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Gujarat News: भारत में सदियों से कई धर्मों के लोग रहते आए हैं. कई रीति-रिवाज तो एक-दूसरे से इतने मिलते जुलते हैं कि उनमें फर्क करना कठिन हो जाता है. बहुधर्मी देश होने के नाते धार्मिक सहिष्‍णुता यहां की संस्‍कृति में रचा-बसा हुआ है. गुजरात के नवसारी से हिन्दुत्‍व और धर्मिक सहिष्‍णुता से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है.

पारसी महिला, मुस्लिम से शादी और हिन्‍दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्‍कारZoom

गुजरात के नवसारी में एक पारसी महिला का हिन्‍दु रीति-रिवाज से अंतिम संस्‍कार करने का मामला सामने आया है. (सांकेतिक तस्‍वीर)

Gujarat News: गुजरात के नवसारी जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने धार्मिक पहचान, अंतरधार्मिक विवाह और सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. एक 55 साल पारसी महिला, जिसने जीवन भर जरथुस्त्र धर्म (पारसी धर्म) का पालन किया, मृत्यु के बाद अपने ही समुदाय की अंतिम संस्कार परंपराओं से वंचित रह गई. इतना ही नहीं, मुस्लिम पति होने के बावजूद उसे मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाने की भी अनुमति नहीं मिली. आखिरकार परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से महिला का हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया.

जानकारी के अनुसार, महिला का विवाह एक मुस्लिम व्यक्ति से हुआ था, जो गुजराती साहित्य के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं. मूल रूप से जूनागढ़ के रहने वाले प्रोफेसर पिछले करीब 35 साल पहले नवसारी में ही बस गए थे. दोनों की मुलाकात एक स्थानीय कॉलेज में हुई थी, जहां प्रोफेसर पढ़ाते थे और महिला गुजराती भाषा में स्नातक की पढ़ाई कर रही थीं. समय के साथ दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और उन्होंने विवाह करने का फैसला किया.

मुस्लिम से शादी करने पर अलग-थलग

‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, परिवार के करीबी सूत्रों ने बताया कि जब महिला ने अपने माता-पिता को विवाह के निर्णय की जानकारी दी तो उन्होंने शुरुआत में इसका विरोध किया. उन्हें आशंका थी कि अंतरधार्मिक विवाह के कारण परिवार को पारसी समुदाय से बहिष्कृत किया जा सकता है. हालांकि, बेटी की जिद के आगे परिवार को आखिरकार झुकना पड़ा और दोनों ने शादी कर ली. विवाह के बाद महिला नवसारी में अपने पति के साथ रहने लगीं, लेकिन उन्हें पारसी समुदाय की सामाजिक गतिविधियों और आयोजनों से दूर रखा गया. यहां तक कि उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादी में शामिल होने की भी अनुमति नहीं मिली थी. हालांकि समय बीतने के साथ उनके माता-पिता ने उनसे फिर संपर्क स्थापित कर लिया था.

इस्‍लाम धर्म स्‍वीकार नहीं किया

परिजनों का कहना है कि विवाह के बावजूद महिला ने कभी इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया और जीवन भर पारसी धार्मिक परंपराओं का पालन करती रहीं. दंपति की कोई संतान नहीं है. बीते सोमवार को महिला की तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें नवसारी के एक पारसी अस्पताल में भर्ती कराया गया. इलाज के दौरान गुरुवार को उनका निधन हो गया. इसके बाद उनके पति ने पारसी समुदाय के लोगों से संपर्क कर अनुरोध किया कि चूंकि उनकी पत्नी ने जीवनभर पारसी धर्म का पालन किया, इसलिए उनका अंतिम संस्कार पारसी रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाए. लेकिन समुदाय के प्रतिनिधियों ने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया.

मुसलमानों ने भी नहीं दी इजाजत

महिला के एक रिश्तेदार ने बताया कि उन्होंने भी समुदाय के नेताओं से गुहार लगाई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला. शव अस्पताल के शवगृह में रखा रहा. इसके बाद पति ने मुस्लिम कब्रिस्तान के प्रबंधकों से संपर्क किया और इस्लामी परंपरा के अनुसार दफनाने की अनुमति मांगी, लेकिन वहां से भी इनकार कर दिया गया. लगातार दो दिनों तक शव अस्पताल के शवगृह में पड़ा रहा, जिससे परिवार गहरे संकट में आ गया. महिला के माता-पिता का पहले ही निधन हो चुका था. उनके भाई और बहन को भी इस घटना की सूचना दी गई और वे नवसारी पहुंचे. जब किसी भी समुदाय की ओर से अंतिम संस्कार की व्यवस्था नहीं हो सकी, तब महिला के एक रिश्तेदार ने अपने मित्र और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के स्थानीय नेता सज्जन भरवाड़ से मदद मांगी.

हिन्‍दू दोस्‍त आया सामने

सज्‍जन भरवाड़ ने मानवीय आधार पर सहायता का प्रस्ताव रखा. परिवार की सहमति मिलने के बाद उन्होंने नवसारी के वेरावल क्षेत्र स्थित श्मशान गृह के एक ट्रस्टी से संपर्क किया, जिन्होंने अंतिम संस्कार की अनुमति दे दी. शुक्रवार को महिला के शव को श्मशान गृह ले जाया गया, जहां उनके कुछ करीबी रिश्तेदारों और पति के परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार दाह संस्कार किया गया. बाद में श्मशान गृह प्रशासन ने अस्थियां उनके पति को सौंप दीं.

धर्म नहीं, मानवता का सवाल

वीएचपी नेता सज्जन भरवाड़ ने कहा कि यह किसी धर्म का नहीं, बल्कि मानवता का प्रश्न था. उनके अनुसार, जब दोनों समुदायों से अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने मानवीय कर्तव्य समझते हुए परिवार की मदद की. इस घटना ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाले लोगों की सामाजिक स्वीकार्यता और मृत्यु के बाद धार्मिक पहचान से जुड़े जटिल सवालों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

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Manish Kumar

बिहार, उत्‍तर प्रदेश और दिल्‍ली से प्रारंभिक के साथ उच्‍च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्‍लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें

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