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मथुरा: क्या मथुरा में अब अदालत के आदेशों से भी ऊपर कुछ लोग हो गए हैं, क्या किसी कॉलोनाइजर को फायदा पहुंचाने के लिए आम आदमी की जमीन, दुकान और वर्षों की मेहनत एक रात में मिटाई जा सकती है. सबसे बड़ा सवाल, अगर मामला कोर्ट में विचाराधीन हो, तो फिर आधी रात को ऐसी कौन सी आफत आ गई थी कि कार्रवाई करना जरूरी हो गया?

गोवर्धन के कस्वा सौंख से सामने आया मामला अब सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली पर बड़ा सवाल बन चुका है. गोवर्धन तहसील के कस्वा सौंख से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पीड़ित का आरोप है कि उसकी जमीन के पीछे कॉलोनी विकसित की जा रही है. कॉलोनाइजर को सीधा लाभ पहुंचाने के लिए उसकी जमीन से जबरन रास्ता निकालने की कोशिश की गई, जबकि जमीन हमारी है और सालों से जमीन पर हमारा कब्जा है.

कोर्ट में मामला विचाराधीन, फिर भी तोड़-फोड़
इतना ही नहीं, पीड़ित का दावा है कि उसकी दुकान और बाउंड्रीवाल तक तोड़ दी गई. पीड़ित का कहना है कि जिस भूमि को लेकर पूरा विवाद है, वह मामला सिविल कोर्ट में विचाराधीन है. यानी जमीन का मालिकाना हक और विवाद अभी न्यायालय के समक्ष है. आरोप है कि इसके बावजूद राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन ने रात के अंधेरे में कार्रवाई कर दी. अब सवाल यह उठता है कि अगर मामला कोर्ट में था, तो फिर इतनी जल्दबाजी क्यों? क्या न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार नहीं किया जा सकता था और अगर प्रशासन के पास कार्रवाई का अधिकार था, तो दिन के उजाले में कार्रवाई करने की बजाय रात का अंधेरा क्यों चुना गया.

सवाल सिर्फ एक दुकान का या एक बाउंड्रीवाल का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि क्या अब आम आदमी की जमीन सुरक्षित है? अगर कोई व्यक्ति अदालत में न्याय मांग रहा हो, अगर वह अधिकारियों को लिखित शिकायत दे चुका हो, अगर वह लगातार गुहार लगा रहा हो, तो क्या उसकी बात सुने बिना उसकी संपत्ति पर कार्रवाई की जा सकती है?

न्याय नहीं मिला तो करेंगे आत्महत्या
लोकल 18 से बात करते हुए पीड़ित जितेंद्र सिंह और रवि कुमार का कहना है कि उसने पहले ही एसडीएम गोवर्धन को प्रार्थना पत्र देकर बताया था कि मामला न्यायालय में लंबित है. उसने प्रशासन से कार्रवाई रोकने और निष्पक्ष जांच की मांग भी की थी. लेकिन आरोप है कि उसकी बात सुनने की बजाय उसकी दुकान और बाउंड्रीवाल ही तोड़ दी गई.

जब हमारी टीम ने इस पूरे मामले में एसडीएम गोवर्धन से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया. अब सवाल यह है कि अगर कार्रवाई पूरी तरह नियमों के अनुसार हुई थी, तो फिर प्रशासन अपना पक्ष रखने से क्यों बच रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कस्वा सौंख में कानून का राज चला या प्रभावशाली लोगों का. क्या प्रशासन किसी दबाव में था, या फिर वाकई कॉलोनाइजरों को फायदा पहुंचाने के लिए यह सब किया गया.

सालों की मेहनत एक रात में बर्बाद
पीड़िता कृष्णा का कहना है कि प्रशासन ने अगर हमारी नहीं सुनी, तो हम आत्महत्या करने के लिए बाध्य होंगे. इसकी जिम्मेदारी कॉलोनाइजर और जिला प्रशासन की होगी. इन सवालों का जवाब अब जिला प्रशासन को देना होगा. एक तरफ सरकार कहती है कि गरीब, किसान और आम नागरिक को न्याय मिलेगा, तो दूसरी तरफ एक व्यक्ति दावा कर रहा है कि उसकी वर्षों की मेहनत, उसकी दुकान, उसकी बाउंड्री और उसकी उम्मीदें एक रात में मलबे में बदल दी गईं.

न्याय के लिए पीड़ितों ने लगाई गुहार
लोकतंत्र में अदालत अंतिम उम्मीद होती है और प्रशासन निष्पक्षता का प्रतीक. लेकिन जब किसी न्यायालय में लंबित विवाद के बीच ऐसी घटनाओं के आरोप सामने आते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है. अब निगाहें जिलाधिकारी कार्यालय पर हैं कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर कस्वा सौंख का यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा. एसडीएम गोवर्धन से जो पूरे मामले की जानकारी की गई, तो उन्होंने बताया कि हमें आपको कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है. इतना कहने के बाद एसडीएम गोवर्धन ने फोन काट दिया.

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