Rare Tulsi Varieties in Kanpur University: तुलसी का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में राम या श्याम तुलसी का नाम आता है, लेकिन कानपुर की सीएसजेएम यूनिवर्सिटी (CSJMU) में तुलसी की ऐसी अनोखी और दुर्लभ प्रजातियां तैयार की जा रही हैं, जिनके बारे में आपने पहले कभी नहीं सुना होगा. यहां की औषधीय वाटिका में अजवाइन, लौंग, कपूर और नींबू की खुशबू वाली 9 अद्भुत तुलसियों को न सिर्फ सहेजा जा रहा है, बल्कि टिश्यू कल्चर तकनीक से इनके नए पौधे भी बनाए जा रहे हैं. बहुत जल्द यूनिवर्सिटी इन खास पौधों को आम लोगों के लिए बेहद कम कीमत पर बेचने की तैयारी कर रही है. आइए जानते हैं इन जादुई तुलसियों के फायदे और इनकी खासियत.
हर तुलसी की अपनी अलग खुशबू और पहचान
विश्वविद्यालय की औषधीय वाटिका में मौजूद प्रत्येक तुलसी की अपनी अलग और खास पहचान है. यहां लगी अजवाइन तुलसी की पत्तियों से बिल्कुल अजवाइन जैसी महक आती है, जबकि लौंग तुलसी को छूने या सूंघने पर लौंग जैसी सुगंध महसूस होती है. कपूर तुलसी अपनी तीखी और ताजगी भरी खुशबू के लिए जानी जाती है, तो वहीं नींबू तुलसी की पत्तियों में नींबू जैसी खट्टी-मीठी सुगंध होती है. इन दुर्लभ प्रजातियों को देखने और इनके बारे में जानने के लिए छात्र और यहां आने वाले लोग विशेष रुचि दिखा रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इन तुलसियों का महत्व केवल खुशबू तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और औषधीय उपयोग के लिहाज से भी इनकी एक बड़ी और खास पहचान है. यही वजह है कि इन पौधों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ इनके गुणों पर लगातार अध्ययन भी किया जा रहा है.
शोध का केंद्र बनी विश्वविद्यालय की औषधीय वाटिका
विश्वविद्यालय के फार्मेसी, बायोटेक्नोलॉजी और केमेस्ट्री विभाग के छात्र इन दुर्लभ तुलसी प्रजातियों पर रिसर्च कर रहे हैं. इनके औषधीय गुणों, रासायनिक संरचना और हमारी सेहत के लिए इनकी उपयोगिता को समझने के लिए लगातार अध्ययन किया जा रहा है. विश्वविद्यालय का मानना है कि भविष्य में इन शोधों की मदद से चिकित्सा के क्षेत्र में नई और बड़ी संभावनाएं सामने आ सकती हैं. इस औषधीय वाटिका में तुलसी के अलावा इलायची, पिपरमिंट, काली मिर्च समेत कई अन्य महत्वपूर्ण औषधीय पौधे भी लगाए गए हैं, जिन्हें पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से विकसित किया जा रहा है.
टिश्यू कल्चर से तैयार हो रहे पौधे
विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. सुधीर अवस्थी ने बताया कि इन औषधीय पौधों को तेजी से विकसित करने के लिए लैब में टिश्यू कल्चर तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस आधुनिक तकनीक की मदद से बहुत कम समय में एक साथ अधिक संख्या में पौधे तैयार किए जा सकते हैं, जिससे इन दुर्लभ प्रजातियों को बचाना भी काफी आसान हो जाता है. उन्होंने एक और बड़ी बात बताई कि विश्वविद्यालय की योजना भविष्य में इन पौधों को बहुत कम कीमत पर आम जनता को उपलब्ध कराने की है.
इससे लोगों को अपने घरों में असली औषधीय पौधे लगाने का मौका मिलेगा और साथ ही विश्वविद्यालय को भी आय का एक नया जरिया मिलेगा. औषधीय पौधों के संरक्षण, शोध और आम लोगों को जागरूक करने की दिशा में विश्वविद्यालय की यह पहल अब एक शानदार मॉडल के रूप में सामने आ रही है. अपनी इन अनोखी तुलसी प्रजातियों और आधुनिक तकनीकों के कारण यह औषधीय वाटिका सिर्फ कानपुर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई है.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें
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