अयोध्या में रहने वाले कई संत आज भी सिले हुए कपड़े नहीं पहनते. वे केवल धोती, चादर या अंगवस्त्र जैसे बिना सिले वस्त्रों का ही उपयोग करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार सिले हुए वस्त्र सांसारिक मोह, माया और भौतिक बंधनों का प्रतीक माने जाते हैं. जबकि बिना सिले वस्त्र त्याग, वैराग्य और साधना का प्रतीक होते हैं.संतों का मानना है कि जब साधक सांसारिक आकर्षणों से दूर होकर ईश्वर भक्ति में लीन होता है, तब उसे सरल और सात्विक जीवन अपनाना चाहिए.
अयोध्या: भगवान श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या केवल मंदिरों और धार्मिक स्थलों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन संत परंपरा और आध्यात्मिक जीवन शैली के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है. यहां आज भी कई ऐसे संत और महात्मा निवास करते हैं, जिनकी साधना पद्धति सामान्य जीवन से बिल्कुल अलग मानी जाती है. इन्हीं परंपराओं में एक विशेष परंपरा है बिना सिले हुए वस्त्र धारण करने की, जिसे रामानंदी वैष्णव संतों में अत्यंत पवित्र माना जाता है.
सिले कपड़े नहीं पहनते संत
अयोध्या में रहने वाले कई संत आज भी सिले हुए कपड़े नहीं पहनते. वे केवल धोती, चादर या अंगवस्त्र जैसे बिना सिले वस्त्रों का ही उपयोग करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार सिले हुए वस्त्र सांसारिक मोह, माया और भौतिक बंधनों का प्रतीक माने जाते हैं. जबकि बिना सिले वस्त्र त्याग, वैराग्य और साधना का प्रतीक होते हैं.संतों का मानना है कि जब साधक सांसारिक आकर्षणों से दूर होकर ईश्वर भक्ति में लीन होता है, तब उसे सरल और सात्विक जीवन अपनाना चाहिए.
अयोध्या के प्रसिद्ध कथावाचक संत करपात्री महाराज पिछले लगभग 30 वर्षों से बिना सिले वस्त्र धारण कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि वे रामानंदी संप्रदाय से जुड़े हैं और इस परंपरा का पालन गुरु परंपरा के अनुसार किया जाता है. उनके अनुसार सिला हुआ वस्त्र बंधन और मोह का प्रतीक माना गया है. वैष्णव रामानंदी संत त्याग और वैराग्य को जीवन का मूल मानते हैं. इसलिए वे बिना सिले वस्त्र धारण करते हैं.
रामानंदी संप्रदाय की है परंपरा
उन्होंने बताया कि यह परंपरा केवल बाहरी पहनावे तक सीमित नहीं है बल्कि यह साधना और आत्मसंयम का भी प्रतीक है. संतों का उद्देश्य शरीर की सजावट नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और प्रभु भक्ति होता है. इसी कारण वे सरल भोजन, साधारण जीवन और तपस्या को महत्व देते हैं. अयोध्या की संत परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है यहां विभिन्न अखाड़ों और संप्रदायों के संत अपनी-अपनी परंपराओं का पालन करते हैं. रामानंदी संप्रदाय विशेष रूप से भगवान श्रीराम की भक्ति और वैराग्य मार्ग के लिए जाना जाता है. इस परंपरा में त्याग और सादगी को सबसे बड़ा आभूषण माना गया है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें
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