हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने पर्दे पर अपार सफलता हासिल की, लेकिन निजी जिंदगी में आर्थिक संघर्षों का सामना किया. ऐसे ही कलाकारों में उस एक्टर का भी नाम है, जिन्होंने चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में 500 से ज्यादा फिल्मों में काम किया. पर्दे पर वे कभी जज बने, कभी राजा और कभी प्रभावशाली पिता के किरदार में नजर आए, लेकिन वास्तविक जीवन में उनका अंतिम समय आर्थिक तंगी और सादगी के बीच गुजरा.
नई दिल्ली. सिनेमा की दुनिया में वह चेहरा न्याय, रुतबे और अधिकार का प्रतीक माना जाता था. अदालत का सीन हो और जज की कुर्सी पर वही शख्स न दिखे, ऐसा कम ही होता था. पर्दे पर उसने सैकड़ों बार फैसले सुनाए, राजाओं और प्रभावशाली किरदारों को जीवंत किया. लेकिन किस्मत ने उसकी अपनी जिंदगी के साथ कुछ और ही फैसला लिख रखा था. एक नवाब के फरमान ने उसे अपना शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया और फिर शुरू हुआ संघर्षों का लंबा सफर. फिल्मों में पहचान, शोहरत और कामयाबी मिलने के बावजूद आर्थिक सुरक्षा उससे कोसों दूर रही. जिस कलाकार को करोड़ों दर्शक जानते थे, उसके परिवार को अभावों में दिन गुजारने पड़े. यहां तक कि घर में बिजली जैसी बुनियादी सुविधा भी नहीं थी. 500 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले इस एक्टर की कहानी बताती है कि पर्दे की चमक हमेशा असल जिंदगी की हकीकत नहीं होती, चलिए बताते हैं कि वो एक्टर कौन हैं?
चकाचौंध से भरी बॉलीवुड की दुनिया में जितने किस्से कामयाबी के मशहूर हैं, उतने ही दर्दनाक किस्से इसके स्याह पहलू के भी हैं. पर्दे पर राजा-महाराजा और जज की आलीशान भूमिकाएं निभाने वाले कलाकारों का असल जीवन कभी-कभी इस कदर तंगहाली में बीतता है, जिसकी कल्पना भी आम इंसान नहीं कर सकता. 1950 और 60 के दशक के मशहूर करेक्टर एक्टर मुराद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.
500 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले इस दिग्गज कलाकार का अंतिम समय घोर गरीबी में बीता. उनके बेटे और बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर रजा मुराद ने एक भावुक इंटरव्यू में अपने पिता के जीवन से जुड़े कई चौंकाने वाले और दर्दनाक खुलासे किए थे.
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एक्टर मुराद का शुरुआती जीवन भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था. वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रामपुर के रहने वाले थे. साल 1938 में रामपुर के नवाब रजा अली खान के साथ हुए एक विवाद के बाद मुराद को महज 24 घंटे के भीतर अपना गृहनगर छोड़ने का हुक्म सुना दिया गया. इस मजबूरी के कारण वे मुंबई आ गए. मुराद असल में एक लेखक बनना चाहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और वे एक्टिंग की दुनिया में आ गए.
उन्होंने साल 1943 में महबूब खान के निर्देशन में बनी फिल्म ‘नजमा’ से बॉलीवुड में अपना डेब्यू किया. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और करीब चार दशकों तक इंडस्ट्री पर राज किया. मुराद ने अपने करियर में ‘मुगल-ए-आजम’, ‘दो बीघा जमीन’ और ‘अंदाज’ जैसी भारतीय सिनेमा की कालजयी फिल्मों में काम किया. इसके अलावा, उन्होंने हॉलीवुड फिल्म ‘टार्जन गोज टू इंडिया’ में भी अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरा.
मुराद के नाम सिनेमा में सबसे ज्यादा बार ‘जज’ की भूमिका निभाने का एक अनोखा रिकॉर्ड दर्ज है. उन्होंने अपनी 500 फिल्मों में से लगभग 300 फिल्मों में जज का किरदार निभाया. उस दौर में जब भी किसी डायरेक्टर को जज के किरदार की जरूरत होती थी तो सबसे पहला चेहरा मुराद का ही सामने आता था. उन्होंने राजा, पुलिस अफसर और पिता की भी कई भूमिकाएं निभाईं, लेकिन उन्हें कभी किसी फिल्म में हीरो बनने का मौका नहीं मिला.
बेटे रजा मुराद ने इंटरव्यू में बताया कि पर्दे पर भले ही उनके पिता रईस दिखते थे, लेकिन असल जिंदगी में उनका परिवार भयानक गरीबी से जूझ रहा था. रजा मुराद ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए कहा, ‘मैंने जीवन में बेहद कठिन दौर देखा है. भोपाल में हमारे घर में बिजली तक नहीं थी. परीक्षा के दिनों में मैं रात के 12 बजे से सुबह 6 बजे तक स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई करता था. पिता ने 500 से ज्यादा फिल्में की थीं, लेकिन हमारे पास खुद की कार तक नहीं थी. हम किराए के मकान में रहते थे और बस-ट्रेन से सफर करते थे.’
रजा मुराद ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पढ़ाई पूरी की और परिवार को आर्थिक संकट से निकालने के लिए खुद एक्टिंग में आए. रजा मुराद ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने पिता की जिंदगी से एक महत्वपूर्ण सबक सीखा. उन्होंने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित होने के बाद सबसे पहले उन्होंने अपना घर खरीदा, ताकि भविष्य में परिवार को ऐसी परेशानियों का सामना न करना पड़े.
अपने दमदार करेक्टर एक्टर से वे दर्शकों के दिलों में अमर हो गए. साल 1997 में एक्टर मुराद का निधन हो गया, लेकिन उनकी फिल्में और उनकी संघर्षभरी कहानी आज भी प्रेरणा और सीख दोनों देती है.
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