज भले ही हर दुकान पर इलेक्ट्रॉनिक मशीनें दिखाई देती हैं, लेकिन एक समय ऐसा था जब गांव से लेकर शहर तक सामान तौलने के लिए सेर सबसे प्रचलित माप हुआ करता था. अनाज, दाल, आटा, घी, गुड़ और मसालों समेत लगभग सभी सामान की खरीद-बिक्री सेर के हिसाब से होती थी. उस दौर में सेर केवल वजन की एक इकाई नहीं, बल्कि व्यापार में पारदर्शिता का प्रतीक भी माना जाता था.
पुराने समय में दुकानदार सामान तौलने के लिए लोहे और पीतल के अलग-अलग वजन वाले बाट रखते थे. इन्हीं में एक बाट सेर का भी होता था. तराजू के एक पलड़े में सेर का बाट रखा जाता और दूसरे पलड़े में सामान. जब दोनों पलड़े बराबर हो जाते, तब माना जाता था कि ग्राहक को पूरा एक सेर सामान मिल गया है.
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में सेर का वजन थोड़ा अलग होता था, लेकिन ब्रिटिश काल में इसे लगभग 933 ग्राम के आसपास माना गया. इससे पहले कई रियासतों और क्षेत्रों में स्थानीय मानकों के अनुसार इसका वजन बदल जाता था. यही वजह थी कि अलग-अलग शहरों में व्यापार के दौरान वजन को लेकर कई बार भ्रम की स्थिति भी पैदा हो जाती थी.
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गांवों की छोटी किराना दुकानों और हाट-बाजारों में सेर का सबसे अधिक उपयोग होता था. किसान जब अपनी उपज बेचने आते थे या घर के लिए राशन खरीदते थे, तब दुकानदार तराजू और सेर के बाट से ही सामान तौलता था. उस समय इलेक्ट्रॉनिक मशीनें नहीं थीं, इसलिए बाट और तराजू को सही वजन का सबसे भरोसेमंद साधन माना जाता था.
आजादी के बाद भारत में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किलोग्राम प्रणाली अपनाई गई. इसके साथ ही धीरे-धीरे बाजार से सेर, छटांक और मन जैसी पुरानी वजन इकाइयों का उपयोग कम होने लगा. सरकारी नियमों के तहत व्यापार में केवल मीट्रिक प्रणाली का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया. इसके बाद दुकानों में किलो और ग्राम वाले बाट तथा बाद में डिजिटल मशीनों ने पूरी तरह से सेर की जगह ले ली.
अब बाजार में सेर का उपयोग नहीं होता, लेकिन ग्रामीण इलाकों के बुजुर्ग आज भी बातचीत में इसका जिक्र करते हैं. कई लोग दूध, अनाज और सब्जी की मात्रा बताते समय आज भी “एक सेर” या “दो सेर” जैसे शब्द इस्तेमाल कर देते हैं. सेर केवल वजन की एक इकाई नहीं, बल्कि पुराने समय की जीवनशैली का भी हिस्सा था.
लोहे, पीतल और कांसे से बने पुराने बाट आज इतिहास की धरोहर माने जाते हैं. कई संग्रहालयों, पुराने बाजारों और कुछ परिवारों में ये बाट आज भी सुरक्षित रखे गए हैं. सुल्तानपुर के दरियापुर इलाके में विक्रम सिंह के यहां भी सेर का यह बाट आज मौजूद है, जिसे देखने के लिए लोग आते हैं. इसे देखकर नई पीढ़ी समझ सकती है कि बिना बिजली और डिजिटल तकनीक के भी लोग कितनी ईमानदारी और सटीकता से व्यापार करते थे.
सेर केवल एक पुराने बाट जैसी वस्तु नहीं है, बल्कि यह भारत की पारंपरिक व्यापार व्यवस्था, विश्वास और ईमानदारी की भी कहानी है. विक्रम सिंह कहते हैं कि समय के साथ तकनीक बदल गई, लेकिन सही वजन देने और पारदर्शी व्यापार करने की भावना आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. उनके यहां मौजूद यह सेर आज भी पुरानी धरोहर को लोगों से परिचित करा रही है.
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