मुख्यमंत्री, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर से लेकर प्रधानमंत्री तक की कुर्सी तक यहां से जुड़े लोगों ने संभाली. आजादी से पहले भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महान क्रांतिकारियों के आगमन ने सुल्तानपुर को विशेष गौरव प्रदान किया. धर्म से लेकर राजनीति तक, सुल्तानपुर का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है.
इन्होंने बसाया सुल्तानपुर
मान्यता है कि इस जिले की स्थापना भगवान श्रीराम के ज्येष्ठ पुत्र कुश ने की थी. उन्होंने इसे भौगोलिक रूप से सुरक्षित स्थान पर मां गोमती के तट पर बसाया. 13वीं शताब्दी के अंत तक यह क्षेत्र कुशपुर, कुशावती या कुशभवनपुर के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1869 से पहले सुल्तानपुर में कुल 12 परगने हुआ करते थे. अंग्रेजों के सत्ता संभालने के बाद सुल्तानपुर और आसपास के जनपदों की सीमाओं का पुनर्गठन किया गया. इसके तहत इसौली, बरौसा और अल्देमऊ परगने फैजाबाद से अलग होकर सुल्तानपुर में शामिल किए गए, जबकि इन्हौना, जायस, सिमरौता, मोहनलालगंज और सुबेहा यहां से अलग होकर अन्य सीमावर्ती जिलों में समाहित हो गए.
यहां से निकली कई हस्तियां
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार यदि सुल्तानपुर के इतिहास में झांका जाए तो यह स्पष्ट होता है कि इस जिले ने अनेक ऐसी हस्तियां दी हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा और योग्यता के बल पर न केवल सुल्तानपुर, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया. इनमें जनरल बख्त खां का नाम प्रमुख है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान दिया. उनके वंशज आज भी सुल्तानपुर के ग्राम बजेठी में रहते है. इसी तरह बाबू गणपत सहाय ने अपनी मेधावी प्रतिभा के बल पर सुल्तानपुर को शिक्षा के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ाया.
उनका संपर्क पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, पुरुषोत्तम दास टंडन, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं से रहा. अंग्रेजी शासनकाल में देश के वाइस एडमिरल रहे वंशराज सिंह, वर्ष 1971 में केंद्रीय मंत्री बने बाबू केदारनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पंडित श्रीपति मिश्र, कृषि वैज्ञानिक डॉ. मनोदत्त पाठक, तथा जिला विभाजन से पहले संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और विभाजन के बाद मेनका गांधी का सुल्तानपुर से गहरा संबंध रहा है. गांधी परिवार के कई सदस्य यहां से सांसद के रूप में चुने गए.
यह है प्राचीन इतिहास
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि सुल्तानपुर प्राचीन काल से ही अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि यहां रामायण काल और बौद्ध काल से जुड़े अनेक साक्ष्य मिलते हैं. प्राचीन इतिहास में सुल्तानपुर का विशेष स्थान रहा है. कादीपुर स्थित विजेथुआ महावीरन धाम, लंभुआ स्थित धोपाप धाम और शहर का सीताकुंड रामायण काल से जुड़े माने जाते हैं.
यह जिला प्राचीन कोशल राज्य का हिस्सा था. इस धरा ने उन्नति-अवनति और उत्थान-पतन के अनेक दौर देखे, लेकिन सुल्तानपुर हर परिवर्तन के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ता रहा. सुल्तानपुर के प्रसिद्ध विद्वान और लेखक बाबू राजेश्वर सिंह की पुस्तक “सुल्तानपुर इतिहास की झलक” के अनुसार, सुल्तानपुर का प्राचीन नाम कुशपुर, कुशावती या कुशभवनपुर था. इन नामों की प्राचीनता का उल्लेख लाला सीताराम की पुस्तक “अयोध्या का इतिहास” में भी प्रमाण सहित मिलता है.
डॉ. प्रभात श्रीवास्तव के अनुसार, चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत में इस स्थल को कियाशोपोलो नाम से वर्णित किया है, जो चीनी भाषा में लिखित केसपुत्त या केसिपुत्त से मेल खाता है. डॉ. के.सी. श्रीवास्तव की पुस्तक “प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति” में उल्लेख है कि बौद्ध काल के गणराज्यों में दशम् गणतंत्र, कालामों का केसिपुत्त, कोशल राज्य के अधीन इसी क्षेत्र में स्थित था. उनके अनुसार, सुल्तानपुर में कुड़वार से लेकर पलिया तक इस क्षेत्र का विस्तार था.
वैदिक साहित्य के अनुसार, कालामों का संबंध पांचाल के केशियों से था. यहां के आलार कलाम उरबेला के समीप निवास करते थे, जहां बुद्ध ने गृहत्याग के बाद अपना प्रथम उपदेश ग्रहण किया था. आज भी कुड़वार के पश्चिम में कुछ दूरी पर गोमती नदी के किनारे स्थित बेला गांव बसा है, जहां रघुवंशी क्षत्रियों सहित अन्य जातियों के लोग रहते हैं. जिस स्थान को पहले केशिपुत्र कहा जाता था, उसे आज गढ़ा के नाम से जाना जाता है, जो अब भग्नावशेष में बदल चुका है.
कैसी है भौगोलिक स्थिति
वर्तमान सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी उत्तर-पश्चिम दिशा से प्रवेश कर पूरे भूभाग को दो हिस्सों में बांटती है और पूर्व-दक्षिण दिशा की ओर बहते हुए जिले से बाहर निकल जाती है. यह जिला 25.59 डिग्री से 26.40 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 81.32 डिग्री से 82.41 डिग्री पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है. इसकी पूर्वी सीमा जौनपुर और आजमगढ़ से, पश्चिमी सीमा अमेठी और बाराबंकी से मिलती है. उत्तर में फैजाबाद और अंबेडकर नगर, जबकि दक्षिण में प्रतापगढ़ जिला स्थित है. सुल्तानपुर ऐतिहासिक घटनाओं, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों का साक्षी रहा है. प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सुल्तानपुर मुख्यालय की दूरी 138 किलोमीटर है, जबकि अयोध्या से यह 61 किलोमीटर दूर स्थित है.
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