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होमताजा खबरनॉलेजपासपोर्ट और नागरिकता, दोनों के लिए अलग कानून; पूर्व डिप्लोमैट ने समझाया फर्क

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Passport Citizenship Proof News: विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण न मानने वाले बयान पर देश में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. पूर्व डिप्लोमैट निरुपमा मेनन राव ने पासपोर्ट के लीगल स्टेटस और प्रैक्टिकल लाइफ के फर्क को समझाया है. कपिल सिब्बल और जावेद अख्तर जैसे लोगों ने भी सरकार के इस रुख पर तीखे सवाल उठाए हैं.

पासपोर्ट और नागरिकता, दोनों के लिए अलग कानून; पूर्व डिप्लोमैट ने समझाया फर्कZoom

क्या आपका पासपोर्ट सिर्फ एक ट्रेवल डाक्यूमेंट है? पूर्व डिप्लोमैट निरुपमा राव ने पासपोर्ट एक्ट और नागरिकता कानून का फर्क समझाया.

नई दिल्ली: क्या आपका पासपोर्ट आपकी नागरिकता का असली सबूत है? पासपोर्ट सेवा दिवस पर विदेश मंत्रालय के एक बयान ने हलचल मचा दी. MEA ने कहा कि पासपोर्ट सिर्फ एक ट्रेवल डाक्यूमेंट है. यह आपकी नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण नहीं है. इस कानून स्पष्टीकरण ने आम जनता के बीच एक अजीब सा डर पैदा कर दिया है. लोग पूछ रहे हैं कि अगर पासपोर्ट भी नागरिकता का सबूत नहीं है तो फिर क्या है. इस गंभीर मुद्दे पर पूर्व डिप्लोमैट निरुपमा मेनन राव ने सोशल मीडिया पर पासपोर्ट से जुड़ी भ्रांतियां दूर की हैं. उन्होंने सरकार के बयान के पीछे की हकीकत को डिकोड किया है. इस विवाद में विपक्ष के नेता कपिल सिब्बल और मशहूर राइटर जावेद अख्तर भी कूद पड़े हैं.

पासपोर्ट और नागरिकता की यह बहस शुरू कैसे हुई?

विदेश मंत्रालय के एक ऑफिशियल ने पासपोर्ट सेवा दिवस के कार्यक्रम में कहा कि पासपोर्ट को मुख्य रूप से केवल एक ट्रेवल डाक्यूमेंट के रूप में देखा जाना चाहिए. इस एक लाइन ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी. विपक्ष के नेताओं और आम लोगों ने सरकार की इस टाइमिंग पर तीखे सवाल उठाए.

  • पूर्व डिप्लोमैट निरुपमा मेनन राव ने कहा कि इस पूरी बहस ने रोशनी से ज्यादा सिर्फ गर्मी पैदा करने का काम किया है. लोग इस लीगल बारीकी को समझ नहीं पा रहे हैं और उनमें पैनिक फैल रहा है.
  • विदेश मंत्रालय को बाद में इस पर एक डिटेल सफाई भी जारी करनी पड़ी. सरकार ने कहा कि यह कोई नई नीति या नया कानून नहीं है. यह लीगल स्थिति पिछले कई दशकों से देश में हूबहू लागू है. पिछले 12 सालों में भी इस नियम में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
  • कानूनन पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत पासपोर्ट रेगुलेट होता है. वहीं देश की नागरिकता पूरी तरह से सिटीजनशिप एक्ट 1955 के तहत तय होती है. कानून और पब्लिक की समझ के बीच हमेशा एक बड़ा गैप होता है.

आम भारतीय के लिए पासपोर्ट इस रिपब्लिक का सबसे बड़ा और सबसे पावरफुल डाक्यूमेंट है. विदेशी सरकारें भी इस डाक्यूमेंट पर भरोसा करके ही किसी को अपने देश में एंट्री देती हैं. इसलिए जनता का डरना और सवाल पूछना पूरी तरह से नेचुरल है.

पासपोर्ट एक्ट और सिटीजनशिप एक्ट का वो कड़वा सच

  • निरुपमा राव ने समझाया कि पासपोर्ट कभी भी नागरिकता को क्रिएट नहीं करता है. यह केवल एक डाक्यूमेंट है जो सरकार की जांच के बाद जारी होता है. अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता को कोर्ट में चैलेंज किया जाता है तो वहां पासपोर्ट अंतिम सबूत नहीं माना जाएगा. ऐसी स्थिति में अदालत केवल सिटीजनशिप एक्ट 1955 के प्रावधानों को ही देखेगी.
  • विदेश मंत्रालय ने भी इस बात को सपोर्ट करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट के साल 2013 के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने डिसीजन में साफ कहा था कि सिर्फ पासपोर्ट होने से कोई स्वतः भारतीय नागरिक नहीं बन जाता. देश की संसद द्वारा बनाए गए कानून ही नागरिकता का फाइनल डिसीजन करते हैं.
  • सुप्रीम कोर्ट भी कई अलग-अलग मामलों में पहचान के डाक्यूमेंट्स और नागरिकता के सबूत के बीच अंतर को स्पष्ट कर चुका है. जैसे आधार कार्ड आपकी पहचान तो साबित कर सकता है लेकिन वह आपकी नागरिकता का डाक्यूमेंट नहीं है. पासपोर्ट एक्ट की धारा 20 केंद्र सरकार को एक खास पावर देती है. इसके तहत पब्लिक इंटरेस्ट में सरकार किसी गैर-नागरिक को भी ट्रेवल डाक्यूमेंट या पासपोर्ट जारी कर सकती है.
हालांकि नॉर्मल लाइफ में पासपोर्ट सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही दिया जाता है. लेकिन इसी टेक्निकल लूपहोल के कारण कानून की नजर में पासपोर्ट को नागरिकता का निर्विवाद प्रमाण नहीं माना जाता. अगर कभी फ्रॉड या माता-पिता की राष्ट्रीयता पर विवाद होता है तो नागरिकता साबित करने के लिए दूसरे रिकॉर्ड्स की जरूरत पड़ती है.

असम एनआरसी के जख्मों को क्यों हरा कर गया यह नया विवाद?

  1. निरुपमा राव ने असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस यानी एनआरसी का विशेष रूप से जिक्र किया है. उन्होंने कहा कि असम एनआरसी का एक्सपीरिएंस बेहद पेनफुल और तकलीफदेह रहा है.
  2. वहां सिर्फ कागजों में मामूली अंतर होने की वजह से लाखों लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा था. स्कूल सर्टिफिकेट, जमीन के रिकॉर्ड और वोटर लिस्ट में नाम अलग होने से लोगों की नागरिकता दांव पर लग गई थी. भारत में सिविल रजिस्ट्रेशन का सिस्टम पिछले कई दशकों में बहुत ही असमान तरीके से डेवलप हुआ है.
  3. देश के करोड़ों बुजुर्ग ऐसे समय में पैदा हुए थे जब जन्म प्रमाण पत्र यानी बर्थ सर्टिफिकेट बनाने का कोई परमानेंट सिस्टम नहीं था. ग्रामीण इलाकों में आज भी पुराने रिकॉर्ड्स पूरी तरह से गायब या अधूरे हैं. जब सरकार अचानक ऐसे बयान देती है तो आम जनता के मन में असम जैसा डर दोबारा पैदा हो जाता है.
  4. निरुपमा राव ने कहा कि भारत को अब एक मजबूत और यूनिवर्सल बर्थ रजिस्ट्रेशन सिस्टम की सख्त जरूरत है. देश के आर्काइवल रिकॉर्ड्स को पूरी तरह से डिजिटल और रिलायबल बनाना होगा.
  5. किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता सिर्फ एक मिसिंग पेपर या स्पेलिंग की गलती के कारण बंधक नहीं बननी चाहिए. पासपोर्ट की वैल्यू कम नहीं हुई है बल्कि हमारे एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम को और ज्यादा परफेक्ट होने की जरूरत है.

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