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Solar Energy Series First Story: होर्मुज संकट के बाद भारत में भी तेल-गैस की किल्लत, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी और बिजली कटौती जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लोगों से तेल-गैस के सीमित इस्तेमाल करने की अपील कर चुके हैं, वहीं ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ भी लोगों से लगातार अन्य ऊर्जा विकल्पों को अपनाने और बिजली की बचत करने के सुझाव दे रहे हैं, ताकि भविष्य सुरक्षित रहे और कोई परेशानी न झेलनी पड़े.

इन्ही कठिनाइयों को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें भी ऊर्जा के अक्षय विकल्प सौर ऊर्जा को लगातार बढ़ावा दे रही हैं और लोगों को घरों में सोलर पैनल लगवाने पर अच्छी खासी सब्सिडी दे रही हैं. इसके बावजूद लोगों के मन में सोलर एनर्जी की तरफ बढ़ने से पहले दर्जनों सवाल हैं. वे भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि क्या सच में सौर ऊर्जा से उनकी सभी जरूरतें पूरी हो जाएंगी? क्या यह उनके लिए बिजली की सप्लाई का बिना टेंशन वाला सोर्स है? क्या यह खर्च-खराबी है या बचत का खजाना है?

News18hindi सौर ऊर्जा-सोलर पैनल पर खबरों की पूरी सीरीज कर रहा है. सीरीज की पहली स्टोरी में दो सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले सवालों के जवाब विस्तार से दिए जा रहे हैं. ये जवाब दे रही हैं काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की प्रोग्राम लीड भावना त्यागी.

सोलर पैनल इंस्टाल होने के बाद कितने वर्षों तक मुफ्त बिजली देते हैं?

भावना बताती हैं, “सोलर पैनल की परफॉर्मेंस वारंटी आमतौर पर 25 वर्ष की होती है, लेकिन ठीक से रखरखाव होने की स्थिति में ये 25 वर्ष के बाद भी बिजली देते रहते हैं. भारत में घरों की छतों पर सोलर क्षमता को लेकर सीइइडब्ल्यू (CEEW) के आकलन के अनुसार, देश भर के 25 करोड़ से अधिक घरों में 600 गीगावाट (GW) से ज्यादा रूफटॉप सोलर क्षमता स्थापित करने की तकनीकी क्षमता है, जो आवासीय बिजली की दिन में आने वाली मांग को पूरा करने में प्रमुखता से योगदान दे सकते हैं.

इसपर आने वाले खर्च और फिर मिलने वाले निशुल्क फायदों को इस तरह भी समझ सकते हैं कि शुरुआती पूंजीगत खर्च वापस मिलने (आमतौर पर 4-6 वर्षों में) के बाद आरटीएस से मिलने वाली बिजली उसके शेष जीवनकाल के लिए मुफ्त होती है. हालांकि इसका शुरुआती खर्च वापस मिलने में लगने वाला समय (पेबैक अवधि) सिस्टम के आकार, बिजली की खपत, बिजली की कीमतें, पूंजीगत सब्सिडी, फाइनेंसिंग की शर्तों, मीटरिंग व्यवस्था (फीड-इन टैरिफ दरों सहित) और सिस्टम के रखरखाव पर भी निर्भर करती है.

सीईईडब्ल्यू (CEEW) के अध्ययन में यह भी सामने आया है कि सरकारी मदद (सब्सिडी) के बगैर रूफटॉप सोलर का मार्केट पोटेंशियल घट जाता है. एमएनआरई (MNRE) की सब्सिडी के साथ जो बाजार 32 गीगावाट का हो सकता है, वह इसके बगैर घटकर केवल 11 गीगावाट रह जाता है. यह बताता है कि पैबैक में सब्सिडी कितनी अहम भूमिका निभाती है. आखिरी बात यह कि इन 25 सालों के दौरान आमतौर पर एक बार (लगभग 10वें से 12वें साल में) इनवर्टर को बदलने की जरूरत पड़ती है.”

क्या समय के साथ सोलर पैनलों का प्रदर्शन घट जाता है? क्या 5 या 10 वर्षों के बाद उत्पादन घट जाता है?

भावना कहती हैं, “किसी भी अन्य तकनीकी सामान की तरह, सोलर पैनलों की कार्यक्षमता भी समय के साथ धीरे-धीरे कम हो जाती है. इनकी कार्यक्षमता घटने की दर हर साल करीब 0.5 से 0.7 प्रतिशत होती है. इसके बावजूद, अधिकतर कंपनियां गारंटी देती हैं कि 25 साल बाद भी पैनल अपनी क्षमता का कम से कम 80% बिजली बनाएंगे. इसका मतलब है कि 3 किलोवाट का एक सिस्टम 25वें साल में करीब 2.4 किलोवाट बिजली देगा.

हालांकि, अगर सिस्टम की सही से देखरेख नहीं होती है, जैसे उस पर धूल जमती है, छाया पड़ती है या गंदगी जम जाती है तो बिजली उत्पादन और भी कम हो सकता है. दिल्ली में लगे सोलर सिस्टम के सीइइडब्ल्यू (CEEW) के अध्ययन में पाया गया कि इसके सामने धूल-मिट्टी जमना और छाया पड़ना सबसे बड़ी समस्याएं हैं. इस अध्ययन के अनुसार, घरेलू उपभोक्ता सिर्फ अपने सोलर पैनलों की नियमित सफाई करके सामूहिक रूप से करीब 2 करोड़ रुपये बचा सकते हैं.”

सोलर एनर्जी पर सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले अगले सवाल के लिए सीरीज की अगली स्टोरी में पढ़ें…..

‘अगर किसी घर में सोलर पैनल लगे हैं, तो क्या उसे ग्रिड से बिजली कनेक्शन लेने की जरूरत होती है?

पढ़ते रहिए न्यूज18हिंदी.

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