क्या है मायावती का ‘DRBO’ प्लान?
बीएसपी प्रमुख मायावती ने हाल के चुनावों में लगातार हार के बाद पार्टी की चुनावी संभावनाओं को फिर से जगाने के मकसद से एक संगठनात्मक और सामाजिक आउटरीच एक्सरसाइज शुरू की हैं. पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों के मुताबिक, मायावती ने बीएसपी कोऑर्डिनेटर को ऐसे असरदार लोकल नेताओं की पहचान करने का आदेश दिया है जो जमीनी स्तर पर पार्टी की मौजूदगी को मज़बूत कर सकें, साथ ही पिछले 10 सालों में संगठन छोड़ने वाले पुराने विधायकों और वरिष्ठ नेताओं से भी संपर्क करें.
मायावती ने ‘DRBO’ प्लान को सफल बनाने के लिए अपने सबसे विश्वसनीय नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है. बीएसपी के वरिष्ठ नेताओं को कम्युनिटी के हिसाब से ऑर्गनाइजेशनल जिम्मेदारियां सौंपी गई है. पार्टी के नेशनल जनरल सेक्रेटरी सतीश चंद्र मिश्रा को 2007 के विधानसभा चुनाव की तरह ब्राह्मणों तक पहुंच बढ़ाने का काम सौंपा गया है. 2022 में बीएसपी से जितने वाले विधायक उमा शंकर सिंह को राजपूतों के साथ जुड़ाव मजबूत करने के लिए कहा गया है. वहीं बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल को ओबीसी में शोषित और कम लाइम लाइट में रहने वाली जातियों और माइनॉरिटी कम्युनिटी के बीच रिश्ते मजबूत करने का काम सौंपा गया है. यानी मायावती का प्लान है कि दलित+राजपूत+ब्राह्मण+ओबीसी (DRBO) का एक नया सोशल इंजीनियरिंग तैयार किया जा सके, जिसमें मुस्लिमों को भी शामिल कराया जाए.
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जानकार मानते हैं कि अगर मायावती का DRBO प्लान 2027 में वर्क कर गया तो एक अलग किस्म की राजनीति देखने को मिल सकती है. मायावती की इस पहल को उस बड़े सोशल गठबंधन के हिस्सों को फिर से जगाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं, जिसने 2007 में उत्तर प्रदेश में बीएसपी को बहुमत वाली सरकार दिलाने में मदद की थी. पिछले चुनाव चक्रों के उलट, पार्टी न सिर्फ़ अपने पारंपरिक दलित सपोर्ट बेस को मज़बूत करने पर ध्यान दे रही है, बल्कि अपर-कास्ट, ओबीसी और माइनॉरिटी वोटरों के बीच अपनी अपील बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही है.
इस काम पर विरोधी पार्टियां भी करीब से नज़र रख रही हैं. बीएसपी की ऑर्गनाइज़ेशनल ताकत में कोई भी सुधार कई चुनाव क्षेत्रों में चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है, खासकर उन इलाकों में जहां जीत का अंतर कम रहा है. बीएसपी की मज़बूत मौजूदगी उन सोशल ग्रुप्स के वोट शेयर पर असर डाल सकती है, जो हाल के सालों में बीजेपी या सपा की तरफ झुके हैं.
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ने वाले कई बड़े बीएसपी नेताओं को बाद में कहीं और राजनीतिक सफलता मिली. उनमें लालजी वर्मा और राम अचल राजभर शामिल थे, जिन्होंने बाद में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीते. गुड्डू जमाली और इमरान मसूद समेत बीएसपी के दूसरे पुराने नेता भी ऑर्गनाइज़ेशनल और चुनावी बदलावों के बीच अलग-अलग पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म पर चले गए. बीएसपी की नई पहुंच से चुनावी नतीजों में कोई बड़ी वापसी होगी या नहीं, यह अभी पक्का नहीं है. हालांकि, 2027 के चुनाव के लिए राजनीतिक लामबंदी धीरे-धीरे जोर पकड़ रही है, मायावती बीएसपी को एक गंभीर दावेदार के तौर पर फिर से खड़ा करने के लिए पक्का इरादा रखती दिख रही हैं. इसके लिए उन्होंने इसके संगठनात्मक ढांचे को फिर से बनाया है, इसकी सामाजिक पहुंच को बढ़ाया है और उन नेताओं से फिर से जुड़ा है जो कभी पूरे उत्तर प्रदेश में पार्टी के नेटवर्क की रीढ़ रहे हैं.
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