यह बात कल्पना से परे लगती है कि कोई नेता लोकसभा में ‘400 पार’ का प्रचंड बहुमत लाने वाली पार्टी कांग्रेस से बाहर निकलकर महज दो-ढाई साल की सियासी गोलबंदी से उसे सत्ता से बेदखल कर दे. विभिन्न विरोधाभासी विचारधाराओं को साथ लेकर चलने की खूबी के कारण ही वीपी सिंह यह कर सके. कांग्रेस को हराने के लिए उन्होंने जो राष्ट्रीय मोर्चा बनाया था, उसमें टीडीपी, डीएमके और असम गण परिषद जैसी क्षेत्रीय पार्टियां शामिल थीं. उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और बोफोर्स तोप सौदे में दलाली जैसे भ्रष्टाचार के मुद्दों पर ऐसी जमीन तैयार की कि भाजपा और वामपंथी पार्टियों जैसे दो धुर विरोधी वैचारिक समूह भी उनके साथ आ जुटे. उनके बाहरी समर्थन से केंद्र में सरकार बनी और वीपी सिंह देश के आठवें प्रधानमंत्री के तौर पर गद्दी पर बैठे. भारतीय राजनीति में यही वो टर्निंग पॉइंट भी था, जहां से कांग्रेस की कीमत पर भाजपा का विस्तार होना शुरू हुआ.
दुस्साहसी फैसलों के ‘राजा’
वीपी सिंह के कई प्रशंसक उन्हें ‘मांडा के राजा’ कहते थे, लेकिन दरअसल वे ‘दुस्साहसी फैसलों के राजा’ अधिक साबित हुए. राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने कर चोरी के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी. इससे राजीव गांधी ने उन्हें रक्षा मंत्रालय में भेज दिया. लेकिन उन्होंने वहां भी यह सब करना जारी रखा. जर्मनी से पनडुब्बी खरीद के सौदे में कथित कमीशन के मामले में उन्होंने प्रधानमंत्री की सहमति लिए बिना ही जांच के आदेश दे दिए. यह अपने आप में एक असामान्य बात थी. बाद में सरकार को बाकायदा एक आदेश जारी कर इसे रद्द करना पड़ा. इस पर वीपी सिंह इस्तीफा देकर कांग्रेस से बाहर निकल गए. उस समय पूरे देश में एकछत्र राज कर रही कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बनाना एक ऐसा फैसला था, जो उनके राजनीतिक कॅरियर पर विराम भी लगा सकता था.
वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कई चौंकाने वाले फैसले लिए. इनमें से एक था कश्मीर के मुस्लिम नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का गृह मंत्री बनाना. यह पहला और आखिरी मौका था, जब गृह मंत्रालय किसी मुसलमान को सौंपा गया. इसका मुख्य मकसद तो मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ लामबंद करना था, लेकिन साथ ही यह सोच भी थी कि इससे कश्मीरी समाज को मुख्यधारा में लाया जा सकेगा. मगर यह प्रयोग देश, कश्मीर और मुसलमानों, तीनों के लिए भारी पड़ा. 8 दिसंबर 1989 को आतंकवादियों ने गृह मंत्री की बेटी डॉ. रूबैया सईद का अपहरण कर लिया. उनकी रिहाई के बदले में पांच आतंकियों को छोड़ना पड़ा, जिसने कश्मीर घाटी को आतंकवाद के अभूतपूर्व रक्तरंजित दौर में धकेल दिया.
‘सामाजिक न्याय’ के फेर में गंवाई सरकार!
ओबीसी आरक्षण का लाभ ले रही आज की पीढ़ी में से शायद कई लोग इसके पीछे के सियासी घटनाक्रम से पूरी तरह वाकिफ न हों. अगस्त 1990 में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की धूल खा रही रिपोर्ट को अचानक संसद में पेश कर दिया. इससे ओबीसी वर्ग के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण के रास्ते खुल गए. आज देशभर की सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण कमोबेश लागू है और कोई भी दल इसका विरोध करने की सियासी हिम्मत नहीं रख सकता. लेकिन उस वक्त मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इसके खिलाफ खुलकर मैदान में आ गई थी. सरकार को बाहर से समर्थन देने की वजह से भाजपा ने इसका सीधा विरोध तो नहीं किया, लेकिन वह भी इससे सहज नहीं थी. इसलिए इसकी काट के तौर पर उसने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठा दिया. तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा शुरू कर दी, जिसका पटाक्षेप बिहार में उनकी गिरफ्तारी से हुआ. केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए भाजपा शायद ऐसे ही किसी बहाने की तलाश में थी. इस तरह महज 11 महीने में वीपी सिंह की सरकार गिर गई. लेकिन वहां से देश में मंडल और कमंडल की जो राजनीति शुरू हुई, वह आज भी बदस्तूर जारी है.
विडंबना यह भी रही कि मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की सिफारिश और बाद में हुए हिंसक प्रदर्शनों के कारण वीपी सिंह सवर्णों में तो खलनायक बने ही, लेकिन उन अन्य पिछड़ा वर्ग या दीगर तबकों ने भी उन्हें कभी सामाजिक न्याय के ‘नायक’ का दर्जा नहीं दिया, जिसकी वे अपेक्षा रखते थे. अलबत्ता, इसका राजनीतिक फायदा बाद में उन अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों ने खूब उठाया, जो उनके ही जनता दल से निकले थे.
ईमानदारी और आदर्शवाद की छवि
आज की राजनीति में जहां भ्रष्टाचार को ‘न्यू नॉर्मल’ मान लिया गया है, वहीं वीपी सिंह ने ईमानदारी और भ्रष्टाचार-विरोध को अपनी राजनीति की सबसे बड़ी पहचान बनाया. 1989 के चुनाव में नारा गूंजता था – ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है.’ युवावस्था में ही उन्होंने अपनी राजनीतिक प्रतिभा दिखानी शुरू कर दी थी और उनकी छवि ईमानदार राजनीतिज्ञ की बनने लगी थी. इस छवि को और पुख्ता करने के लिए उन्होंने अपने हिस्से की पुश्तैनी भूमि तक दान कर दी थी.
1980 से 1982 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए जब फूलन देवी गैंग ने दलितों सहित 16 लोगों की हत्या की तो वीपी सिंह ने इसे अपनी नैतिक विफलता मानकर इस्तीफा दे दिया. उनका यह कदम ईमानदार राजनीति का एक साक्षात उदाहरण माना गया. हालांकि, आलोचक इसे इंदिरा गांधी द्वारा हटाए जाने से पहले का दांव भी मानते हैं, जिसका सिंह ने हमेशा खंडन किया.
प्रधानमंत्री न बनना पड़े, इसलिए ‘अज्ञातवास’ में रहे
मई 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद जब त्रिशंकु सदन की स्थिति बनी तो गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी दलों ने मिलकर ‘संयुक्त मोर्चा’ बनाया. ज्योति बसु, लालू यादव, मुलायम सिंह और रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेता वीपी सिंह को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत थे. लेकिन स्वयं सिंह किसी भी कीमत पर यह जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते थे. देवाशीष मुखर्जी की किताब ‘द डिस्रप्टर’ के मुताबिक, वे नेताओं के दबाव से बचने के लिए अपने तीन मूर्ति मार्ग स्थित घर से चुपचाप गायब हो गए. सुरक्षाकर्मियों को छकाते हुए वे कई घंटों अज्ञातवास में रहे, जबकि 8 मुख्यमंत्री समेत अनेक वरिष्ठ नेता उनके घर पर डेरा डाले रहे. उनके नहीं मिलने और ज्योति बसु के भी इनकार के बाद अंततः एचडी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया गया. टीवी पर देवेगौड़ा के अगले प्रधानमंत्री बनने की खबर देखने के बाद ही वीपी सिंह ने अपना ‘अज्ञातवास’ खत्म किया था.
वीपी सिंह की जिंदगी के आखिरी दस साल बीमारियों से जूझते गुजरे. कैंसर और डायलिसिस के बीच उन्होंने अपना समय पेंटिंग्स और कविताएं लिखने में बिताया. बाद में 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को आकार देने में उनकी बड़ी भूमिका रही, जिससे मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.
26 नवंबर 2008 को जब मुंबई हमलों से पूरा देश आक्रोशित था, उसी के अगले दिन 27 नवंबर को वीपी सिंह का निधन हो गया. इस तरह देश की राजनीति में इतनी बड़ी उथल-पुथल मचाने वाले इस नेता के जाने की खबर मुंबई हमले की खबरों के बीच अखबारों के सिंगल या डबल कॉलम में सिमटकर रह गई.
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