रामपुर के किसान रघुवीर ने खेत पर मेंथा ऑयल डिस्टिलेशन प्लांट लगाकर खुद और आसपास के किसानों का खर्च घटाया, प्रोसेसिंग फीस से अतिरिक्त आमदनी भी कमा रहे हैं. रघुवीर बताते हैं कि वह करीब 20 साल से मेंथा की खेती कर रहे हैं. पहले जब फसल तैयार होती थी तो तेल निकलवाने के लिए जाना पड़ता था. फसल को ले जाने का किराया अलग लगता था और कई बार इंतजार भी करना पड़ता था. ऐसे में खेती से होने वाले मुनाफे का एक हिस्सा इसी काम में निकल जाता था यही वजह थी कि उन्होंने अपने यहां ही तेल निकालने की व्यवस्था करने का फैसला लिया. अब उनके खेत के पास लगी मशीन में मेंथा की फसल से तेल निकाला जाता है.
20 साल से कर रहे हैं मेथा की खेती
रघुवीर बताते हैं कि वह करीब 20 साल से मेंथा की खेती कर रहे हैं. पहले जब फसल तैयार होती थी तो तेल निकलवाने के लिए जाना पड़ता था. फसल को ले जाने का किराया अलग लगता था और कई बार इंतजार भी करना पड़ता था. ऐसे में खेती से होने वाले मुनाफे का एक हिस्सा इसी काम में निकल जाता था यही वजह थी कि उन्होंने अपने यहां ही तेल निकालने की व्यवस्था करने का फैसला लिया. अब उनके खेत के पास लगी मशीन में मेंथा की फसल से तेल निकाला जाता है. इसका फायदा सिर्फ रघुवीर को ही नहीं बल्कि आसपास के किसानों को भी मिल रहा है. गांव के किसान अपनी फसल लेकर सीधे उनके पास पहुंच जाते हैं और यहीं तेल निकलवा लेते हैं. इससे किसानों को दूर नहीं जाना पड़ता और परिवहन का खर्च भी बच जाता है.
लगा दिए तेल निकालने वाली मशीन
रघुवीर बताते हैं कि उनकी मशीन से तेल निकलवाने के लिए आसपास के कई गांवों के किसान आते हैं. एक किलो तेल निकालने पर उन्हें करीब 150 रुपये की प्रोसेसिंग फीस मिलती है. इससे खेती के साथ-साथ उनकी अलग से भी आमदनी हो जाती है. पहले जहां मशीन न होने के कारण उन्हें खुद खर्च उठाना पड़ता था. वहीं अब यही मशीन कमाई का जरिया बन गई है. किसान के मुताबिक मेंथा की फसल कटने और सूखने के बाद तेल निकालने का काम शुरू होता है. उस समय उनकी मशीन लगातार चलती है एक बार सीजन शुरू होने पर करीब एक महीने तक प्लांट संचालित रहता है. साल में दो से तीन बार मेंथा की फसल तैयार हो जाती है इसलिए मशीन का उपयोग भी कई बार होता है. रघुवीर बताते हैं कि उनकी यूनिट से सीजन में करीब 17 से 18 क्विंटल तेल निकल जाता है.
कचरे को खेत में खाद के रूप में करते हैं प्रयोग
इस मशीन का एक और फायदा यह है कि तेल निकालने के बाद बचा हुआ कचरा भी काम आता है. डिस्टिलेशन के बाद जो सूखी पत्तियां और अवशेष बचते हैं उन्हें खेत में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इससे खाद पर होने वाला खर्च कम हो जाता है कुछ लोग इस अवशेष का उपयोग ईंधन के तौर पर भी करते हैं. वहीं कई बार यह अवशेष बेच भी दिया जाता है, जिससे थोड़ी अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. रघुवीर का कहना है कि मेंथा की खेती करने वाले इलाकों में ऐसी मशीन किसानों के काफी काम आ सकती है. इससे फसल को सीधे प्रोसेस किया जा सकता है और किसानों को बार-बार दूसरे स्थानों पर नहीं जाना पड़ता यही कारण है कि आज उनके गांव के ज्यादातर किसान अपनी मेंथा की फसल का तेल निकलवाने के लिए उनकी मशीन का ही इस्तेमाल करते हैं.
ऐसे निकलता है तेल
मेंथा की फसल कटाई के बाद एक-दो दिन हल्की सुखाई जाती है. इसके बाद सुखी हुई मेंथा की फसल को डिस्टिलेशन टैंक में भरा जाता है. मशीन में पानी गर्म करके भाप बनाई जाती है जो मेंथा की पत्तियों के बीच से गुजरती है. भाप के साथ तेल भी निकलकर पाइप के जरिए कंडेंसर तक पहुंचता है. जहां उसे ठंडा किया जाता है इसके बाद तेल और पानी अलग हो जाते हैं और शुद्ध मेंथा तेल इकट्ठा कर लिया जाता है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें
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