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लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) सबसे ज्यादा ऐक्टिव नजर आ रही है. 2014 से लगातार चुनाव हार रही बीएसपी 2027 यूपी चुनाव को करो या मरो के रूप में लेती दिख रही है. पार्टी प्रमुख मायावती खुद से संगठन में जान फूंकने की कोशिश करती दिख रही हैं. आमतौर पर विरोधियों को सीधे निशाने पर लेने वालीं मायावती इस बार बीएसपी की बैठकों के बाद संयमित दिख रही हैं. अब मायावती ने मिशन 2027 को ध्यान में रखकर प्लान ‘DRBO’ लॉन्च की हैं. इतना ही नहीं, मायावती ने अपने ‘DRBO प्लान’ पर काम भी शुरू करने का आदेश दे चुकी हैं. माना जा रहा है कि अगर मायावती का यह प्लान काम कर गया तो यह अखिलेश यादव के पीडीए और सीएम योगी आदित्यनाथ के 80/20 की सारी प्लानिंग को डैमेज कर सकती है.

क्या है मायावती का ‘DRBO’ प्लान?

बीएसपी प्रमुख मायावती ने हाल के चुनावों में लगातार हार के बाद पार्टी की चुनावी संभावनाओं को फिर से जगाने के मकसद से एक संगठनात्मक और सामाजिक आउटरीच एक्सरसाइज शुरू की हैं. पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों के मुताबिक, मायावती ने बीएसपी कोऑर्डिनेटर को ऐसे असरदार लोकल नेताओं की पहचान करने का आदेश दिया है जो जमीनी स्तर पर पार्टी की मौजूदगी को मज़बूत कर सकें, साथ ही पिछले 10 सालों में संगठन छोड़ने वाले पुराने विधायकों और वरिष्ठ नेताओं से भी संपर्क करें.

मायावती की यह रणनीति ऐसे समय में आई है जब उत्तर प्रदेश का राजनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा है. समाजवादी पार्टी की तरफ से जहां कुछ जातियों को 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह एकजुट रखने का प्रयास हो रहा है तो बीजेपी एक बार फिर से जातीय समीकरण के साथ चुनाव को हिंदू बनाम मुस्लिम के समीकरण में अभी से मोड़ने के प्रयास में जुट गई है, जिसकी बानगी हाल ही में संपन्न हुए बकरीद त्योहार में दिख चुका है.

मायावती ने ‘DRBO’ प्लान को सफल बनाने के लिए अपने सबसे विश्वसनीय नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है. बीएसपी के वरिष्ठ नेताओं को कम्युनिटी के हिसाब से ऑर्गनाइजेशनल जिम्मेदारियां सौंपी गई है. पार्टी के नेशनल जनरल सेक्रेटरी सतीश चंद्र मिश्रा को 2007 के विधानसभा चुनाव की तरह ब्राह्मणों तक पहुंच बढ़ाने का काम सौंपा गया है. 2022 में बीएसपी से जितने वाले विधायक उमा शंकर सिंह को राजपूतों के साथ जुड़ाव मजबूत करने के लिए कहा गया है. वहीं बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल को ओबीसी में शोषित और कम लाइम लाइट में रहने वाली जातियों और माइनॉरिटी कम्युनिटी के बीच रिश्ते मजबूत करने का काम सौंपा गया है. यानी मायावती का प्लान है कि दलित+राजपूत+ब्राह्मण+ओबीसी (DRBO) का एक नया सोशल इंजीनियरिंग तैयार किया जा सके, जिसमें मुस्लिमों को भी शामिल कराया जाए.

यूपी चुनाव 2027 को लेकर क्या है बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग?

उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य बीजेपी के हालिया फैसलों पर नजर डालें तो इनकी अलग सोशल इंजीनियरिंग समझ में आती है. बीजेपी एक तरफ जहां जातियों को एकजुट कर रही है तो दूसरी तरफ हिंदू/मुस्लिम का भी कार्ड खेल रही है. बीजेपी के जातीय समीकरण में दलितों में गैर जाटल, ओबीसी में गैर यादव और तमाम ऊंची जातियों को अपने साथ जोड़े रखने की रणनीति पर काम होता दिख रहा है. दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार के कुछ फैसलों और अपने भाषणों के जरिए 80/20 वाले दांव को फिर से हवा देते दिख रहे हैं. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी अपने कार्यकर्ताओं को आदेश दिया है कि वे जमीन उतरें और लोगों को जातियों के बंधन ऊपर ऊठकर देश और राज्य के बारे में सोचने की राह दिखाएं.

यूपी चुनाव 2027 को लेकर अखिलेश यादव की रणनीति क्या है?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह अपने पीडीए फॉर्मूले को 2027 में भी बरकरार रखने और सफल बनाने के प्रयास में दिख रहे हैं. अखिलेश यादव के पीडीए में पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक/आधी आबादी है. लोकसभा चुनाव में बीएसपी की ओर से मजबूती नहीं दिखाए जाने के चलते दलितों का बड़ा वोटबैंक लंबे समय पर यूपी में अखिलेश यादव और उनकी पार्टी पर भरोसा दिखाते नजर आया था. इसके अलावा अपने ऊपर से यादववादी होने का धब्बा मिटाने के लिए ओबीसी जातियों के नेताओं को इस तरह से टिकट बांटे थे कि उन्हें गैर यादव ओबीसी जातियों का भी भरपूर समर्थन मिला था. वहीं लंबे समय बाद मुस्लिम वोटरों ने बिना भटके पूरे यूपी में एकजुट होकर सपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों पर भरोसा किया था. अब अखिलेश यादव केवल इसी प्रयास में हैं कि अगर 2024 की तरह पीडीए फॉर्मूला 2027 में भी चल गया तो उन्हें सत्ता तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता है.

अखिलेश और योगी के प्लान को डैमेज कर सकता है मायावती का प्लान

जानकार मानते हैं कि अगर मायावती का DRBO प्लान 2027 में वर्क कर गया तो एक अलग किस्म की राजनीति देखने को मिल सकती है. मायावती की इस पहल को उस बड़े सोशल गठबंधन के हिस्सों को फिर से जगाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं, जिसने 2007 में उत्तर प्रदेश में बीएसपी को बहुमत वाली सरकार दिलाने में मदद की थी. पिछले चुनाव चक्रों के उलट, पार्टी न सिर्फ़ अपने पारंपरिक दलित सपोर्ट बेस को मज़बूत करने पर ध्यान दे रही है, बल्कि अपर-कास्ट, ओबीसी और माइनॉरिटी वोटरों के बीच अपनी अपील बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही है.

इस काम पर विरोधी पार्टियां भी करीब से नज़र रख रही हैं. बीएसपी की ऑर्गनाइज़ेशनल ताकत में कोई भी सुधार कई चुनाव क्षेत्रों में चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकता है, खासकर उन इलाकों में जहां जीत का अंतर कम रहा है. बीएसपी की मज़बूत मौजूदगी उन सोशल ग्रुप्स के वोट शेयर पर असर डाल सकती है, जो हाल के सालों में बीजेपी या सपा की तरफ झुके हैं.

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ने वाले कई बड़े बीएसपी नेताओं को बाद में कहीं और राजनीतिक सफलता मिली. उनमें लालजी वर्मा और राम अचल राजभर शामिल थे, जिन्होंने बाद में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीते. गुड्डू जमाली और इमरान मसूद समेत बीएसपी के दूसरे पुराने नेता भी ऑर्गनाइज़ेशनल और चुनावी बदलावों के बीच अलग-अलग पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म पर चले गए. बीएसपी की नई पहुंच से चुनावी नतीजों में कोई बड़ी वापसी होगी या नहीं, यह अभी पक्का नहीं है. हालांकि, 2027 के चुनाव के लिए राजनीतिक लामबंदी धीरे-धीरे जोर पकड़ रही है, मायावती बीएसपी को एक गंभीर दावेदार के तौर पर फिर से खड़ा करने के लिए पक्का इरादा रखती दिख रही हैं. इसके लिए उन्होंने इसके संगठनात्मक ढांचे को फिर से बनाया है, इसकी सामाजिक पहुंच को बढ़ाया है और उन नेताओं से फिर से जुड़ा है जो कभी पूरे उत्तर प्रदेश में पार्टी के नेटवर्क की रीढ़ रहे हैं.

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