कुणाल घोष ने मीडिया से बात करते हुए एक बेहद चौंकाने वाली संगठनात्मक जानकारी साझा की. उन्होंने बताया, ‘हमारे पास जो ताजा जानकारी है, उसके मुताबिक लोकसभा और राज्यसभा सांसदों वाली संसदीय पार्टी को छोड़कर तृणमूल कांग्रेस की अन्य सभी समितियों और कमेटियों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है.’ पार्टी के इस बड़े फैसले को बागियों पर नकेल कसने और संगठन पर ममता बनर्जी का नियंत्रण बनाए रखने की आखिरी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
दो चिट्ठियां और कॉमन सिग्नेचर, एक ही विधायक दोनों तरफ!
बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के पद और असली टीएमसी की दावेदारी को लेकर कानूनी संकट तब गहरा गया जब विधानसभा अध्यक्ष के दफ्तर में दो अलग-अलग दस्तावेज जमा किए गए. कुणाल घोष ने इस विडंबना को उजागर करते हुए कहा कि कानूनी पेंच बहुत फंसा हुआ है. आखिरकार विधानसभा अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष के तौर पर रीताव्रता बनर्जी को मान्यता दे दी.
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल टीएमसी ने अपने विधायकों की सूची सौंपी है, तो वहीं बागी धड़े ने खुद को ‘असली तृणमूल’ बताते हुए अपनी अलग सूची और नेता प्रतिपक्ष के नाम का प्रस्ताव दिया है. कुणाल घोष के मुताबिक, ऐसे कई विधायक हैं जिनके हस्ताक्षर ममता बनर्जी कैंप की चिट्ठी पर भी हैं और बागियों के दस्तावेज पर भी मौजूद हैं. यानी एक ही विधायक ने दोनों तरफ दस्तखत कर रखे हैं.
जब कुणाल घोष से पूछा गया कि क्या पार्टी से निकाले गए या बागी नेता प्रतिपक्ष के रूप में काम कर सकते हैं, तो उन्होंने साफ कहा, ‘यह कानूनी रूप से बिल्कुल संभव नहीं है. इन संसदीय और कानूनी बारीकियों की जांच की जाएगी. लेकिन एक बात साफ है कि जो लोग आज विद्रोह कर रहे हैं, वे निर्दलीय उम्मीदवार नहीं थे. वे ममता बनर्जी के चेहरे और पार्टी के सिंबल पर चुनाव जीतकर आए हैं. पार्टी का फैसला ही सर्वोच्च होगा.”
सुवेंदु अधिकारी का ‘महाराष्ट्र मॉडल’ या कुणाल घोष के दावों में दम?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में जो कुछ भी हो रहा है, वह सुवेंदु अधिकारी की सोची-समझी रणनीतिक बिसात का हिस्सा है. महाराष्ट्र में जिस तरह एकनाथ शिंदे ने मूल पार्टी के चुनाव चिह्न तीर-कमान और नाम पर दावा ठोक दिया था, ठीक उसी राह पर टीएमसी का बागी धड़ा भी बढ़ता दिख रहा है. बागी विधायकों का तर्क है कि उनके पास दो-तिहाई से अधिक बहुमत है, इसलिए दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) उन पर लागू नहीं होता और वे ही असली तृणमूल हैं.
सुवेंदु अधिकारी ने टीएमसी की दुखती रग पर हाथ रखा है. वे जानते हैं कि अगर बागी विधायक सीधे भाजपा में शामिल होते हैं, तो उन्हें उपचुनाव का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए, उन्हें तकनीकी रूप से टीएमसी के भीतर ही रखकर एक अलग धड़ा बनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है ताकि ममता बनर्जी कानूनी पचड़ों में उलझकर कमजोर हो जाएं.
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