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दिल्ली भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड ने राजधानी के करीब एक लाख पंजीकृत निर्माण श्रमिकों को भीषण गर्मी से राहत देने के लिए समर किट वितरित करने की योजना बनाई है। इसके लिए 26 मई को प्रोजेक्ट प्रस्ताव आमंत्रित किए गए हैं और जून महीने के भीतर एक लाख किट बांटने का लक्ष्य रखा गया है। 

योजना का उद्देश्य श्रमिकों को लू और डिहाइड्रेशन जैसे जोखिमों से बचाना है, लेकिन इसकी टाइमिंग और जल्दबाजी में अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। दिल्ली में अप्रैल और मई के दौरान गर्मी और लू का प्रकोप चरम पर रहा, जबकि बोर्ड ने इस योजना की शुरुआत मई के अंतिम सप्ताह में की। टेंडर जमा करने की अंतिम तिथि 1 जून निर्धारित की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब गर्मी का सबसे कठिन दौर लगभग गुजर चुका है, तब जून में किट वितरण की कवायद कितनी प्रभावी साबित होगी। आलोचकों का कहना है कि यदि श्रमिकों की सुरक्षा प्राथमिकता होती तो इसकी तैयारी मार्च या अप्रैल में ही शुरू कर दी जाती।

अब इतनी जल्दबाजी किसलिए

करीब 19 करोड़ रुपये की इस परियोजना में प्रति किट लागत 1,890 रुपये तय की गई है। बोर्ड ने एजेंसियों को आवेदन करने के लिए मात्र छह दिन का समय दिया है। इतने कम समय में किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई (पीएसयू) के लिए सामान की खरीद, भंडारण, परिवहन और वितरण की विस्तृत योजना तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। कम समय में पूरी प्रक्रिया पूरी करने की शर्तों ने परियोजना की पारदर्शिता और तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बोर्ड के अनुसार चयनित एजेंसी को वितरण के प्रत्येक चरण की रिपोर्ट देनी होगी और भुगतान भी वितरण के प्रमाण के आधार पर किस्तों में किया जाएगा। 

ये दिया जाना है…

समर किट में एक किलो सत्तू, ग्लूकोज, ओआरएस, पानी की बोतल, टोपी, गमछा सहित कुल नौ आवश्यक वस्तुएं शामिल की गई हैं।

करोड़ों के बजट की हो सकती है बंदरबांट

परियोजना में सार्वजनिक धन की बड़ी राशि खर्च होनी है। हालांकि बोर्ड ने केवल पीएसयू को ही भागीदारी की अनुमति दी है, लेकिन खरीद और वितरण की निगरानी की जिम्मेदारी विभाग के पास रहेगी। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा। सवाल यह भी है कि गर्मी के चरम समय के बीत जाने के बाद अचानक मिशन मोड में शुरू की गई यह योजना कहीं बजट खर्च करने की औपचारिकता बनकर न रह जाए।

श्रमिकों को राहत फोटो खिंचवाने का जरिया

बोर्ड ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसके पास निर्माण स्थलों पर कार्यरत श्रमिकों का कोई रियल-टाइम डेटा उपलब्ध नहीं है। लाभार्थियों का अनुमान पुराने रिकॉर्ड के आधार पर लगाया गया है। ऐसे में एक महीने के भीतर एक लाख श्रमिकों की पहचान करना, उन्हें किट उपलब्ध कराना और प्रत्येक वितरण की जियो-टैग्ड फोटो तथा पावती जुटाना बड़ी चुनौती होगी। आशंका है कि समय के दबाव में वास्तविक जरूरतमंद श्रमिकों तक लाभ नहीं पहुंच पाएगा और वितरण केवल कागजों तक सीमित रह सकता है।

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