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लेखक-तनुजा
शिक्षाविद्
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। जनसेविका के रुप में प्रख्यात है।)

देश में मेडिकल शिक्षा के सबसे प्रतिष्ठित प्रवेश द्वार माने जाने वाले नीट-यूजी को निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय परीक्षा बनाने के बड़े-बड़े दावे हर साल किए जाते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि हर वर्ष कोई न कोई विवाद इस परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर देता है। कभी पेपर लीक, कभी फर्जी अभ्यर्थी, कभी परीक्षा रद्द, कभी परिणाम विवाद और कभी तकनीकी खामियां। इन सबके बीच सबसे बड़ा नुकसान उस लाखों छात्रों का होता है, जो वर्षों की मेहनत, उम्मीद और सपनों के साथ परीक्षा केंद्र तक पहुंचते हैं। 21 जून को आयोजित पुनर्परीक्षा ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर इस व्यवस्था में सबसे कमजोर कड़ी हमेशा छात्र ही क्यों बन जाता है? मध्य प्रदेश के विदिशा से सामने आए वीडियो में कुछ छात्र केवल कुछ सेकेंड या दो-चार मिनट की देरी के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं कर सके। यह वही छात्र थे, जिन्होंने पहले परीक्षा रद्द होने की पीड़ा झेली, फिर लगभग पचास दिन तक दोबारा परीक्षा का इंतजार किया और अंतत: परीक्षा केंद्र के बाहर ही रोक दिए गए। नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन नियमों का उद्देश्य न्याय होना चाहिए, केवल कठोरता नहीं।

विडंबना यह है कि जिन संस्थाओं की लापरवाही के कारण परीक्षा रद्द होती है, उनके लिए कोई तत्काल दंड या जवाबदेही तय नहीं होती। लेकिन यदि कोई छात्र ट्रैफिक, परिवहन, मौसम या किसी अन्य अनियंत्रित परिस्थिति के कारण कुछ सेकेंड देर से पहुंच जाए तो उसके पूरे वर्ष की मेहनत एक झटके में समाप्त हो जाती है। यह व्यवस्था छात्रों को अनुशासन नहीं, बल्कि असमानता का संदेश देती है। दूसरी ओर, जिस परीक्षा को अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था के बीच कराने का दावा किया गया, उसी दौरान बिहार के लखीसराय में एक बड़े सॉल्वर गिरोह का पर्दाफाश हो गया। जांच में सामने आया कि असली अभ्यर्थियों की जगह दूसरे लोग परीक्षा देने पहुंचे थे। करोड़ों रुपये के सौदे, मेडिकल कॉलेजों से जुड़े छात्र, बायोमीट्रिक सत्यापन से जुड़े कर्मचारी और संगठित नेटवर्क-यह सब इस बात का संकेत है कि समस्या केवल परीक्षा केंद्र के बाहर खड़े छात्रों की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि सुरक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाने वाली बायोमीट्रिक प्रणाली तक में सेंध लगाने की कोशिश हुई।

यदि पहचान सत्यापन की प्रक्रिया में ही शामिल लोग फर्जीवाड़े का हिस्सा बन जाएं, तो फिर केवल परीक्षार्थियों की तलाशी लेकर परीक्षा को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। इससे यह स्पष्ट होता है कि तकनीक तभी प्रभावी होती है, जब उसके संचालन में ईमानदारी और जवाबदेही भी हो। बीते कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में सुरक्षा के नाम पर छात्रों पर लगातार नए-नए प्रतिबंध लगाए गए हैं। परीक्षा केंद्रों पर अंगूठी, चूड़ी, घड़ी, हेयर क्लिप, हेयर बैंड, कान की बाली, स्कार्फ, बेल्ट, पर्स, यहां तक कि पानी की बोतल तक ले जाने पर रोक लगा दी जाती है। कई बार अभ्यर्थियों को घंटों पहले पहुंचना पड़ता है, कड़ी जांच से गुजरना पड़ता है और मामूली मानवीय भूल भी उन्हें परीक्षा से बाहर कर देती है। लेकिन दूसरी तरफ संगठित अपराधी गिरोह लाखों रुपये लेकर पूरी व्यवस्था को चुनौती देते रहते हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि सख्ती वास्तव में किस पर हो रही है-मेहनत करने वाले छात्रों पर या अपराधियों पर?

समस्या का दूसरा पहलू जवाबदेही का अभाव है। जब भी कोई परीक्षा विवादों में आती है, जांच एजेंसियां सक्रिय होती हैं, गिरफ्तारियां होती हैं और कुछ समय बाद मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है। लेकिन जिन संस्थागत कमियों के कारण बार-बार ऐसी घटनाएं होती हैं, उन्हें दूर करने की दिशा में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देते। यदि किसी परीक्षा के आयोजन में गंभीर लापरवाही सिद्ध होती है, तो संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए। केवल जांच समितियां बनाना और प्रेस विज्ञप्तियां जारी करना पर्याप्त नहीं है। भारत पहले भी परीक्षा घोटालों का दर्द झेल चुका है। मध्य प्रदेश का व्यापमं घोटाला इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि यदि परीक्षा प्रणाली कमजोर हो जाए तो उसका असर केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इतने बड़े अनुभवों के बावजूद यदि आज भी वही कमियां दोहराई जा रही हैं, तो यह चिंतन का विषय है। समय की मांग है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के स्वरूप पर गंभीर पुनर्विचार किया जाए।

जहां संभव हो, वहां आधुनिक तकनीक आधारित ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल एन्क्रिप्शन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, मजबूत साइबर सुरक्षा और बहुस्तरीय सत्यापन प्रणाली को अपनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। इसी तरह शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और डिग्रियों को भी सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि फर्जी प्रमाणपत्रों और पहचान की समस्या पर स्थायी रोक लग सके। साथ ही परीक्षा केंद्रों पर मानवीय संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि कोई छात्र कुछ सेकेंड या एक-दो मिनट की देरी से पहुंचता है और परीक्षा शुरू होने में अभी समय है, तो परिस्थितियों का आकलन करने का विवेक भी व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए। नियमों का उद्देश्य अवसर छीनना नहीं, बल्कि निष्पक्षता सुनिश्चित करना होना चाहिए। कानून और संवेदनशीलता दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

नई शिक्षा नीति का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम बदलना या शिक्षण पद्धति सुधारना नहीं होना चाहिए। उसकी सबसे बड़ी कसौटी यह है कि क्या देश का विद्यार्थी परीक्षा प्रणाली पर भरोसा कर पा रहा है? यदि लाखों छात्र हर परीक्षा के बाद इस आशंका में जी रहे हों कि कहीं पेपर लीक न हो जाए, परिणाम विवादित न हो जाए, परीक्षा रद्द न हो जाए या मामला अदालत में न पहुंच जाए, तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की चुनौती है। देश का भविष्य उन युवाओं के हाथ में है जो दिन-रात मेहनत करके अपने सपनों को आकार देते हैं। उनकी सबसे बड़ी अपेक्षा केवल एक निष्पक्ष अवसर की होती है।

यदि व्यवस्था उन्हें यही भरोसा नहीं दे पा रही कि उनकी मेहनत सुरक्षित है, तो फिर किसी भी शिक्षा सुधार, किसी भी नई नीति और किसी भी बड़े दावे का अर्थ अधूरा रह जाता है। परीक्षा व्यवस्था की वास्तविक सफलता तभी होगी, जब सख्ती का बोझ केवल छात्रों पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर भी समान रूप से दिखाई देगा जो व्यवस्था में सेंध लगाने की कोशिश करते हैं। जिस दिन ईमानदार छात्र को यह विश्वास हो जाएगा कि उसकी मेहनत किसी पेपर लीक, सॉल्वर गैंग या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट नहीं चढ़ेगी, उसी दिन देश की परीक्षा प्रणाली सच मायनों में सफल मानी जाएगी।

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