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सहारनपुर: सहारनपुर के किसान उड़द की खेती कर रहे हैं. उड़द की खेती में किसानों के सामने अक्सर फल आने के समय उत्पादन प्रभावित होने की समस्या देखी जाती है. उड़द एक दलहनी फसल है, जो 60 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है. लेकिन अक्सर उड़द की फसल में कई समस्याएं देखी जाती हैं. इनमें मुख्य समस्या पत्तियों का गहरा हरा रंग न होना है, जिससे सीधे तौर पर उत्पादन पर असर पड़ता है.

फसल में नाइट्रोजन की सबसे अधिक आवश्यकता

उड़द की फसल में नाइट्रोजन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है. यदि नाइट्रोजन की मात्रा कम हो जाए, तो उत्पादन प्रभावित होता है और यदि अधिक हो जाए, तब भी इसके लक्षण खेत में दिखाई देने लगते हैं. ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे अपने खेत में नाइट्रोजन की मात्रा को संतुलित रखें. यदि इसकी कमी हो, तो किन उपायों से इसे बढ़ाया जा सकता है, इस पर ध्यान देना जरूरी है ताकि उड़द का उत्पादन अच्छा हो और किसानों को बेहतर लाभ मिल सके.

सबसे पहले, जब उड़द की फसल 25 से 30 दिन की हो जाती है, तब किसानों को अपने खेत का नियमित निरीक्षण करना चाहिए. कुछ किसान उड़द की बुवाई से पहले मिट्टी का परीक्षण भी कराते हैं, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा का पता चल जाता है. लेकिन जो किसान मिट्टी परीक्षण नहीं कराते, उनके खेतों में यह समस्या अधिक देखी जाती है. इस पर कृषि विशेषज्ञ लगातार मार्गदर्शन दे रहे हैं.

उड़द में नाइट्रोजन का रखें विशेष ध्यान

कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आई.के. कुशवाहा ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उड़द की फसल के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है, और प्रोटीन का मुख्य स्रोत नाइट्रोजन होता है. इसी कारण पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिर करने वाली गांठें पाई जाती हैं.

उन्होंने बताया कि किसानों को यह जरूर देखना चाहिए कि यदि नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा है, तो फसल में अधिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन यदि गांठें कम या अपर्याप्त हों, तो किसान नैनो डीएपी या एनपीके उर्वरकों का उपयोग कर सकते हैं, जिनमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश होते हैं.

क्या होता है नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का काम

नाइट्रोजन का मुख्य कार्य पौधे में प्रोटीन बनाना है, फास्फोरस जड़ प्रणाली को विकसित करता है, जबकि पोटाश पौधे में संतुलन बनाता है और रोगों से सुरक्षा करता है तथा दानों में चमक लाता है. यदि किसान ने बुवाई से पहले मिट्टी परीक्षण नहीं कराया है और पत्तियों का रंग सही नहीं आ रहा, फूल गिर रहे हैं या दानों की संख्या कम है, तो ऐसे में कैल्शियम, बोरान और जिंक जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का प्रयोग भी उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है.

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