Sultanpur News: आज शहरों के फ्लैट और मकान बालकनी के बिना अधूरे माने जाते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कच्चे घरों में बालकनी नहीं बल्कि ‘ओसारा’ हुआ करता था. यह सिर्फ बैठने की जगह नहीं, बल्कि परिवार, मेहमानों और रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा था. समय के साथ निर्माण तकनीक, शहरीकरण और लोगों की जरूरतें बदलीं, तो ओसारे की जगह आधुनिक बालकनी ने ले ली. आखिर क्या था ओसारा और कैसे बदल गया घरों का पूरा सिस्टम, आइए जानते हैं.
क्या होता है ओसारा ?
ग्रामीण बजरंग बहादुर मिश्रा ने लोकल 18 से बातचीत की. उन्होंने बताया कि ओसारा ग्रामीण वास्तुकला के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में माना जाता है. गांव की पारंपरिक विरासत को ओसारा संजोकर रखा हुआ था. इसे कच्चे मकान के सामने धान की पराली, सरसों की पिंजी, अरहर का डंठल और बांस को काटकर तैयार किया जाता था. ओसारा उसे कहते हैं जो घर के ठीक सामने दीवार से सटाकर नीचे की ओर झुका कर लगाया गया होता है, जिसे आज के समय में बरामदा या बालकनी कहा जाता है.
कैसे बनता है ?
गांव में जब पहले ओसारा बनाया जाता था तो इसके लिए कई तरह की सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता था. इसके लिए बांस की कोठ से हरा बांस काट के लाया जाता था और ओसारा बनाने के 1 दिन पहले अरहर के डंठल को पानी में अच्छे से भिगो दिया जाता था. जब वह अरहर का डंठल 24 घंटे पानी में भीग रहता तो फूल जाता था और उसे रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. सबसे पहले बना ओसारा का फ्रेम बनाया जाता था. उसके बाद पिंजी बिछाई जाती थी. फिर अरहर के डंठल को बीच में सेट करके सरसों के पिंजी को कसा जाता और उसके बाद उसके ऊपर धान की पराली या सरपत बिछाकर उसे अरहर की कैनी से कसा जाता और गांव वाले मिलकर एक साथ उसे उठाते और घर के सामने लगाते थे.
गांव की है बालकनी और बरामदा
यह ओसारा कच्चे मकान का बालकनी और बरामदा होता था. पर समय के साथ-साथ परिवर्तन हुआ और कच्चे मकान धीरे-धीरे विलुप्त हो जा रहे हैं और जहां पर कच्चे मकान हैं भी, उनके सामने तो ओसारा अब लोहे की चादर या फिर सीमेंट की चादर के रूप में आ चुका है. अब पुराने तरीके से बहुत कम ही देखने को मिलता है.
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Kavya Mishra is working with News18 Hindi as a Senior Sub Editor in the regional section (Uttar Pradesh, Uttarakhand, Haryana and Himachal Pradesh). Active in Journalism for more than 7 years. She started her j…और पढ़ें
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