गोविंदपुरी के तुगलकाबाद एक्सटेंशन में देर रात लगी आग ने सिर्फ एक इमारत को नहीं, बल्कि एक परिवार की दुनिया को भी राख कर दिया। एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि कई सदस्य जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। हादसे के बाद शुक्रवार को सफदरजंग अस्पताल और एम्स ट्रॉमा सेंटर के बाहर जो दृश्य था, उसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं।
अस्पताल के गलियारों में खड़े परिजनों के चेहरों पर भय, दर्द और उम्मीद एक साथ दिखाई दे रहे थे। कोई हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना कर रहा था, तो कोई डॉक्टरों से बार-बार यही पूछ रहा था कि अंदर सब ठीक तो है। हर किसी की बस एक ही ख्वाहिश थी-किसी तरह अपने प्रियजनों की एक झलक मिल जाए।
…लेकिन आईसीयू और बर्न वार्ड के बाहर सुरक्षा और प्रोटोकॉल की दीवार खड़ी थी। परिजन बार-बार विनती करते रहे, बस एक बार देखने दीजिए…। मगर उन्हें इंतजार के सिवा कुछ नहीं मिला।
हर बार आईसीयू का दरवाजा खुलता तो वहां मौजूद लोगों की सांसें मानों थम जातीं। इसी बीच पीड़िता गुड्डी के भाई बमबम झा को अंदर बुलाया गया। वह तेज कदमों से आईसीयू में गए, लेकिन कुछ मिनट बाद जब बाहर लौटे तो उनके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दे रहा था। आंखें नम थीं और शब्द जैसे कहीं खो गए थे। वह न कुछ बोल पा रहे थे और न किसी की बात सुन पा रहे थे।
कुछ देर बाद परिवार की एक महिला सदस्य अंदर गईं। बाहर निकलते ही उन्होंने भर्राए गले से कहा, मनी (मोनी) का पूरा चेहरा जल गया है। मैं तो उसे पहचान भी नहीं पा रही थी। उसने हाथ हिलाकर अपने नाम की पर्ची दिखाने की कोशिश की, तब पता चला कि वह मनी है। यह कहते-कहते उनका गला भर आया। जिस चेहरे को देखने के लिए परिवार की आंखें बेचैन थीं, आग ने उसकी पहचान तक छीन ली थी। वह फूट-फूटकर रो पड़ीं और बार-बार यही कहती रहीं, हे भगवान, ऐसा क्यों हुआ?
कॉल रिसीव नहीं होने पर
बमबम झा बताते हैं कि बृहस्पतिवार रात करीब साढ़े आठ बजे मेरी मां सुशीला देवी से रोज की तरह बात हुई थी। तब किसी अनहोनी का अंदेशा नहीं था। सुबह छह बजे मैंने फिर फोन किया, लेकिन किसी ने कॉल नहीं उठाई। परिवार के दूसरे नंबरों पर भी संपर्क नहीं हो सका। घबराहट बढ़ती गई। मैं तुरंत प्रह्लादपुर से तुगलकाबाद एक्सटेंशन पहुंचे। वहां पहुंचे तो सबकुछ बिखर चुका था। रास्ते भर यही उम्मीद थी कि सब सुरक्षित होंगे। लेकिन अस्पताल पहुंचकर पता चला कि परिवार के तीन लोग हमेशा के लिए चले गए, यह कहते-कहते उनकी आंखें फिर भर आईं।
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