करसन घावरी ने भारत के लिए 39 टेस्ट मैचों में 109 विकेट चटकाए और 913 रन बनाए, वहीं 19 वनडे मैचों में उन्होंने 15 विकेट हासिल किए. ये आंकड़े उस दौर के हैं जब आज की तरह लगातार क्रिकेट नहीं खेला जाता था. घावरी भारत के पहले ऐसे तेज गेंदबाज बने जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 100 विकेटों का आंकड़ा पार किया.
रफ़्तार का खौफ और अनोखा हुनर: तेज गेंदबाजी के साथ लेफ़्ट आर्म स्पिन
करसन घावरी के पास वह जादुई हुनर था जो क्रिकेट के इतिहास में बहुत कम गेंदबाजों के पास देखने को मिलता है. वह मैच की शुरुआत बाएं हाथ से बेहद तेज और सटीक स्विंग गेंदबाजी के साथ करते थे. उनकी उठती हुई गेंदें और जबरदस्त बाउंसर दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाजों को परेशान करने के लिए काफी थीं लेकिन घावरी की असली कला मैच के आगे बढ़ने पर दिखती थी. जैसे ही गेंद पुरानी और चमकदार से खुरदरी हो जाती, घावरी अपनी रणनीति बदल लेते थे. वह अपनी तेज गेंदबाजी के रन-अप को छोटा करते और उसी पुरानी गेंद से खतरनाक लेफ़्ट आर्म ऑर्थोडॉक्स स्पिन (बाएं हाथ की स्पिन) फेंकना शुरू कर देते थे. एक ही मैच में, एक ही गेंद से तेज गेंदबाजी और स्पिन दोनों का ऐसा बेजोड़ प्रदर्शन दुनिया के बल्लेबाजों को पूरी तरह भ्रमित कर देता था.
जब दुनिया के दिग्गजों को किया घुटने टेकने पर मजबूर
घावरी ने अपने करियर में दुनिया के सबसे धाकड़ और खूंखार बल्लेबाजों का सामना किया और उन्हें अपनी रफ्तार तथा लाइन-लेंथ से लाचार किया. चाहे वेस्टइंडीज के महान विवियन रिचर्ड्स हों, कप्तान एल्विन कालीचरण हों या फिर ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज, घावरी ने सबको अपनी गति से छकाया. उनका सबसे यादगार प्रदर्शन 1981 का मेलबर्न टेस्ट मैच माना जाता है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उस ऐतिहासिक मैच में घावरी ने दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज जॉन डायसन और कप्तान ग्रेग चैपल को लगातार दो गेंदों पर आउट करके सनसनी मचा दी थी. शून्य पर ग्रेग चैपल का विकेट लेना मैच का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जिसके दम पर भारत ने वह मुकाबला जीता और सीरीज बराबर की. घावरी ने कप्तान कपिल देव के साथ मिलकर कई सालों तक भारतीय तेज गेंदबाजी की मजबूत नींव रखी.
निचले क्रम के संकटमोचक: बल्लेबाजी में उपयोगी योगदान
घावरी सिर्फ एक गेंदबाज नहीं, बल्कि एक बेहद उपयोगी ऑलराउंडर थे. जब भी भारतीय टीम का ऊपरी बल्लेबाजी क्रम ढह जाता, घावरी निचले क्रम में आकर एक योद्धा की तरह डट जाते थे. उनके पास बड़े शॉट्स खेलने की क्षमता थी और वह विकेट पर समय बिताना जानते थे. टेस्ट क्रिकेट में उनके नाम दो अर्धशतक दर्ज हैं, जिसमें उनका सर्वोच्च स्कोर 86 रन था, जो उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुंबई में बनाया था. घावरी ने सैयद किरमानी के साथ मिलकर आठवें विकेट के लिए 127 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी की थी, जिसने भारत को मजबूत स्थिति में पहुंचाया. उनकी यह जुझारू बल्लेबाजी भारत के लिए कई मौकों पर संजीवनी बूटी साबित हुई.
रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने कोच और मेंटर के रूप में भारतीय क्रिकेट की सेवा जारी रखी और सौराष्ट्र जैसी घरेलू टीम को रणजी चैंपियन बनाने में मुख्य भूमिका निभाई. करसन घावरी भारतीय क्रिकेट के इतिहास में हमेशा एक ऐसे ‘सुपरहीरो’ के रूप में याद किए जाएंगे, जिसने अपनी रफ्तार, घूमती गेंदों और बल्ले की धमक से भारतीय टीम को विदेशों में जीतना सिखाया.
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