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Hyderabad Golconda Fort: हैदराबाद का प्रसिद्ध गोलकोंडा किला केवल अपनी भव्य वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि कई प्रेरणादायक और रहस्यमयी कथाओं के लिए भी जाना जाता है. इन्हीं में से एक कहानी उस कालकोठरी से जुड़ी है, जहां रामभक्त भद्राचल रामदास (कांचेरला गोपन्ना) को लगभग 12 वर्षों तक कैद में रखा गया था. कहा जाता है कि कठिन परिस्थितियों, अंधेरे और बेड़ियों के बावजूद उनकी आस्था कभी डगमगाई नहीं. कैद के दौरान भी वे निरंतर भगवान राम का स्मरण और भजन करते रहे, जिससे पूरी कालकोठरी राम-नाम से गूंजती रहती थी. यह कथा भक्ति, धैर्य और अटूट विश्वास का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है. आज भी गोलकोंडा किले का यह हिस्सा इतिहास और अध्यात्म में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है.
हैदराबाद: हैदराबाद का ऐतिहासिक गोलकोंडा किला सिर्फ अपनी बेजोड़ वास्तुकला, कीमती हीरों और शाही इतिहास के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसके पत्थरों के बीच अटूट आस्था की एक ऐसी अनूठी दास्तां भी दफन है जो आज भी यहां आने वाले पर्यटकों को भावुक कर देती है. यह कहानी है किले के भीतर बने रामदास बंदीखाना की, जहां एक भक्त की अडिग भक्ति के आगे वक्त के सबसे शक्तिशाली सुल्तानों में से एक को भी झुकना पड़ा था.
टूरिज्म एक्सपर्ट मनोज शाही बताते हैं कि बात 17वीं सदी की है जब गोलकोंडा पर कुतुब शाही वंश के आखिरी सुल्तान अबुल हसन ताना शाह का शासन था. उनके दरबार में भद्राचलम क्षेत्र के तहसीलदार के पद पर कंचर्ला गोपन्ना नियुक्त थे. गोपन्ना भगवान श्री राम के परम भक्त थे. जब उन्होंने देखा कि भद्राचलम में भगवान राम का कोई पक्का मंदिर नहीं है तो उन्होंने सुल्तान की बिना अनुमति के सरकारी खजाने से करीब 6 लाख वराह खर्च कर वहां भव्य श्री सीता रामचंद्रस्वामी मंदिर का निर्माण करवा दिया.
ताना शाह को सरकारी धन के इस उपयोग का पता चला
जब सुल्तान ताना शाह को सरकारी धन के इस उपयोग का पता चला, तो उसने इसे राजद्रोह माना. गोपन्ना को तुरंत गिरफ्तार कर गोलकोंडा किले की एक बेहद तंग, अंधेरी और चट्टानी कोठरी में बंद कर दिया गया. उन्हें पूरे 12 साल तक इस कालकोठरी में असहनीय यातनाएं सहनी पड़ीं. लेकिन इस अंधेरे ने गोपन्ना की आस्था को डिगाने के बजाय और मजबूत कर दिया और इसी कैद के दौरान वह भक्त रामदास कहलाए.
रामदास के पास पूजा के लिए कोई मूर्ति नहीं
जेल के भीतर जब रामदास के पास पूजा के लिए कोई मूर्ति नहीं थी तो उन्होंने जेल की सख्त पत्थरों वाली दीवारों को ही अपना कैनवास बना लिया. उन्होंने नुकीले पत्थरों से दीवार पर भगवान राम, लक्ष्मण, माता सीता और विशेष रूप से संकटमोचन हनुमान की बेहद खूबसूरत आकृतियां उकेरीं. 12 सालों तक वह इन्हीं आकृतियों के सामने बैठकर राम-नाम का जाप करते रहे और भक्ति के भावुक पद गाते रहे जिन्हें आज रामदास कीर्तन के नाम से जाना जाता है.
आस्था को कभी बंदी नहीं बना सकती
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रामदास की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान राम और लक्ष्मण ने दो सैनिकों का रूप धारण किया और सुल्तान को पूरी सरकारी रकम चुकाकर रामदास को ससम्मान रिहा करवाया. आज सदियां बीत जाने के बाद भी यह बंदीखाना गोलकोंडा किले का सबसे प्रमुख आकर्षण है. पुरातत्व विभाग की देखरेख में सुरक्षित इस कोठरी के भीतर आज भी उन आकृतियों के सामने एक छोटा सा दीया जलता रहता है जो यह याद दिलाता है कि दीवारें भले ही इंसान को कैद कर लें लेकिन उसकी आस्था को कभी बंदी नहीं बना सकतीं.
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Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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